भ्रष्टाचार नक्सल खदान
अपराध राजनीति खेल समस्या स्वास्थ्य कार्यक्रम शिक्षा दुर्घटना सांस्कृतिक मनोरंजन मौसम कृषि ज्योतिष काम

दुबील से उठी चिंगारी ने झारखंड की सत्ता में लगा दी आग!

On: July 10, 2026 7:43 PM
Follow Us:
---Advertisement---

JMM बनाम कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर, सारंडा में सियासी संघर्ष तेज… आखिर किसके हाथ लगेगी जीत और किसे उठाना पड़ेगा नुकसान?

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

सेल (SAIL) की चिड़िया स्थित दुबील लौह अयस्क खदान में पिछले करीब 15 दिनों से जारी अनिश्चितकालीन आर्थिक नाकेबंदी अब केवल रोजगार, मुआवजा और ग्रामीण अधिकारों का आंदोलन नहीं रह गया है। यह आंदोलन अब झारखंड की सत्ता में शामिल दो प्रमुख राजनीतिक दलों—झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस—के बीच प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रभाव की सीधी लड़ाई का रूप लेता दिखाई दे रहा है।
जिस आंदोलन की शुरुआत दुबील ग्राम सभा ने अपने गांव के बेरोजगार युवाओं और विस्थापित परिवारों के हक की मांग को लेकर की थी, वही आंदोलन अब पूरे सारंडा क्षेत्र की राजनीति को झकझोर रहा है। गांव-गांव में बहस है, सत्ता पक्ष के नेताओं पर सवाल उठ रहे हैं, प्रशासन दबाव में है और सेल प्रबंधन के सामने भी अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है।

 

दुबील की चार मांगें… जिन पर टिकी है पूरी लड़ाई

आंदोलनकारी ग्रामीण अपनी चार सूत्री मांगों को लेकर पूरी मजबूती से डटे हुए हैं।
सबसे पहली और सबसे बड़ी मांग है कि दुबील गांव के लगभग 200 स्थानीय बेरोजगार युवाओं को खतियान आधारित प्राथमिकता के साथ रोजगार दिया जाए।
दूसरी मांग यह है कि खदान से निकलने वाले लाल पानी के कारण जिन किसानों की उपजाऊ जमीन बंजर हो गई है, उन्हें उचित मुआवजा दिया जाए और प्रभावित परिवारों के एक सदस्य को रोजगार मिले।
तीसरी मांग में ग्रामीणों का आरोप है कि सरना स्थल, कब्रिस्तान और रैयती जमीन पर कथित रूप से लगाए गए अवैध पिलरों को तत्काल हटाया जाए ताकि उनकी धार्मिक आस्था और निजी भूमि सुरक्षित रह सके।
चौथी मांग गांव में पेयजल संकट को दूर करने के लिए चार नए चापाकल और आठ जलमीनार स्थापित करने की है।
ग्रामीणों का कहना है कि ये मांगें किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि उनके अस्तित्व, सम्मान और भविष्य से जुड़ी हुई हैं।

अब मामला सिर्फ आंदोलन नहीं… सत्ता के भीतर प्रतिष्ठा की जंग

दुबील आंदोलन ने सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ तब लिया जब यह स्पष्ट हुआ कि खदान जगन्नाथपुर विधानसभा क्षेत्र में स्थित है, जबकि उसका प्रशासनिक कार्यालय, रेलवे साइडिंग और परिवहन मार्ग मनोहरपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
यहीं से दो विधानसभा क्षेत्रों की राजनीति आमने-सामने खड़ी होती दिखाई देने लगी।
एक ओर जगन्नाथपुर के विधायक सोनाराम सिंकू हैं, जिनके क्षेत्र में खदान और आंदोलनकारी गांव आते हैं। दूसरी ओर मनोहरपुर के विधायक जगत माझी और उनकी मां, सिंहभूम की सांसद जोबा माझी हैं, जिनके क्षेत्र से खदान का संचालन और परिवहन जुड़ा हुआ है।
यही भौगोलिक स्थिति अब राजनीतिक समीकरणों को बेहद जटिल बना रही है।

जोबा माझी और जगत माझी के साथ कथित अपमान… यहीं से बदला पूरा घटनाक्रम

ग्रामीणों की समस्या का समाधान निकालने के उद्देश्य से सांसद जोबा माझी और विधायक जगत माझी आंदोलन स्थल पहुंचे। लेकिन आंदोलनकारियों ने कथित रूप से उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं दिया।
इस घटना के बाद दोनों नेता नाराज होकर लौट गए।
राजनीतिक गलियारों में यही घटना पूरे विवाद का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट मानी जा रही है। इसके बाद आंदोलन केवल ग्रामीणों और सेल प्रबंधन के बीच का विवाद नहीं रहा, बल्कि इसमें राजनीतिक सम्मान और प्रभाव का प्रश्न भी जुड़ गया।

सोनाराम सिंकू ने संभाली कमान

जोबा माझी और जगत माझी के लौटने के बाद जगन्नाथपुर विधायक सोनाराम सिंकू सक्रिय हुए।
उन्होंने सार्वजनिक रूप से ग्रामीणों के हक और अधिकार की लड़ाई में साथ देने की बात कही।
उन्होंने जिला प्रशासन से हस्तक्षेप की अपील की तथा 10 जुलाई को मनोहरपुर रेलवे साइडिंग में सेल प्रबंधन, ठेका कंपनी और आंदोलनकारी प्रतिनिधियों के साथ वार्ता भी कराई।
हालांकि, विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार यह बैठक किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी।

अब उठ रहा सबसे बड़ा सवाल… केवल दुबील क्यों?

दुबील आंदोलन के बीच अब सारंडा क्षेत्र में एक नया सवाल तेजी से उठ रहा है।
यदि स्थानीय रोजगार और सीएसआर का लाभ केवल दुबील गांव को दिया जाएगा तो बाकी 35 गांवों के बेरोजगार युवाओं का क्या होगा?
चिड़िया खदान के सीएसआर क्षेत्र में आने वाले सभी गांवों के लोगों का कहना है कि यदि कोई नीति बने तो वह सभी गांवों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
इसी मुद्दे ने अब आंदोलन को एक गांव से निकालकर पूरे सारंडा क्षेत्र का विषय बना दिया है।

क्या 36 गांव भी उतरेंगे आंदोलन की राह पर?

सूत्रों की मानें तो कई गांवों में बैठकों का दौर शुरू हो चुका है।
यदि दुबील की मांगें मान ली जाती हैं और अन्य गांवों की अनदेखी होती है तो भविष्य में अलग-अलग गांव अपने-अपने स्तर पर आंदोलन शुरू कर सकते हैं।
ऐसी स्थिति में सेल प्रबंधन के लिए खदान संचालन बेहद कठिन हो सकता है।

सामाजिक सौहार्द पर भी मंडराने लगा खतरा

जोबा माझी और जगत माझी के कथित अपमान के बाद सारंडा क्षेत्र के कई गांवों में नाराजगी देखी जा रही है।
लोगों का कहना है कि यदि जनप्रतिनिधियों का सम्मान नहीं होगा तो संवाद की प्रक्रिया कमजोर होगी।
दूसरी ओर दुबील गांव के आंदोलनकारी अपने आंदोलन को जनहित का आंदोलन बता रहे हैं।
इस खींचतान ने गांवों के बीच आपसी विश्वास और भाईचारे पर भी असर डालना शुरू कर दिया है।

सबसे बड़ी मार मजदूरों पर

राजनीतिक बयानबाजी और आंदोलन के बीच सबसे ज्यादा नुकसान उन मजदूरों को हो रहा है जो पहले से खदान में कार्यरत हैं।
आर्थिक नाकेबंदी के कारण काम प्रभावित है और “नो वर्क, नो पे” की स्थिति में मजदूरों की आय रुक गई है।
कई परिवारों के सामने रोजमर्रा का खर्च चलाना भी चुनौती बन गया है।

सेल प्रबंधन और प्रशासन की बढ़ी मुश्किलें

एक तरफ आंदोलनकारी अपनी मांगों पर अड़े हैं।
दूसरी तरफ ठेका कंपनियां काम शुरू कराने के लिए दबाव बना रही हैं।
तीसरी ओर प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती से जूझ रहा है।
यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

अब राजनीतिक तलवारें खुलकर खिंचती दिख रही हैं

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह आंदोलन आने वाले समय में सिंहभूम की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
एक ओर सांसद जोबा माझी और विधायक जगत माझी के समर्थक हैं, तो दूसरी ओर विधायक सोनाराम सिंकू के समर्थक खुलकर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं।
हालांकि सभी नेता सार्वजनिक रूप से समाधान की बात कर रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर समर्थकों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा साफ नजर आने लगी है।

आगे क्या होगा?

* सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार समय रहते समाधान निकाल पाएगी?
* क्या ग्रामीणों की चार सूत्री मांगें पूरी होंगी?
* क्या 36 गांवों के लिए एक समान रोजगार नीति बनेगी?
* क्या सेल प्रबंधन और प्रशासइस बढ़ते विवाद को शांत कर पाएंगे?
* और सबसे महत्वपूर्ण—क्या यह आंदोलन ग्रामीण अधिकारों की जीत बनेगा या फिर राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ जाएगा?
इन सभी सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आएंगे। फिलहाल इतना तय है कि दुबील की खदान से उठी यह चिंगारी अब केवल लौह अयस्क तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने झारखंड की राजनीति, प्रशासन, सेल प्रबंधन और पूरे सारंडा क्षेत्र को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां लिया गया हर फैसला दूरगामी असर छोड़ सकता है।

SINGHBHUMHALCHAL NEWS

सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

Join WhatsApp

Join Now

Leave a Comment