कभी सुरक्षित पनाहगाह, अब बनता जा रहा है मौत का जाल
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
पश्चिम सिंहभूम जिले के गोइलकेरा थाना क्षेत्र अंतर्गत कोल्हान आरक्षित जंगल कभी नक्सलियों के लिए अभेद किला माने जाते थे। पोसैता, डेरवा, महादेवशाल, दुगुनिया, कुमडीह, रेला, पराल, गमहरिया, पाटुंग, बोरोई, सांगाजाटा, कारा और खजुरिया जैसे घने जंगलों में माओवादी सालों तक अपने संगठन का संचालन करते रहे।
यह इलाका उनके लिए न सिर्फ सुरक्षित ठिकाना था, बल्कि यहीं से वे रणनीति बनाकर बड़े हमलों को अंजाम देते थे।
लेकिन वर्ष 2025 ने इस “लाल किले” की नींव हिला दी। सुरक्षाबलों की सटीक रणनीति और आक्रामक अभियान ने नक्सलियों के दो बड़े चेहरों को खत्म कर दिया—और यहीं से शुरू हुई उनकी अंदरूनी कमजोरी की कहानी।

दो बड़े एनकाउंटर और बिखर गया नक्सली नेटवर्क
अरुण मड़कम: छत्तीसगढ़ से कोल्हान तक आतंक का नेटवर्क
12 अगस्त 2025 को मिली खुफिया सूचना ने पूरे ऑपरेशन की दिशा तय कर दी।
सूचना थी कि माओवादी शीर्ष नेता—मिसिर बेसरा, अनमोल, मोछु, अनल, असीम मंडल, अजय महतो, सागेन अंगरिया और अन्य कमांडर—कोल्हान क्षेत्र में बड़ी साजिश रच रहे हैं।
13 अगस्त की सुबह, गोइलकेरा के दुगुनिया, पोसैता और तुम्बागाड़ा के दुर्गम जंगलों में सुरक्षाबलों ने घेराबंदी की। जैसे ही जवान आगे बढ़े, नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
लेकिन इस बार जवाब भी उतना ही सख्त था।
मुठभेड़ के बाद जब सर्च ऑपरेशन चला, तो एक बड़ी सफलता हाथ लगी—
2 लाख का इनामी एरिया कमांडर अरुण करकी उर्फ वरुण उर्फ निलेश मड़कम मारा जा चुका था।
अपराधों की लंबी फेहरिस्त
* हत्या, अपहरण, पुलिस पर हमला
* विस्फोटक अधिनियम और UAPA के तहत केस
* 2019 से 2023 के बीच कई थानों में वांछित
उसके पास से एसएलआर राइफल और भारी मात्रा में कारतूस बरामद हुए—जो इस बात का प्रमाण था कि वह बड़े हमलों की तैयारी में था।
अमित हांसदा उर्फ अपटन: खौफ का दूसरा नाम खत्म
10 लाख का इनामी, कई खूनी वारदातों का मास्टरमाइंड
7 सितंबर 2025 को सुरक्षाबलों ने एक और बड़ा वार किया।
गोइलकेरा के पंचलताबुरू जंगल (रेला–पराल क्षेत्र) में हुए एनकाउंटर में जोनल कमेटी सदस्य अमित हांसदा उर्फ अपटन ढेर कर दिया गया।
यह वही नाम था, जिससे पूरा कोल्हान कांपता था।
उसके खून से सने कारनामे
* सरायकेला के कुकड़ू में 5 पुलिसकर्मियों की हत्या
* गोइलकेरा में पूर्व विधायक गुरुचरण नायक पर हमला
* 2 जवानों की हत्या और हथियार लूट
* चाईबासा जेल ब्रेक की साजिश में शामिल
अपटन की मौत सिर्फ एक नक्सली का अंत नहीं थी—यह पूरे नेटवर्क की रीढ़ टूटने जैसा था।
रमेश चांपिया की हत्या: साजिश या अंदरूनी डर?
दुगुनिया गांव निवासी पूर्व नक्सली रमेश चांपिया की हत्या ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कुछ लोग इसे मुखबिरी के शक से जोड़ रहे हैं, तो कुछ इसे ग्रामीणों में दहशत फैलाने की साजिश बता रहे हैं।
लेकिन यहां एक बड़ा तथ्य सामने आता है—
जब 2025 में ये दोनों बड़े नक्सली मारे गए, उस समय रमेश चांपिया जेल में था।
तो फिर हत्या क्यों?
* क्या यह नक्सलियों का अंदरूनी डर था?
* क्या संगठन टूटने के बाद बदले की राजनीति शुरू हुई?
* या फिर यह अपनी पकड़ बनाए रखने की आखिरी कोशिश?
सच अभी भी धुंध में है, लेकिन इतना साफ है कि नक्सली अब पहले जैसे संगठित नहीं रहे।

कोल्हान में नक्सलियों का गिरता मनोबल
दो बड़े कमांडरों की मौत के बाद नक्सली संगठन के भीतर घबराहट साफ देखी जा रही है।
ग्राउंड रियलिटी बदल चुकी है
* जंगलों में अब उनका “सुरक्षित जोन” खत्म हो रहा है
* ग्रामीणों में भी धीरे-धीरे डर कम हो रहा है
* पुलिस की लगातार घेराबंदी से सप्लाई लाइन कमजोर
जहां कभी नक्सली बेखौफ घूमते थे, आज वहीं उन्हें छिपने के लिए भी जगह तलाशनी पड़ रही है।
सुरक्षाबलों की रणनीति: सटीक, तेज और आक्रामक
झारखंड पुलिस और कोबरा 209 बटालियन की संयुक्त कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि अब रणनीति पूरी तरह बदल चुकी है।
नई रणनीति के मुख्य बिंदु
* सटीक खुफिया जानकारी पर आधारित ऑपरेशन
* जंगलों में लगातार सर्च अभियान
* लोकल नेटवर्क को कमजोर करना
* बड़े कमांडरों को टारगेट करना
यही वजह है कि 2025 में नक्सलियों को सबसे बड़ा झटका लगा।

अब बचाव नहीं, सिर्फ पतन की कहानी
गोइलकेरा और कोल्हान के जंगलों में जो कभी नक्सलियों का राज था, वह अब ढहने की कगार पर है।
अमित हांसदा और अरुण मड़कम जैसे बड़े चेहरों का खात्मा इस बात का संकेत है कि संगठन अब अपने सबसे कमजोर दौर में है।
रमेश चांपिया की हत्या जैसे घटनाक्रम यह भी दिखाते हैं कि नक्सली अब बाहरी दुश्मन से ज्यादा अंदरूनी डर से जूझ रहे हैं।
साफ संकेत
नक्सलियों का “रेड कॉरिडोर” अब सिकुड़ रहा है—
और कोल्हान के जंगलों में अब बंदूक की नहीं, कानून की गूंज सुनाई देने लगी है।














