चिड़िया ओपी प्रभारी के कार्यशैली पर गंभीर सवाल, पीड़ित परिवार को कथित तौर पर कहा– मानकी-मुंडा और सामाजिक स्तर पर समाधान करो !
मामला सामाजिक पंचायत का नहीं, नाबालिग की जिंदगी और कानून के संरक्षण का है; पुलिस की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच जरूरी
रिपोर्ट शैलेश सिंह
सारंडा/चिड़िया। सारंडा के चिड़िया ओपी क्षेत्र से एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मामला सामने आने की जानकारी मिली है। सूत्रों के अनुसार, क्षेत्र के एक गांव की लगभग 14 वर्षीय नाबालिग युवती के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म और उसके गर्भ में लगभग 3-5 माह का भ्रूण होने का मामला सामने आया है। इस मामले में सबसे गंभीर सवाल पुलिस की कार्यशैली को लेकर उठ रहे हैं। आरोप है कि पीड़ित परिवार जब न्याय की उम्मीद लेकर 1 नवंबर को चिड़िया ओपी पहुंचा, तो उनकी शिकायत पर तत्काल कानूनी कार्रवाई शुरू करने के बजाय उन्हें सामाजिक स्तर पर मामला सुलझाने की सलाह देकर वापस भेज दिया गया।
यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल पुलिस की संवेदनहीनता का मामला नहीं, बल्कि नाबालिग बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण से जुड़े कानूनों के अनुपालन पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।

न्याय की गुहार लेकर पहुंचे परिजन, सामाजिक समाधान की सलाह देने का आरोप
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पीड़ित परिवार 1 नवंबर को दोपहर लगभग 2 बजे नाबालिग युवती के साथ हुई कथित घटना की शिकायत लेकर चिड़िया ओपी पहुंचा था। परिवार ने ओपी प्रभारी वाहिद अंसारी से मुलाकात कर मामले में प्राथमिकी दर्ज करने, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने और नाबालिग को न्याय दिलाने की मांग की।
आरोप है कि ओपी प्रभारी ने परिवार को कथित तौर पर यह कहते हुए वापस भेज दिया कि मानकी-मुंडा और सामाजिक स्तर पर मामले का समाधान कराओ।
यदि वास्तव में पुलिस अधिकारी की ओर से ऐसा कहा गया है, तो यह बेहद गंभीर विषय है। क्योंकि नाबालिग के साथ कथित यौन अपराध और उसके गर्भवती होने का मामला किसी सामाजिक पंचायत या पारंपरिक व्यवस्था के माध्यम से निपटाने का विषय नहीं है। इसमें कानून के तहत पुलिस की तत्काल जिम्मेदारी बनती है।
POCSO कानून में शिकायत मिलते ही कार्रवाई का प्रावधान
नाबालिग की उम्र 18 वर्ष से कम होने के कारण यह मामला पॉक्सो एक्ट (POCSO Act, 2012) के दायरे में आता है।
इस कानून की धारा 19 के अनुसार, किसी व्यक्ति को यदि बाल यौन अपराध की जानकारी मिलती है, तो उसे स्थानीय पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU) को सूचना देनी होती है। पुलिस को प्राप्त सूचना लिखित रूप में दर्ज करनी होती है।
इसके अलावा, धारा 19 के तहत पुलिस को जरूरत पड़ने पर पीड़ित बच्चे की सुरक्षा और देखभाल की तत्काल व्यवस्था करनी होती है। कानून में 24 घंटे के भीतर बाल कल्याण समिति (CWC) और विशेष न्यायालय को सूचना देने का भी प्रावधान है।
वहीं, धारा 21 में अपराध की सूचना दर्ज नहीं करने या रिपोर्ट करने में विफल रहने पर दंड का प्रावधान है।
अर्थात यदि पुलिस को नाबालिग के साथ यौन अपराध की जानकारी दी गई थी, तो उसे सामाजिक पंचायत के भरोसे छोड़ने के बजाय कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए थी।
BNSS की धारा 173: संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करना पुलिस की जिम्मेदारी
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 173 के तहत संज्ञेय अपराध की सूचना किसी भी थाने में दी जा सकती है। अपराध थाना क्षेत्र से बाहर का होने पर भी पुलिस सूचना दर्ज कर सकती है। इसे आमतौर पर जीरो एफआईआर के रूप में जाना जाता है।
यदि थाना की पुलिस सूचना दर्ज करने से इनकार करता है, तो पीड़ित परिवार या शिकायतकर्ता लिखित शिकायत संबंधित जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) को डाक के माध्यम से भेज सकता है। इसके बाद एसपी स्वयं जांच कर सकते हैं या अधीनस्थ अधिकारी को जांच का निर्देश दे सकते हैं।
इसलिए चिड़िया ओपी में यदि शिकायत दर्ज नहीं की गई है, तो परिवार के पास वरीय पुलिस अधिकारियों तक पहुंचने का कानूनी रास्ता मौजूद है।
3-5 माह का गर्भ, नाबालिग की जिंदगी से खिलवाड़ नहीं हो!
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू नाबालिग युवती की स्वास्थ्य सुरक्षा है। यदि गर्भावस्था की अवधि वास्तव में लगभग 3-5 पांच माह है, तो परिवार को बिना देरी विशेषज्ञ चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है।
लोकलाज, सामाजिक दबाव या बदनामी के भय से परिवार यदि स्वयं गर्भपात कराने की कोशिश करता है अथवा बिना चिकित्सकीय परामर्श के कोई कदम उठाता है, तो यह नाबालिग के स्वास्थ्य और जीवन के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
ऐसी परिस्थिति में युवती को तत्काल सरकारी मेडिकल कॉलेज अथवा सक्षम अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ से जांच और उपचार उपलब्ध कराया जाना चाहिए। गर्भावस्था की वास्तविक अवधि, युवती की शारीरिक स्थिति और आगे के उपचार का निर्णय विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा किया जाना चाहिए।
पीड़िता को बयान और जांच के दौरान भी विशेष संरक्षण का अधिकार
POCSO कानून की धारा 24 के तहत नाबालिग का बयान यथासंभव उसके घर या उसकी पसंद के स्थान पर महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाना चाहिए। पुलिस अधिकारी वर्दी में नहीं होना चाहिए। बयान के दौरान पीड़िता का आरोपी से किसी भी प्रकार का संपर्क नहीं होना चाहिए और बच्चे को रात में थाने में नहीं रखा जा सकता।
पीड़िता की गरिमा और निजता की रक्षा करना भी पुलिस की जिम्मेदारी है।
इसके अतिरिक्त, बाल कल्याण समिति के माध्यम से पीड़िता को सपोर्ट पर्सन, आवश्यक परामर्श, देखभाल और कानूनी प्रक्रिया के दौरान सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है।
पीड़ित परिवार के पास न्याय पाने के लिए ये रास्ते भी मौजूद
यदि चिड़िया ओपी में शिकायत दर्ज नहीं की गई है, तो पीड़ित परिवार निम्नलिखित कदम उठा सकता है:
- पुलिस अधीक्षक, पश्चिमी सिंहभूम: लिखित शिकायत देकर प्राथमिकी दर्ज कराने और चिड़िया ओपी की भूमिका की जांच कराने की मांग।
- विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU): नाबालिग के साथ यौन अपराध की सूचना देकर कानूनी कार्रवाई की मांग।
- बाल कल्याण समिति (CWC): युवती की सुरक्षा, चिकित्सकीय देखभाल और पुनर्वास के लिए संपर्क।
- जिला विधिक सेवा प्राधिकार (DLSA), चाईबासा: निःशुल्क कानूनी सहायता और पीड़िता के अधिकारों के संरक्षण के लिए मदद।
- चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और आपातकालीन सेवा 112: तत्काल सुरक्षा और सहायता के लिए संपर्क।
अब पुलिस के वरीय अधिकारियों से जवाबदेही तय करने की मांग
इस पूरे घटनाक्रम में पश्चिमी सिंहभूम के पुलिस अधीक्षक और जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। जरूरत है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल संज्ञान लिया जाए। पीड़ित परिवार की शिकायत की वास्तविक स्थिति की जांच हो, नाबालिग को तत्काल चिकित्सकीय सुरक्षा मिले और कथित अपराध में शामिल व्यक्ति की पहचान कर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
साथ ही, चिड़िया ओपी पुलिस के अधिकारी द्वारा कथित तौर पर परिवार को सामाजिक स्तर पर मामला सुलझाने की सलाह देने के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक लगभग 14 वर्षीय बच्ची के साथ कथित यौन अपराध और गर्भावस्था जैसा गंभीर मामला सामने आता है, तो क्या पुलिस की पहली जिम्मेदारी प्राथमिकी और जांच की होनी चाहिए या परिवार को मानकी-मुंडा के पास भेजने की?
यह मामला किसी सामाजिक प्रतिष्ठा या लोकलाज का नहीं, बल्कि एक नाबालिग बच्ची के जीवन, सम्मान, स्वास्थ्य और न्याय के अधिकार का है। अब देखना है कि पुलिस के वरीय अधिकारी इस गंभीर मामले में कितनी तत्परता दिखाते हैं।










