नक्सल प्रभावित सारंडा के जंगलों से निकली इंसानियत की ऐसी मिसाल, जिसने 20 वर्षों से अनाथ बच्चों को मां का प्यार, शिक्षा, सम्मान और नई जिंदगी दी; अब ग्रामीण पद्मश्री सम्मान की कर रहे हैं मांग।
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
नक्सल प्रभावित सारंडा के घने जंगलों में गोलियों की आवाज, गरीबी और अभाव की कहानियां अक्सर सुर्खियां बनती हैं। लेकिन इन्हीं जंगलों के बीच छोटानागरा गांव में एक ऐसी कहानी भी सांस ले रही है, जिसे सुनकर आंखें नम हो जाती हैं और रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
यह कहानी है विधवा आदिवासी महिला हेरो पूर्ति की। एक ऐसी मां, जिसने अपनी कोख से जन्मे बच्चों तक ही अपने मातृत्व को सीमित नहीं रखा, बल्कि उन मासूमों को भी गले लगाया, जिनके सिर से माता-पिता का साया हमेशा के लिए उठ चुका था। पिछले करीब 20 वर्षों से हेरो पूर्ति न जाने कितने अनाथ और बेसहारा बच्चों की जिंदगी में उम्मीद का सूरज बनकर उभरी हैं।
तीन मासूम अनाथ बच्चों और बहू के साथ हेरो पूर्तिपति का साथ छूटा, लेकिन नहीं टूटा हौसला
हेरो पूर्ति की शादी छोटानागरा निवासी स्वर्गीय राम सिंह पूर्ति से हुई थी। तीन वर्ष पहले पति का निधन हो गया। लेकिन पति के जाने के बाद भी उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य नहीं बदला।
छोटानागरा चौक पर एक छोटी-सी दुकान चलाकर वह न केवल अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करती हैं, बल्कि उसी दुकान की कमाई से अनाथ बच्चों की पूरी जिंदगी संवारने का बीड़ा भी उठाए हुए हैं।
एक दर्द जिसने बदल दी पूरी जिंदगी
हेरो पूर्ति बताती हैं कि शादी के बाद उन्होंने देखा कि सारंडा के कई गांवों में ऐसे बच्चे हैं, जिनके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है। कई बच्चों को पिता या मां छोड़कर दूसरी शादी कर चुके थे। वे मासूम दर-दर भटक रहे थे।
उनकी आंखों में वह दर्द इतना गहरा उतर गया कि रातों की नींद उड़ गई।
वर्ष 2006 में उन्होंने संकल्प लिया कि चाहे उन्हें खुद भूखा रहना पड़े, चाहे दिन-रात मेहनत करनी पड़े, लेकिन कोई भी अनाथ बच्चा प्यार, भोजन और शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा।
यही संकल्प आज उनके जीवन का मिशन बन चुका है।
दुकान की कमाई से लिख रही हैं बच्चों की तकदीर
हेरो पूर्ति की आय का कोई बड़ा स्रोत नहीं है। छोटानागरा चौक की छोटी-सी दुकान ही उनकी दुनिया है।
उसी दुकान से होने वाली कमाई से वे बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन, कपड़े, किताबें, स्कूल की फीस, खिलौने, साइकिल और जरूरत की हर चीज उपलब्ध कराती हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि बच्चों को वे पिस्ता, बादाम, काजू, दूध जैसे पौष्टिक आहार भी खिलाती हैं, ताकि वे किसी संपन्न परिवार के बच्चों से कम महसूस न करें।

सिर्फ पालती नहीं, बेटियों को सम्मान के साथ विदा भी करती हैं
हेरो पूर्ति केवल बच्चों का पालन-पोषण नहीं करतीं, बल्कि उन्हें पढ़ाती-लिखाती हैं और जब वे बड़े हो जाते हैं तो उनकी शादी भी पूरे सम्मान और धूमधाम से कराती हैं।
अब तक उन्होंने कई अनाथ बेटियों और बेटों का जीवन संवारा है।
इनमें लेम्बरे गांव की बालिमा बांडीग, बढ़ुईआ की तुर्ली चांपिया, राकाडबरा की चारिबा चांपिया, बाइहातु के बिरलू चांपिया, जामकुंडिया के राधगढ़ देवगम सहित कई बच्चों को पाल-पोसकर पढ़ाया और फिर उनकी शादियां अपने खर्च पर कराईं।
शादी में आने वाले मेहमानों के लिए खस्सी का मांस बनवाया जाता है, ताकि किसी बेटी की विदाई में सम्मान की कोई कमी न रह जाए।
आज भी कई मासूमों की मां बनी हुई हैं हेरो पूर्ति
आज भी उनके घर में कई अनाथ बच्चे पल रहे हैं।
राकाडबरा की सुमि पूर्ति को चाईबासा के सेंट जेवियर्स स्कूल में पढ़ाया जा रहा है। उसके रहने की व्यवस्था पाताहातु में किराए के मकान में की गई है।
जामकुंडिया गांव के कृष्णा पूर्ति को मनोहरपुर स्थित सुभाष चंद्र बोस मॉडर्न स्कूल में पढ़ाया जा रहा है।
होलॉन्गउली गांव की मरियम पूर्ति, ढुलाईगड़ा की सान्नमी पूर्ति और राकाडबरा के मासूम माटू चेरवा सहित कई बच्चे आज भी उनके संरक्षण में हैं।
माटू चेरवा को तो तब घर लाया गया था, जब उसकी छठी तक नहीं हुई थी और उसके माता-पिता दोनों की मृत्यु हो चुकी थी।

अनाथ बच्चों को देती हैं अपनी पहचान
हेरो पूर्ति कहती हैं कि जब कोई बच्चा उनके घर आता है तो वह केवल आश्रय नहीं पाता, बल्कि एक नई पहचान भी पाता है।
वह बच्चों को अपना नाम और ‘पूर्ति’ उपनाम देती हैं, ताकि उन्हें कभी यह महसूस न हो कि वे अकेले हैं।
उनके लिए हर बच्चा अपना है।
जब लगा गलत आरोप, तब भी नहीं डगमगाए कदम
समाज सेवा का रास्ता आसान नहीं होता।
एक समय कुछ लोगों ने छोटानागरा थाना में शिकायत कर दी कि हेरो पूर्ति छोटे-छोटे बच्चों को गलत तरीके से अपने घर में रखती हैं।
पुलिस ने उन्हें थाने बुलाकर पूछताछ की।
लेकिन जब पूरी सच्चाई सामने आई तो पुलिस भी भावुक हो गई और कहा कि वे समाज का बहुत बड़ा काम कर रही हैं। इसके बाद उन्हें कभी परेशान नहीं किया गया।
पूरा परिवार बना मानवता का साथी
हेरो पूर्ति बताती हैं कि उनके बेटे अमित पूर्ति और बहू गीता सुंडी भी इस नेक कार्य में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देते हैं।
उनकी बेटी, जो जमशेदपुर के ब्रह्मानंद अस्पताल में कार्यरत है, उसने भी एक अनाथ बच्ची को अपने साथ रखकर उसकी जिम्मेदारी उठाई है।
हेरो पूर्ति कहती हैं—
“यह मेरा जुनून है। मेरी मौत के बाद ही यह काम रुकेगा। जब तक सांस है, तब तक अनाथ बच्चों की सेवा करती रहूंगी।”

सारंडा के ग्रामीण बोले—यह महिला पद्मश्री की हकदार है
सारंडा के बालिबा गांव के मुंडा बिनोद होनहागा, सारंडा पीढ़ के मानकी लागुड़ा देवगम, पूर्व जिला परिषद सदस्य बामिया माझी तथा जोजोगुट्टू के मुंडा कानू राम देवगम सहित अनेक ग्रामीणों का कहना है कि हेरो पूर्ति जैसी महिला पूरे देश के लिए प्रेरणा हैं।
उनका कहना है कि अपनी छोटी-सी दुकान की कमाई से जिस तरह वह अनाथ बच्चों को किसी अमीर परिवार की तरह सुविधाएं देती हैं, वैसा उदाहरण बहुत कम देखने को मिलता है।
ग्रामीणों ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस के अवसर पर उन्हें सम्मानित किया जाएगा। साथ ही राज्य और केंद्र सरकार से मांग की जाएगी कि हेरो पूर्ति को पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया जाए।
सारंडा के जंगलों में जल रही इंसानियत की मशाल
जहां एक ओर सारंडा का नाम कभी नक्सलवाद, गरीबी और भय के कारण सुर्खियों में रहता था, वहीं दूसरी ओर हेरो पूर्ति जैसी महिला यह साबित कर रही हैं कि इंसानियत की सबसे बड़ी ताकत प्रेम और सेवा है।
उन्होंने न कोई संस्था बनाई, न चंदा मांगा और न ही किसी सरकारी सहायता का इंतजार किया।
अपने पसीने की कमाई से उन्होंने उन बच्चों को नई जिंदगी दी, जिनके जीवन में अंधेरा ही अंधेरा था।
आज जिन बच्चों की हंसी गूंज रही है, जिनकी शादियां हो चुकी हैं और जो सम्मान के साथ अपना जीवन जी रहे हैं, उनकी मुस्कान के पीछे अगर किसी का सबसे बड़ा योगदान है तो वह है—हेरो पूर्ति।

आखिर में…
सारंडा के घने जंगलों में रहने वाली यह साधारण आदिवासी महिला असाधारण काम कर रही है। बिना किसी प्रचार, बिना किसी पुरस्कार और बिना किसी सरकारी सहयोग के पिछले दो दशकों से वह मानवता की ऐसी इबारत लिख रही हैं, जिसे पढ़कर हर संवेदनशील व्यक्ति की आंखें नम हो जाएंगी।
आज जरूरत इस बात की है कि हेरो पूर्ति जैसी गुमनाम नायिकाओं को देश पहचान दे, सम्मान दे और आने वाली पीढ़ियों के सामने उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करे।
क्योंकि मां वह नहीं, जो सिर्फ जन्म दे… मां वह भी होती है, जो किसी अनाथ की जिंदगी में जीने की वजह बन जाए।














