जहां लोग बंजर समझते थे जमीन, वहां एक युवक ने उगा दिए फल-सब्जियों के बागान; युवाओं के लिए बना मिसाल
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा जंगल की लगभग तीन हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर, जहां चारों तरफ सिर्फ पत्थर, लौह अयस्क और बंजर जमीन नजर आती है, वहीं अब हरियाली की नई कहानी लिखी जा रही है। सेल नगरी किरीबुरू शहर के बीच स्थित श्री लोकेश्वरनाथ मंदिर Shri Lokeshwarnath Temple के बगल की खाली पड़ी भूमि पर ठेकेदार अरबिंद चौहान ने वह कर दिखाया है, जिसे लोग असंभव मानते थे।
लौह अयस्क से भरी कठोर पहाड़ी जमीन पर उन्होंने ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत कर यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो पत्थरों में भी हरियाली उगाई जा सकती है।

बंजर पहाड़ी पर फलों और सब्जियों का संसार
जहां कभी सूनी और वीरान जमीन थी, वहां आज 550 पपीते, 100 केले के पौधे, लीची, आम, चीकू, अंगूर, सतालू, गन्ना और लौकी, नेनुआ, करैला, भिंडी, टमाटर, हरी मिर्च, बैंगन जैसी दर्जनों फसलें लहलहा रही हैं।
यह खेती सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि एक संदेश है—प्रकृति के साथ जुड़कर आत्मनिर्भर बनने का।

बारिश के पानी से सिंचाई, बिना रासायनिक खाद के खेती
इस पहाड़ी पर पानी का कोई स्थायी स्रोत नहीं है। मंदिर के पास स्थित तालाब में वर्षा का पानी जमा होता है और उसी के सहारे समय-समय पर सिंचाई की जाती है।
सबसे खास बात यह है कि यहां उगाई जा रही सारी सब्जियां और फल पूरी तरह ऑर्गेनिक हैं। यानी बिना किसी रासायनिक खाद के। इससे न सिर्फ मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है बल्कि लोगों को शुद्ध और ताजी सब्जियां भी मिलती हैं।

युवाओं के लिए बड़ा संदेश: नौकरी ही नहीं, खेती भी है भविष्य
अरबिंद चौहान कहते हैं—
“कौन कहता है कि इन पहाड़ों पर खेती नहीं हो सकती? मैंने इसे चुनौती माना और शुरुआत की। आज परिणाम सबके सामने है।”
उनका मानना है कि अगर युवा अपने खाली समय का उपयोग खेती और बागवानी में करें, तो न सिर्फ वे आर्थिक रूप से मजबूत बन सकते हैं, बल्कि शारीरिक और मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहेंगे।
आज के दौर में जहां युवा मोबाइल, नशा और गलत संगत की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं, वहां यह पहल बताती है कि धरती से जुड़ना ही असली समृद्धि है।

खेत से सीधे थाली तक
यहां उग रही ताजी सब्जियां खरीदने के लिए स्थानीय लोग सीधे खेत तक पहुंच रहे हैं। बाजार की मिलावटी और केमिकल वाली सब्जियों के मुकाबले यह लोगों के लिए स्वास्थ्य का बेहतर विकल्प बन रही है।

सारंडा की पहाड़ियों से निकला आत्मनिर्भरता का संदेश
सारंडा की यह कहानी सिर्फ खेती की नहीं, बल्कि सोच बदलने की कहानी है। यह साबित करती है कि अगर पहाड़ों पर खेती हो सकती है, तो बेरोजगारी और खालीपन भी हरियाली में बदला जा सकता है।
आज जरूरत है कि युवा इस मॉडल को अपनाएं। अपने घरों, बागानों और खाली जमीनों को खेती से जोड़ें। इससे रोजगार भी मिलेगा, स्वास्थ्य भी सुधरेगा और समाज भी मजबूत बनेगा।
सारंडा की इस बंजर पहाड़ी पर उगी हरियाली अब सिर्फ फसल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद का बीज बन चुकी है।








