जंगल सिमट रहा है, घेरे में नक्सल कमांडर—अब भावनात्मक अपील का भी दौर शुरू
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
पश्चिम सिंहभूम के घने और कभी अभेद्य माने जाने वाले सारंडा जंगल में अब नक्सलियों की सांसें घुटने लगी हैं। एक करोड़ रुपये का इनामी भाकपा माओवादी संगठन का पोलित ब्यूरो सदस्य और कुख्यात नक्सली कमांडर मिसिर बेसरा अब अपने ही बनाए जाल में फंसता नजर आ रहा है। सुरक्षा बलों की लगातार घेराबंदी, रणनीतिक दबाव और स्थानीय स्तर पर टूटते समर्थन के बीच अब उसके सामने सिर्फ दो ही रास्ते बचे हैं—या तो हथियार डालकर आत्मसमर्पण करे या फिर मुठभेड़ में मारा जाए।
यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि सारंडा के इतिहास का निर्णायक मोड़ बनता जा रहा है।

सिर्फ एक दस्ता बचा, वो भी बिखर चुका है
सूत्रों के अनुसार पूरे झारखंड में अब सक्रिय नक्सली ताकत लगभग समाप्ति की ओर है। मिसिर बेसरा का ही एक मुख्य दस्ता बचा हुआ है, जिसमें मेहनत उर्फ मोछू, सागेन अंगारिया, अश्विन समेत करीब 40-50 नक्सली शामिल हैं।
लेकिन यह संख्या भी अब केवल आंकड़ा भर रह गई है। ये नक्सली छोटे-छोटे समूहों में बंटकर सारंडा के अलग-अलग हिस्सों में छिपते फिर रहे हैं। न तो उनके पास पहले जैसा जनसमर्थन है, न ही सुरक्षित ठिकाने।
जंगल अब उनका साथ छोड़ रहा है।
चारों तरफ से शिकंजा—हर कदम पर खतरा
कोबरा, सीआरपीएफ, झारखंड जगुआर और जिला पुलिस की संयुक्त टीमों ने सारंडा को पूरी तरह से घेर रखा है।
यह कोई साधारण घेराबंदी नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध सैन्य दबाव है, जिसमें हर पहाड़ी, हर घाटी और हर संभावित ठिकाने को चिन्हित कर कार्रवाई की जा रही है।
बीते दिनों 4-5 बार अलग-अलग स्थानों पर मुठभेड़ हो चुकी है। इन मुठभेड़ों में आधा दर्जन से अधिक जवान घायल हुए हैं, लेकिन सुरक्षा बलों का मनोबल और आक्रामकता लगातार बढ़ती जा रही है।
अब नक्सलियों के लिए जंगल में छिपना भी सुरक्षित नहीं रह गया है।
परिवार के जरिए भावनात्मक दबाव—बेटा बना संदेशवाहक
इस पूरे ऑपरेशन का सबसे मार्मिक पहलू यह है कि अब मिसिर बेसरा को सरेंडर कराने के लिए उसके अपने परिवार को सामने आना पड़ा है।
सूत्र बताते हैं कि उसके बेटे और भाई के माध्यम से कई बार संदेश भेजे गए हैं। यहां तक कि उसका बेटा खुद सारंडा के विभिन्न क्षेत्रों में घूमकर अपने पिता तक पहुंचने की कोशिश कर चुका है।
बताया जा रहा है कि उसने अपने पिता के नाम एक भावुक पत्र भी लिखा—जिसमें हथियार छोड़कर घर लौट आने की अपील की गई है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है—
क्या वह संदेश मिसिर बेसरा तक पहुंच पाया?
और अगर पहुंचा, तो क्या उसके दिल तक भी पहुंचा?
भूख और डर—नक्सलियों की असली हालत उजागर
16 अप्रैल की रात कुमडीह के समीप एक इंक्रोचमेंट गांव में नक्सलियों द्वारा ग्रामीणों से चावल मांगने की घटना ने उनकी हालत को पूरी तरह उजागर कर दिया है।
जो संगठन कभी लेवी वसूलता था, अब वह खाने के लिए गांवों पर निर्भर हो गया है।
यह सिर्फ संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि टूटते नेटवर्क और खत्म होते प्रभाव का संकेत है।
सारंडा अब सुरक्षित—नक्सलियों के लिए नहीं बचा ठिकाना
सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई ने सारंडा को धीरे-धीरे नक्सल मुक्त क्षेत्र में बदल दिया है।
जहां कभी नक्सलियों का दबदबा था, वहां अब पुलिस की पकड़ मजबूत हो चुकी है। उनके पुराने ठिकाने ध्वस्त हो रहे हैं और नए ठिकाने बनाने की कोई गुंजाइश नहीं बची है।
अब यह साफ हो चुका है कि—
नक्सली अब यहां ज्यादा दिन टिक नहीं सकते।
अंतिम चेतावनी—अब विकल्प खत्म हो रहे हैं
मिसिर बेसरा और उसके साथियों के लिए यह आखिरी मौका है।
हर दिन उनके लिए खतरा बढ़ रहा है। हर रात उनके लिए अनिश्चितता से भरी है।
वे न तो खुलकर चल सकते हैं, न चैन से सो सकते हैं।
हर आहट अब उन्हें मुठभेड़ की आशंका देती है।
एक मार्मिक अपील—हथियार छोड़ो, जिंदगी चुनो
हमारी न्यूज पोर्टल के माध्यम से एक स्पष्ट और मानवीय अपील—
मिसिर बेसरा और उसके साथियों, अब भी समय है।
आप जिन आदर्शों के लिए हथियार उठाए थे, वे अब कहीं खो चुके हैं। आज आपकी लड़ाई किसी विचारधारा की नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी बचाने की है।
आपके अपने लोग—आपका बेटा, आपका परिवार—आपको वापस चाहते हैं।
जंगल नहीं, घर आपका इंतजार कर रहा है।
हथियार छोड़ना कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ा साहस है।
मुख्यधारा में लौटना हार नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।
सरकार और पुलिस तैयार—सुरक्षित सरेंडर का रास्ता खुला
सरकार और पुलिस प्रशासन ने आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए कई योजनाएं बना रखी हैं।
अगर मिसिर बेसरा और उसके साथी आत्मसमर्पण करना चाहते हैं, तो उनके लिए सुरक्षित और सम्मानजनक रास्ता उपलब्ध कराया जा सकता है।
इस दिशा में पुलिस अधिकारियों से संपर्क कर आवश्यक व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती है।

अब फैसला मिसिर बेसरा को करना है
सारंडा की कहानी अपने अंतिम अध्याय में पहुंच चुकी है।
एक तरफ सुरक्षा बलों की निर्णायक कार्रवाई है,
तो दूसरी तरफ एक बेटा अपने पिता को वापस लाने की कोशिश में भटक रहा है।
अब यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि इंसानियत और हिंसा के बीच की आखिरी लड़ाई है।
मिसिर बेसरा, अब फैसला आपका है—
👉 जंगल में अंत या घर वापसी का नया जीवन।













