गरीब आदिवासियों ने लड़ी लड़ाई, मलाई कौन खा गया? नोटशीट नौकरी पर उठ रहे गंभीर सवाल
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
सेल, गुवा खदान से प्रभावित सारंडा के 18 गांवों समेत गुवा को मिलाकर कुल 19 गांवों के लोगों द्वारा रोजगार, अधिकार और हिस्सेदारी को लेकर लंबे समय तक उग्र आंदोलन चलाया गया। आंदोलन कई चरणों में हुआ और आंदोलनकारी दो अलग-अलग गुटों में बंटे रहे। दोनों गुटों ने अलग-अलग मोर्चा खोलकर सेल प्रबंधन के खिलाफ धरना, प्रदर्शन और खदान ठप करने जैसी रणनीति अपनाई।
एक तरफ मंत्री दीपक बिरुआ की मौजूदगी में मानकी लागुड़ा देवगम और मुखिया राजू शांडिल के नेतृत्व वाले गुट के साथ समझौता हुआ, तो दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की मौजूदगी में मानकी सुरेश चांपिया वाले आंदोलनकारी गुट के साथ अलग समझौता किया गया।

आंदोलन की आग में तपे बेरोजगार, फिर शुरू हुई नोटशीट नौकरी की कहानी
सूत्रों के अनुसार आंदोलन के बाद सेल, गुवा प्रबंधन द्वारा 18 बेरोजगारों को नोटशीट के आधार पर रोजगार देने की प्रक्रिया शुरू की गई। जिन लोगों को रोजगार मिला, उनके लिए यह किसी वरदान से कम नहीं था। इनमें सारंडा के कई गरीब आदिवासी परिवारों के युवक शामिल हैं, जो वर्षों से रोजगार की आस में संघर्ष कर रहे थे।
लेकिन अब इसी रोजगार प्रक्रिया पर सवालों का पहाड़ खड़ा हो गया है। पूरे क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि कुछ कथित दलाल और बिचौलिया किस्म के लोगों ने बेरोजगारों की मजबूरी को धंधा बना लिया। आरोप है कि रोजगार दिलाने के नाम पर कुछ जरूरतमंद युवकों/बेरोजगारों से मोटी रकम वसूली गई।
“रोजगार चाहिए तो पैसा दो” — क्या आंदोलन के नाम पर चला वसूली का खेल?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जिन गरीब आदिवासियों ने दिन-रात खदान क्षेत्र में बैठकर संघर्ष किया, भूखे-प्यासे आंदोलन किया, उन्हीं की मजबूरी को कुछ लोगों ने कमाई का जरिया कैसे बना लिया?
अगर यह आरोप सच है, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं बल्कि सारंडा के गरीब बेरोजगारों के सपनों की खुलेआम नीलामी है।
आंदोलन के दौरान महिलाएं, युवक और ग्रामीण बारिश, धूप और कठिन परिस्थितियों में सड़क और खदान पर डटे रहे। लेकिन अब चर्चा यह है कि आंदोलन से दूर रहने वाले कुछ कथित चेहरे पर्दे के पीछे से रोजगार की “सेटिंग” कर मलाई काटने में जुट गए।
गरीबों की लड़ाई पर दलालों का कब्जा?
सारंडा के ग्रामीणों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर नौकरी पाने वालों की सूची कैसे बनी? किस आधार पर चयन हुआ? क्या आंदोलन में शामिल सभी प्रभावित गांवों को बराबर हिस्सेदारी मिली?
लोगों का कहना है कि अगर बिना किसी पैसे के योग्य बेरोजगारों को रोजगार मिला है, तो यह स्वागत योग्य कदम है। लेकिन यदि किसी गरीब युवक से नौकरी के बदले मोटी रकम ली गई है, तो यह पूरे आंदोलन और आदिवासी समाज के साथ विश्वासघात माना जाएगा।
समझौता हुआ था, लेकिन क्या सभी गांवों को मिला अधिकार?
दोनों आंदोलनकारी गुटों और सेल प्रबंधन के बीच जो लिखित समझौते हुए थे, अब उन पर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि क्या समझौते के अनुरूप सभी प्रभावित गांवों के बेरोजगारों को रोजगार में हिस्सेदारी दी गई? या फिर कुछ खास लोगों तक ही लाभ सीमित कर दिया गया?
यह भी चर्चा है कि जिन गांवों ने आंदोलन में सबसे ज्यादा भागीदारी निभाई, क्या उन्हें प्राथमिकता मिली? या फिर “सिफारिश” और “लेन-देन” का खेल भारी पड़ गया?
जांच नहीं हुई तो और भड़केगा आक्रोश
सारंडा क्षेत्र में अब मांग उठने लगी है कि पूरे रोजगार प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यह पता लगाया जाए कि किन लोगों को नोटशीट पर नौकरी मिली, चयन का आधार क्या था और कहीं इसके पीछे पैसों का लेन-देन तो नहीं हुआ।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर दलालों और बिचौलियों की भूमिका सामने आती है तो ऐसे चेहरों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में गरीब बेरोजगारों के नाम पर कोई सौदेबाजी न कर सके।
सवालों के घेरे में व्यवस्था, जवाब का इंतजार
गुवा और सारंडा में अब एक ही चर्चा है —
“क्या गरीब आदिवासियों का आंदोलन कुछ लोगों की कमाई का जरिया बन गया?”
यह सवाल सिर्फ 18 नौकरियों का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो सारंडा के ग्रामीणों ने आंदोलन और समझौते पर किया था। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सेल प्रबंधन, जनप्रतिनिधि और प्रशासन इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाते हैं।













