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“कोर्ट में मामला लंबित, फिर भी बायोमेट्रिक लागू करने की जल्दबाजी क्यों? – रामा पाण्डे और राजेन्द्र सिंधिया”

On: June 12, 2026 1:37 PM
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एएलसी, सेल प्रबंधन और यूनियन के बीच त्रिपक्षीय वार्ता, 15 जून की सुनवाई तक यथास्थिति बनाए रखने की मांग

रिपोर्ट : शैलेश सिंह

झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ के केंद्रीय अध्यक्ष रामा पाण्डे और महामंत्री राजेन्द्र सिंधिया ने संयुक्त रूप से कहा है कि जब बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली का मामला सीजीआईटी कोर्ट में विचाराधीन है, तब तक सेल प्रबंधन को किसी भी प्रकार का एकतरफा निर्णय लेने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायालय के आदेश से पहले सेवा शर्तों में बदलाव करना औद्योगिक विवाद को जन्म दे सकता है।
12 जून को किरीबुरू हिलटॉप स्थित केटीआई कॉन्फ्रेंस रूम में एएलसी, सेल प्रबंधन और झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ के बीच वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को लेकर महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक में यूनियन की ओर से राजेन्द्र सिंधिया ने कर्मचारियों का पक्ष रखा, जबकि केंद्रीय अध्यक्ष रामा पाण्डे ने औद्योगिक शांति बनाए रखने पर जोर दिया।

“1973 से लागू प्रमाणित नियमों को बदले बिना बायोमेट्रिक नहीं”

राजेन्द्र सिंधिया ने बैठक में कहा कि खदानों में वर्ष 1973 से Certified Standing Order लागू है, जिसे सक्षम सरकार द्वारा स्वीकृति प्राप्त है। कर्मचारी आज तक अटेंडेंस रूल की धारा 16 (बी) और (सी) के तहत उपस्थिति दर्ज करते आ रहे हैं। मौजूदा नियमों में बायोमेट्रिक प्रणाली का कोई प्रावधान नहीं है और बिना आवश्यक संशोधन के इसे लागू करना उचित नहीं होगा।
उन्होंने बताया कि इसी मुद्दे को लेकर यूनियन ने सीजीआईटी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और मामला अभी न्यायालय में लंबित है।

“धारा-33 के रहते सेवा शर्तों में बदलाव नहीं हो सकता”

यूनियन नेताओं ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा-33 के अनुसार जब कोई मामला न्यायालय में विचाराधीन हो, तब तक प्रबंधन कर्मचारियों की सेवा शर्तों में एकतरफा परिवर्तन नहीं कर सकता। इसके बावजूद 15 जून से बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू करने का सर्कुलर जारी किया गया है, जिसके खिलाफ यूनियन ने पुनः सीजीआईटी कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई है। इस मामले की सुनवाई भी 15 जून को निर्धारित है।

एएलसी ने भी कानूनी प्रक्रिया के पालन पर दिया जोर

बैठक के दौरान एएलसी चाईबासा-सह-हजारीबाग ने कहा कि मामला न्यायालय के अधीन है, इसलिए सभी पक्षों को कानून का सम्मान करना चाहिए और खदानों में औद्योगिक संबंधों को प्रभावित करने वाली स्थिति से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक न्यायालय का निर्णय नहीं आता, वह इस मामले में कोई आदेश नहीं दे सकते।

“आईआर प्रॉब्लम हुई तो जिम्मेदारी प्रबंधन की होगी”

केंद्रीय अध्यक्ष रामा पाण्डे ने बैठक में स्पष्ट कहा कि यदि न्यायालय के आदेश से पहले प्रबंधन बायोमेट्रिक व्यवस्था को लागू करने का प्रयास करता है और उससे औद्योगिक विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी सेल प्रबंधन की होगी।
रामा पाण्डे और राजेन्द्र सिंधिया ने संयुक्त रूप से कहा कि 15 जून को न्यायालय में होने वाली सुनवाई और आदेश आने तक खदानों में पूर्व से चली आ रही उपस्थिति व्यवस्था को यथावत रखा जाना चाहिए, ताकि श्रमिकों और प्रबंधन के बीच अनावश्यक टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो।

बैठक में रहे उपस्थित

बैठक में किरीबुरू इकाई की ओर से महामंत्री राजेन्द्र सिंधिया, संजय तिग्गा, लखन चांपिया, प्रभा सिद्धू एवं भीमसेन महानता, मेघाहातुबुरू इकाई की ओर से संयुक्त महामंत्री इंतखाब आलम, आफताब आलम लाली और कमता प्रसाद तथा गुआ इकाई की ओर से केंद्रीय अध्यक्ष रामा पाण्डे एवं रितेश पाणिग्रही उपस्थित थे।
बैठक में कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका और मामले को न्यायालय की अगली सुनवाई तक स्थगित कर दिया गया।

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