4,000 करोड़ के लंबित भुगतान और खनिज दरों में कई गुना बढ़ोतरी ने तोड़ी संवेदकों की कमर; छह माह से रॉयल्टी चालान का संकट बरकरार
पुराने SOR-2022 की योजनाओं पर भी नई दर से रॉयल्टी कटौती का आरोप, छोटे ठेकेदारों के सामने बैंक कर्ज, सूद और परिवार चलाने की चुनौती
सरकार की बेरुखी से टूट रहा संवेदकों का भरोसा, न्याय के लिए उच्च न्यायालय जाने की तैयारी
रिपोर्ट शैलेश सिंह
झारखंड में विकास की इमारत खड़ी करने वाले ठेकेदार आज खुद आर्थिक तबाही की कगार पर खड़े हैं। जिन हाथों ने सड़कों, पुल-पुलियों, सरकारी भवनों और दूसरी आधारभूत संरचनाओं का निर्माण किया, आज उन्हीं हाथों में बैंकों की किस्तों, बाजार के कर्ज और सूदखोरों के ब्याज का बोझ है। सरकारी योजनाओं को पूरा करने के लिए अपनी पूंजी झोंकने वाले संवेदकों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर वे अपना कारोबार बचाएं, परिवार चलाएं या कर्जदारों का हिसाब चुकाएं?
खनन विभाग की नई दरों, रॉयल्टी चालान की जटिलताओं और सरकारी विभागों में भुगतान की लंबित प्रक्रिया ने ठेकेदारों को ऐसे आर्थिक चक्रव्यूह में फंसा दिया है, जिससे बाहर निकलने का रास्ता उन्हें दिखाई नहीं दे रहा। ठेकेदारों का आरोप है कि सरकार की नीतियों और विभागीय आदेशों का आर्थिक बोझ अंततः उन्हीं के सिर पर डाला जा रहा है, जबकि समय पर भुगतान और व्यावहारिक समाधान की जिम्मेदारी सरकारी तंत्र की है।
राज्य के अलग-अलग प्रमंडलों और जिलों के संवेदकों में इसको लेकर गहरी नाराजगी है। उनका कहना है कि यह केवल ठेकेदारों के मुनाफे का सवाल नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की रोजी-रोटी, बच्चों की शिक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक अस्तित्व का सवाल बन चुका है।

खनिज दरों में ऐसा झटका कि ठेकेदारों की पूरी आर्थिक गणित ध्वस्त!
27 अप्रैल 2026 के बाद खनन विभाग द्वारा खनिज पदार्थों की निर्धारित दरों में भारी बढ़ोतरी ने संवेदकों की परेशानी कई गुना बढ़ा दी है। उपलब्ध तुलनात्मक दर तालिका के अनुसार बोल्डर, चिप्स-मेटल, बालू, मोरम और स्टोन डस्ट की कुल देय राशि में अप्रत्याशित अंतर सामने आया है।
आंकड़े देखिए, नई दरों ने किस तरह ठेकेदारों की कमर तोड़ने वाली स्थिति पैदा कर दी है।
| खनिज पदार्थ | पुरानी कुल दर | नई कुल दर | बढ़ोतरी |
|---|---|---|---|
| बोल्डर | ₹307.72 | ₹1,050.32 | ₹742.60 |
| चिप्स-मेटल | ₹579.10 | ₹3,069.10 | ₹2,490.00 |
| बालू | ₹117.42 | ₹903.42 | ₹786.00 |
| मोरम | ₹89.70 | ₹401.22 | ₹311.52 |
| स्टोन डस्ट | ₹73.46 | ₹673.46 | ₹600.00 |
| मिट्टी (अर्थ) | ₹47.48 | ₹104.64 | ₹57.16 |
दरें उपलब्ध तुलनात्मक तालिका के अनुसार हैं। संबंधित इकाइयां मूल तालिका के अनुरूप हैं।
सबसे चौंकाने वाली स्थिति चिप्स-मेटल की है, जिसकी कुल देय दर में 2,490 रुपये का अंतर दर्शाया गया है। बालू में 786 रुपये, बोल्डर में 742.60 रुपये और स्टोन डस्ट में 600 रुपये का अंतर है।
ठेकेदारों का सवाल है कि जब योजना का प्राक्कलन पुरानी दरों पर बना, निविदा उसी आधार पर निकली और कार्यादेश भी उसी वित्तीय गणना पर मिला, तब बीच में दरों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी का बोझ संवेदक क्यों उठाएं? क्या ठेकेदारों के पास कोई ऐसी जादुई तिजोरी है, जिससे वे अचानक पैदा हुए लाखों रुपये के अतिरिक्त आर्थिक बोझ को भर सकें?
पुराने SOR-2022 पर काम, लेकिन रॉयल्टी नई दर से! यह कैसा न्याय?
ठेकेदारों के आक्रोश की सबसे बड़ी वजह पुरानी स्वीकृत योजनाओं पर नई दरों के आधार पर रॉयल्टी कटौती का मामला है।
संवेदकों का कहना है कि पुराने SOR-2022 के आधार पर स्वीकृत योजनाओं का प्राक्कलन तैयार हुआ, निविदा प्रक्रिया पूरी हुई और ठेकेदारों ने उसी दर के अनुसार निर्माण कार्य का दायित्व स्वीकार किया। लेकिन अब भुगतान के समय 27 अप्रैल 2026 के बाद निर्धारित नई खनिज दरों के आधार पर रॉयल्टी मद में कटौती किए जाने की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
ठेकेदारों का सवाल है कि जब सरकार ने योजना की लागत पुरानी दरों के आधार पर निर्धारित की, तो रॉयल्टी की कटौती नई दरों से क्यों? यदि निर्माण कार्य की पूरी आर्थिक जिम्मेदारी ठेकेदार की है तो विभागीय नीतियों में अचानक बदलाव का नुकसान भी क्या उसी को भुगतना होगा?
संवेदक सूत्रों का स्पष्ट कहना है कि 27 अप्रैल 2026 से पहले स्वीकृत पुरानी योजनाओं के विपत्रों में उसी समय लागू खनिज दरों के आधार पर रॉयल्टी की गणना होनी चाहिए। इस मामले में विभागीय स्तर पर समाधान नहीं निकलने से अब ठेकेदार माननीय उच्च न्यायालय की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं।
4,000 करोड़ से अधिक के विपत्र फंसे, ठेकेदारों की पूंजी हुई खत्म!
राज्य के विभिन्न सरकारी विभागों में 4,000 करोड़ रुपये से अधिक की योजनाओं के विपत्रों के भुगतान में समस्या होने की बात संवेदक सूत्रों ने कही है। पिछले लगभग छह माह से रॉयल्टी चालान से जुड़ा विवाद और तकनीकी पेच जस का तस बने रहने से ठेकेदारों की परेशानी लगातार बढ़ रही है।
एक तरफ निर्माण कार्य पूरा करने के लिए मजदूरों की मजदूरी, गिट्टी, बालू, सीमेंट, मशीनरी, परिवहन और अन्य सामग्रियों का भुगतान करना पड़ता है। दूसरी तरफ विभागीय भुगतान लंबित रहने से ठेकेदारों की कार्यशील पूंजी समाप्त होती जा रही है।
आखिर कब तक ठेकेदार अपनी जेब से सरकारी योजनाओं का खर्च उठाते रहेंगे? कब तक बैंक और बाजार से कर्ज लेकर निर्माण कार्यों को आगे बढ़ाएंगे? और कब तक विभागीय भुगतान की प्रतीक्षा में ब्याज का बोझ सहेंगे?
संवेदकों का कहना है कि निर्माण कार्य में लगाई गई पूंजी जब महीनों तक वापस नहीं आती तो अगली योजना शुरू करना तो दूर, पुराने कर्ज का भुगतान करना भी मुश्किल हो जाता है।

ठेकेदारों के घरों में त्योहार नहीं, कर्ज और ब्याज की चिंता!
इस पूरे संकट का सबसे दर्दनाक चेहरा छोटे और मध्यम श्रेणी के ठेकेदारों के परिवारों में दिखाई दे रहा है।
ठेकेदारों की पीड़ा है कि उनके भी बच्चे हैं, जिनकी स्कूल-कॉलेज की फीस भरनी है। परिवार में शादी-ब्याह और सामाजिक जिम्मेदारियां हैं। घर का खर्च है, बैंक की किस्तें हैं और बाजार के दुकानदारों का बकाया है। लेकिन जब सरकारी भुगतान ही नहीं मिलेगा तो ये सारी जिम्मेदारियां कैसे पूरी होंगी?
कई छोटे संवेदक सूद पर पैसा लेकर मजदूरों और सामग्री आपूर्तिकर्ताओं का भुगतान कर रहे हैं। अब स्थिति यह है कि मूलधन तो दूर, ब्याज चुकाना भी मुश्किल हो गया है। त्योहार और पर्व की खुशियां आर्थिक तंगी में फीकी पड़ रही हैं।
किसी ने बच्चों की पढ़ाई के लिए रखी रकम कारोबार में लगा दी, किसी ने परिवार की बचत निर्माण कार्य में झोंक दी और किसी ने बैंक से कर्ज लेकर सरकारी योजना पूरी की। लेकिन भुगतान अटकने के बाद अब यही मेहनत उनकी सबसे बड़ी आर्थिक परेशानी बन गई है।
छोटे ठेकेदार खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। बड़े संवेदक अपनी बाजार में साख और प्रतिष्ठा बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। कई परिवारों में अब ठेकेदारी छोड़कर दूसरा व्यवसाय अपनाने का दबाव बढ़ने लगा है।
जिस व्यवसाय से कभी परिवार का भविष्य संवरने की उम्मीद थी, आज उसी व्यवसाय को परिवार के लोग छोड़ने की सलाह दे रहे हैं। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी?
खदानें नहीं, बालू घाट नहीं, मिट्टी का चालान नहीं, फिर कैसे पूरे होंगे सरकारी काम?
संवेदकों की परेशानी केवल बढ़ी हुई दरों तक सीमित नहीं है। राज्य में निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक खनिज पदार्थों की उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
ठेकेदारों का कहना है कि पर्याप्त पत्थर खदानें उपलब्ध नहीं हैं। बालू घाटों की समस्या अलग है। मिट्टी और मोरम का वैध चालान प्राप्त करना भी कठिन हो रहा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब बाजार में पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं होगी और वैध चालान की व्यवस्था सुचारू नहीं होगी, तब ठेकेदार निर्माण कार्यों के विपत्रों के साथ आवश्यक दस्तावेज कैसे प्रस्तुत करेंगे?
एक तरफ विभागीय नियमों का दबाव, दूसरी तरफ खनिज पदार्थों की अनुपलब्धता और तीसरी तरफ भुगतान में देरी। आखिर इस तिहरी मार को ठेकेदार कब तक सहेंगे?
मंत्री-विधायक आखिर कब उठाएंगे संवेदकों की आवाज?
ठेकेदारों का कहना है कि राज्य के विकास कार्यों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन आज उनकी समस्याओं को लेकर वैसी गंभीरता दिखाई नहीं दे रही, जिसकी जरूरत है।
संवेदकों के बीच यह नाराजगी भी है कि मंत्री और विधायक इस मुद्दे को सरकार के समक्ष मजबूती से क्यों नहीं उठा रहे हैं? क्या हजारों ठेकेदारों और उनसे जुड़े परिवारों की आर्थिक परेशानी सरकार की प्राथमिकता में नहीं है?
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली राज्य सरकार से संवेदकों को उम्मीद है कि वह इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करेगी और विभागीय स्तर पर उत्पन्न गतिरोध को समाप्त करने का रास्ता निकालेगी।
कोल्हान डेवलपर ने उठाई पुरानी दर से रॉयल्टी कटौती की मांग
कोल्हान डेवलपर की ओर से भी इस मामले में स्पष्ट मांग रखी गई है कि 27 अप्रैल 2026 से पहले खनन विभाग द्वारा लागू निर्धारित दरों के आधार पर स्वीकृत पुरानी योजनाओं के विपत्रों में उसी समय की खनिज दरों के अनुसार रॉयल्टी मद में कटौती की जाए।
उनका कहना है कि पुराने प्राक्कलन पर काम करने वाले ठेकेदारों पर नई दरों का आर्थिक बोझ डालना न्यायसंगत नहीं होगा। सरकार को विकास कार्यों और संवेदकों के हितों को ध्यान में रखकर व्यावहारिक निर्णय लेना चाहिए।
अब आर-पार की तैयारी, न्यायालय जाने को मजबूर हो सकते हैं ठेकेदार
संवेदक सूत्रों का कहना है कि ठेकेदार सरकार से टकराव नहीं चाहते। वे केवल अपने साथ न्याय चाहते हैं। उनकी मांग है कि पुराने SOR-2022 के आधार पर स्वीकृत योजनाओं में पुरानी दर से रॉयल्टी कटौती हो, छह माह से लंबित चालान समस्या का समाधान निकले और सरकारी विभागों में फंसे विपत्रों का भुगतान शीघ्र किया जाए।
यदि सरकार ने समय रहते कोई ठोस निर्णय नहीं लिया तो संवेदक अपने अधिकारों और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए माननीय उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
सरकार से सीधे सवाल!
- पुराने SOR-2022 पर स्वीकृत योजनाओं में नई दर से रॉयल्टी कटौती का आधार क्या है?
- छह माह से रॉयल्टी चालान की समस्या का समाधान क्यों नहीं हुआ?
- 4,000 करोड़ रुपये से अधिक के लंबित विपत्रों के भुगतान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
- खनिज पदार्थों की पर्याप्त उपलब्धता और वैध चालान की व्यवस्था कब सुनिश्चित होगी?
- सरकारी योजनाओं में अपनी पूंजी लगाने वाले संवेदकों को आर्थिक नुकसान से बचाने की जिम्मेदारी किसकी है?
अंततः सवाल सिर्फ ठेकेदारों के मुनाफे का नहीं, उनके परिवारों के भविष्य का है। सरकार की विकास योजनाओं को अपनी पूंजी और मेहनत से पूरा करने वाले संवेदक यदि आज कर्ज के बोझ तले दब रहे हैं तो उनकी पीड़ा को अनसुना करना राज्य के विकास की पूरी व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
सरकार को यह तय करना होगा कि विकास कार्यों का बोझ उठाने वाले ठेकेदारों को ही आर्थिक संकट में छोड़ दिया जाएगा या उनकी जायज समस्याओं का समाधान भी किया जाएगा। क्योंकि ठेकेदारों की आर्थिक बर्बादी केवल एक व्यवसाय का संकट नहीं, बल्कि उससे जुड़े हजारों परिवारों की जिंदगी का सवाल है।








