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“सारंडा के जंगलों से उठी हुंकार: आदिवासियों को अधिकार दो, डीएमएफटी के 3344 करोड़ की हाईकोर्ट निगरानी में कराओ जांच”

On: June 12, 2026 1:24 PM
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राज्यपाल से मिले भारत आदिवासी पार्टी के जिलाध्यक्ष, वनाधिकार पट्टा और खनन फंड में कथित घोटालों पर खोला मोर्चा

रिपोर्ट : शैलेश सिंह

सारंडा के जंगलों में दशकों से रहने वाले हजारों आदिवासी परिवार आज भी अपने ही घर-जमीन पर अधिकार के लिए भटक रहे हैं। दूसरी ओर खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) में हजारों करोड़ रुपये जमा होने के बावजूद ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। इन्हीं गंभीर मुद्दों को लेकर भारत आदिवासी पार्टी, पश्चिम सिंहभूम के जिलाध्यक्ष सुशील बारला ने झारखंड के राज्यपाल से मुलाकात कर दो टूक शब्दों में न्याय की मांग उठाई है।

30-35 वर्षों से बसे आदिवासी, लेकिन आज तक नहीं मिला जमीन का अधिकार

राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है कि मनोहरपुर प्रखंड सहित सारंडा वन क्षेत्र के लगभग 40 से 45 वनग्रामों में 30 से 35 वर्षों से 6000 से 7000 अनुसूचित जनजाति परिवार रह रहे हैं। इन परिवारों का जीवन कृषि और वनोपज पर आधारित है, लेकिन उन्हें आज तक वनाधिकार अधिनियम-2006 के तहत अधिकार नहीं मिला।
सुशील बारला ने कहा कि दुमांगदिरी-तेन्ताई वनग्राम के 72 परिवारों ने वर्ष 2020 में ही वनाधिकार पट्टा के लिए विधिवत दावा प्रस्तुत किया था, लेकिन आज तक उन्हें अधिकार पत्र नहीं दिया गया। ऐसे में वनवासियों के सामने भविष्य को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

अभ्यारण्य की घोषणा से पहले आदिवासियों के अधिकार सुनिश्चित करने की मांग

ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि सारंडा के 31,468 हेक्टेयर क्षेत्र को वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित करने की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में 2005 के पूर्व से बसे सभी वनग्रामों और परिवारों की पहचान कर उन्हें तत्काल वनाधिकार पट्टा दिया जाए, ताकि कोई भी परिवार अपने पुश्तैनी घर और जमीन से बेदखल न हो।

संविधान की बातें कागजों में, गांव आज भी अंधेरे में

भारत आदिवासी पार्टी ने आरोप लगाया कि संविधान प्रदत्त शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से सारंडा के वनग्राम आज भी वंचित हैं। आजादी के दशकों बाद भी हजारों लोग बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

3344 करोड़ का डीएमएफटी फंड, लेकिन गांवों में बदहाली क्यों?

सुशील बारला ने अपने दूसरे ज्ञापन में जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) के फंड के उपयोग पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम सिंहभूम देश के सबसे बड़े लौह अयस्क उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। चिरिया, गुवा, किरीबुरू-मेघाहातुबुरू, नोवामुंडी समेत कई खदानों से करोड़ों रुपये की खनिज संपदा निकलती है।
उन्होंने दावा किया कि अगस्त 2025 तक डीएमएफटी में 3344 करोड़ रुपये जमा किए जा चुके हैं, जिनका उपयोग खनन प्रभावित गांवों के विकास, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और सिंचाई जैसी योजनाओं में होना चाहिए था। लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट दिखाई देती है।

खनन से निकला लोहा, लेकिन ग्रामीणों को नहीं मिला विकास

ज्ञापन में कहा गया है कि खनन प्रभावित गांवों के लोग आज भी गरीबी, बेरोजगारी और पलायन की मार झेल रहे हैं। रोजगार के अभाव में युवा दूसरे राज्यों में असुरक्षित पलायन करने को मजबूर हैं।
सबसे गंभीर आरोप पेयजल योजनाओं को लेकर लगाए गए हैं। कहा गया है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद ग्रामीण आज भी नदी-नालों का पानी पीने को विवश हैं।

कागजों में घर-घर पानी, जमीन पर सूखी पाइपलाइन

लाईलोर पंचायत में स्थापित 12 लाख लीटर क्षमता वाले जलमीनार से नौ गांवों को पानी पहुंचाने का दावा किया गया, लेकिन कई गांवों में आज तक पाइपलाइन नहीं बिछी।
इसी तरह हाकागुई, जोजोगुटू, रायकेरा और मकराण्डा जलापूर्ति योजनाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। आरोप है कि अधिकांश योजनाओं में भारी राशि की निकासी हो चुकी है, लेकिन गांवों तक पानी नहीं पहुंचा।
सुशील बारला ने दावा किया कि विभागीय दस्तावेजों में हजारों परिवारों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की बात कही गई है, जबकि वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है।

हाईकोर्ट की निगरानी में जांच की मांग

भारत आदिवासी पार्टी ने राज्यपाल से मांग की है कि—
* सारंडा के 2005 के पूर्व से बसे सभी वनग्रामों की पहचान कर वनाधिकार पट्टा दिया जाए।
* सभी वनग्रामों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
* डीएमएफटी की वर्ष 2022-23, 2023-24 और 2024-25 की योजनाओं एवं चयन प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
* लाईलोर, हाकागुई, जोजोगुटू, रायकेरा और मकराण्डा की ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं की माननीय उच्च न्यायालय की निगरानी में जांच हो।
* जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और संवेदकों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।

“खनिज संपदा हमारी, लेकिन विकास किसका?”

सारंडा के आदिवासियों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस धरती से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाला लौह अयस्क निकल रहा है, उसी धरती के लोग आज भी अधिकार, पानी, सड़क और रोजगार के लिए संघर्ष क्यों कर रहे हैं। राज्यपाल को सौंपा गया यह ज्ञापन अब प्रशासन और सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

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