चिड़िया ओपी पुलिस ने पीड़िता के बयान पर दर्ज किया मामला, चार आरोपी चिड़िया और एक मनोहरपुर का निवासी
मेडिकल जांच के लिए पीड़िता को चाईबासा सदर अस्पताल भेजा, 3 नवंबर को होगी चिकित्सकीय जांच
पुलिस की कार्रवाई के बाद कथित सामाजिक समझौते पर भी उठे सवाल, प्रसव और DNA जांच के नाम पर पंचायत में तय की गई थी विवादित शर्तें!
सारंडा/चिड़िया। सारंडा के चिड़िया ओपी क्षेत्र में लगभग 14 वर्षीय नाबालिग युवती के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म और उसके गर्भ में लगभग 3-5 माह का भ्रूण होने के सनसनीखेज मामले में आखिरकार पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर ली है। इस मामले में पीड़िता के बयान पर पांच लोगों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज की गई है। इनमें चार आरोपी चिड़िया क्षेत्र के तथा एक आरोपी मनोहरपुर निवासी बताया जा रहा है।
खबर प्रकाशित होने के बाद पुलिस की सक्रियता बढ़ी और पीड़िता के बयान के आधार पर कानूनी कार्रवाई शुरू की गई। पुलिस ने नाबालिग को चिकित्सकीय जांच के लिए चाईबासा सदर अस्पताल भेजा है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 3 नवंबर को उसकी चिकित्सकीय जांच की जाएगी।
हालांकि, पुलिस ने अभी तक पांचों आरोपियों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं। नाबालिग की पहचान और जांच की गोपनीयता को देखते हुए आरोपियों की पहचान उजागर होने तक इस संबंध में कोई नाम प्रकाशित नहीं किया जा रहा है।

जून महीने में दो अलग-अलग दिनों पर सामूहिक दुष्कर्म की चर्चा
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, यह कथित सामूहिक दुष्कर्म की घटना बीते जून महीने की बताई जा रही है। आरोप है कि नाबालिग के साथ दो अलग-अलग दिनों में यौन अपराध किया गया था। इसी घटना के परिणामस्वरूप उसके गर्भवती होने की बात सामने आई है।
हालांकि, घटना की वास्तविक परिस्थितियों, आरोपियों की भूमिका और अपराध की पुष्टि पुलिस अनुसंधान तथा चिकित्सकीय जांच के बाद ही हो सकेगी। फिलहाल पुलिस ने पीड़िता के बयान के आधार पर पांच लोगों को नामजद करते हुए मामला दर्ज किया है।
खबर प्रकाशित होने के बाद हरकत में आई पुलिस
गौरतलब है कि इस गंभीर मामले को लेकर पीड़ित परिवार 1 नवंबर को न्याय की गुहार लेकर चिड़िया ओपी पहुंचा था। आरोप था कि परिवार की शिकायत पर तत्काल कार्रवाई करने के बजाय उन्हें मानकी-मुंडा और सामाजिक स्तर पर मामला सुलझाने की सलाह देकर वापस भेज दिया गया।
इस घटनाक्रम को लेकर खबर प्रकाशित होने के बाद मामला चर्चा में आया और पुलिस ने पीड़िता का बयान लेकर प्राथमिकी दर्ज की। इसके बाद उसे चिकित्सकीय जांच के लिए चाईबासा भेजने की कार्रवाई की गई।
इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की प्रारंभिक भूमिका और शिकायत मिलने के समय की गई कार्रवाई को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
गांव में कथित अवैध बैठक, पांच आरोपियों पर खर्च उठाने की शर्त!
इस मामले का एक और बेहद चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। सूत्रों के अनुसार, 1 नवंबर को पीड़ित परिवार और नाबालिग के चिड़िया ओपी से वापस घर लौटने के बाद गांव में कथित तौर पर एक विशेष बैठक आयोजित की गई थी।
बताया जा रहा है कि इस बैठक में कुछ लोगों की मौजूदगी में कथित तौर पर यह निर्णय लिया गया कि नाबालिग युवती प्रसव होने तक अपने माता-पिता के साथ रहेगी। इस दौरान गर्भावस्था और प्रसव से संबंधित जो भी खर्च होगा, उसका वहन पांचों आरोपियों द्वारा किया जाएगा।
कथित बैठक में आगे यह शर्त भी रखे जाने की जानकारी मिली है कि बच्चे के जन्म के बाद DNA जांच कराई जाएगी। जिस व्यक्ति का DNA नवजात से मेल खाएगा, बच्चे और नाबालिग युवती को उसके अधीन सौंप दिया जाएगा।
यदि सूत्रों से मिली इस जानकारी की पुष्टि होती है, तो यह कथित फैसला अपने आप में अत्यंत गंभीर और चिंताजनक है। सवाल यह है कि आखिर किस अधिकार के तहत किसी नाबालिग पीड़िता और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे के भविष्य का फैसला इस प्रकार सामाजिक बैठक में किया जा सकता है?
नाबालिग के भविष्य का फैसला पंचायत नहीं, कानून करेगा!
कानून के अनुसार, नाबालिग के साथ यौन अपराध का मामला POCSO अधिनियम के तहत आता है। ऐसे मामले में प्राथमिकी, अनुसंधान, चिकित्सकीय परीक्षण और पीड़िता के संरक्षण की जिम्मेदारी पुलिस तथा संबंधित बाल संरक्षण संस्थाओं की होती है।
किसी भी सामाजिक बैठक में पीड़िता की सुरक्षा, न्याय और कानूनी अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता। इसी तरह, बच्चे के जन्म के बाद DNA जांच का परिणाम भी अपने आप में बच्चे अथवा पीड़िता को किसी व्यक्ति के हवाले करने का आधार नहीं बन जाता।
नाबालिग पीड़िता की इच्छा, सुरक्षा, गरिमा और सर्वोत्तम हित सर्वोपरि हैं। उसके भविष्य, संरक्षण और पुनर्वास से संबंधित निर्णय सक्षम कानूनी प्राधिकारियों की निगरानी में ही होने चाहिए।
अब DNA जांच से लेकर आरोपियों की गिरफ्तारी तक पुलिस की अगली परीक्षा
इस मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद अब पुलिस के सामने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। सबसे पहले सभी नामजद आरोपियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच, आवश्यक साक्ष्य संकलन, चिकित्सकीय रिपोर्ट और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर अनुसंधान को आगे बढ़ाना होगा।
इसके साथ ही नाबालिग की सुरक्षा, उचित चिकित्सा, मानसिक परामर्श और कानूनी सहायता सुनिश्चित करना भी जरूरी है। कथित सामाजिक बैठक में लिए गए फैसले की भी जांच होनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि क्या पीड़िता पर किसी प्रकार का दबाव बनाया गया था।
खबर का असर सामने आने के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पांच नामजद आरोपियों के खिलाफ पुलिस आगे क्या कार्रवाई करती है और नाबालिग को न्याय दिलाने के लिए जांच कितनी निष्पक्ष एवं तेज होती है?
यह मामला केवल प्राथमिकी दर्ज होने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। एक नाबालिग की जिंदगी, सम्मान और भविष्य दांव पर है। उसे सामाजिक दबाव और कथित समझौतों से मुक्त कर कानून के संरक्षण में न्याय दिलाना पुलिस और प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।









