जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के अमर योद्धा को सैकड़ों लोगों ने किया नमन
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
पारंपरिक पूजा से हुई शुरुआत
धरती आबा शहीद बिरसा मुंडा की 126वीं पुण्यतिथि आदिवासी कल्याण केन्द्र किरीबुरू-मेघाहातुबुरु-प्रॉस्पेक्टिंग एवं आदिवासी सरना समिति के संयुक्त तत्वावधान में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। कार्यक्रम की शुरुआत समाज के दियूरी पांडू कोंगाड़ि, जयराम पाट पिंगुआ, धनुर्जय लागुरी, लोदरो स्वासी और बुद्धुआ कोंगाड़ि द्वारा पारंपरिक पूजा-अर्चना एवं प्रार्थना गीत के साथ की गई।

प्रतिमा पर अर्पित किए श्रद्धासुमन
इसके बाद समिति के सदस्यों तथा उपस्थित अतिथियों ने बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर किरीबुरू के सीजीएम पी. एम. शिरपुरकर, मेघाहातुबुरु के महाप्रबंधक प्रभारी संजय कुमार सिंह, किरीबुरू के एसडीपीओ विनीत कुमार किंडो, थाना प्रभारी रोहित कुमार, मुखिया पार्वती कीड़ो, मुखिया प्रफ्फुलित ग्लोरिया टोपनो, मुखिया लिपि मुंडा, मजदूर नेता अफताब आलम, वार्ड सदस्य शानी हेस्सा, दीपक ठाकुर, सेल के अधिकारी-कर्मचारी तथा विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

सैकड़ों लोगों ने किया नमन
कार्यक्रम में समिति के पदाधिकारी रोयाराम चांपिया, अमर सिंह सुंडी, गोपी लागुरी, बीर सिंह मुंडा, श्याम बिरुआ, सर्गेया अंगारिया, बलभद्र बिरूली, कन्हाई बिरुआ, बीरबल गुड़िया, एस. होरो, संदीप तीयू, माधव चंद्र कोड़ा, आर. के. सिंकू, दामोदर बारी, दशरथ लागुरी, बिलाइची पूर्ति, गीता लागुरी, बसंती हेंब्रम, नीतिमा पूर्ति, मीनाक्षी, राजेश मुंडा सहित सैकड़ों लोगों ने श्रद्धासुमन अर्पित किए।

25 साल की उम्र में जगा दिया था स्वाभिमान
बिरसा मुंडा ने कम उम्र में ही अंग्रेजी शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंक दिया था। उन्होंने आदिवासी समाज को जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए संगठित किया और “उलगुलान” यानी महाविद्रोह का नेतृत्व किया।

अंग्रेजी हुकूमत के लिए बन गए थे चुनौती
बिरसा मुंडा के आंदोलन ने अंग्रेजों की नींव हिला दी थी। उनके बढ़ते प्रभाव से घबराकर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 9 जून 1900 को रांची जेल में मात्र 25 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी समाज को प्रेरित कर रहे हैं।

धरती आबा आज भी हैं संघर्ष के प्रतीक
वक्ताओं ने कहा कि बिरसा मुंडा केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और अधिकारों की पहचान हैं। उनका जीवन नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता है।

बिरसा के सपनों का समाज बनाने का संकल्प
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों ने धरती आबा के आदर्शों पर चलने, सामाजिक एकता को मजबूत करने और जल, जंगल तथा जमीन की रक्षा के लिए सदैव सजग रहने का संकल्प लिया।













