प्रोजेक्ट सेंट्रल स्कूल, किरीबुरू ने जन्म प्रमाण पत्र समय पर जमा नहीं होने पर तीन बच्चों का नाम काटा, शिक्षा का अधिकार बना बड़ा सवाल।
मुखिया के आवेदन पर हुआ था नामांकन, परीक्षा भी दी, फिर अचानक स्कूल से बाहर—प्रशासनिक कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल !
रिपोर्ट : शैलेश सिंह।
शिक्षा को बच्चों का मौलिक अधिकार माना जाता है, लेकिन सरकारी प्रक्रियाओं में देरी और प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा एक बार फिर तीन मासूम बच्चों को भुगतना पड़ा है। जन्म प्रमाण पत्र समय पर उपलब्ध नहीं होने के कारण प्रोजेक्ट सेंट्रल स्कूल, किरीबुरू प्रबंधन ने तीन बच्चों का नाम विद्यालय से काट दिया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे मामले का जिम्मेदार कौन है—अभिभावक, प्रशासन या फिर व्यवस्था?

इन तीन बच्चों का कटा नाम
विद्यालय से जिन बच्चों का नाम काटा गया है, उनमें तनिष पान (पिता- हिमांशु पान, माता- आरती पान), अनुश्री अंगारिया (पिता- जानुम सिंह अंगारिया, माता- सुनीता अंगारिया), दोनों निवासी मुर्गापाड़ा, किरीबुरू तथा असुमित कुमार (पिता- मुकेश कुमार यादव), निवासी बैंक मोड़, किरीबुरू शामिल हैं।

मुखिया के आवेदन पर मिला था प्रवेश
विद्यालय की प्राचार्या सुधा सिंह ने बताया कि नामांकन के समय तीनों बच्चों के अभिभावक जन्म प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं करा सके थे। हालांकि किरीबुरू पश्चिम और मेघाहातुबुरु दक्षिण पंचायत की मुखिया द्वारा लिखित आवेदन दिया गया था कि बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र के लिए आवेदन नोवामुंडी प्रखंड कार्यालय को भेज दिया गया है और प्रमाण पत्र बनते ही विद्यालय को उपलब्ध करा दिया जाएगा/ ये बच्चा किरीबुरू का निवासी है, इनके परिवार को जानती हूं।
इसी लिखित आश्वासन के आधार पर विद्यालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए तीनों बच्चों का नामांकन कर लिया। बच्चे नियमित रूप से विद्यालय आते रहे और जुलाई माह में आयोजित रूटीन परीक्षा में भी अन्य विद्यार्थियों के साथ शामिल हुए।

नियमों के आगे मजबूर हुआ विद्यालय
प्राचार्या के अनुसार निर्धारित समय सीमा तक जन्म प्रमाण पत्र जमा नहीं होने के कारण विद्यालय प्रबंधन बोर्ड एवं शिक्षा विभाग के नियमों के तहत बच्चों का परीक्षा परिणाम जारी नहीं कर सकता था। ऐसी स्थिति में विद्यालय के पास बच्चों का नामांकन निरस्त करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा। इस मामले में संबंधित लोगों से संपर्क कर निरंतर जन्म प्रमाण पत्र उपलब्ध कराने का भी आग्रह किया जाता रहा लेकिन उपलब्ध नहीं कराया गया।
अब सवाल नोवामुंडी प्रखंड कार्यालय पर
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब दोनों पंचायतों की मुखिया ने जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए अभिभावकों का आवेदन प्रखंड कार्यालय को अग्रसारित किया था, तो आखिर प्रमाण पत्र क्यों नहीं बन पाया? यदि बन गया था तो वह अभिभावकों तक क्यों नहीं पहुंचा? और यदि नहीं बना, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? अभिभावक, मुखिया या प्रखंड प्रशासन ?
इन सवालों का जवाब मिलना अभी बाकी है, लेकिन इस प्रशासनिक ढिलाई की सबसे बड़ी कीमत तीन मासूम बच्चों को अपनी पढ़ाई से चुकानी पड़ रही है।

बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी भी स्थिति में बच्चों की शिक्षा बाधित नहीं होनी चाहिए। संबंधित विभागों को समन्वय बनाकर ऐसे मामलों का समयबद्ध समाधान करना चाहिए, ताकि किसी बच्चे का भविष्य कागजी प्रक्रिया की भेंट न चढ़े।
निष्पक्ष जांच और त्वरित समाधान की मांग
यह मामला केवल तीन बच्चों का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। यदि समय रहते जन्म प्रमाण पत्र बन जाता या संबंधित विभाग आवश्यक पहल करता, तो आज इन बच्चों को विद्यालय से बाहर नहीं होना पड़ता। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों की जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ तीनों बच्चों की शिक्षा निर्बाध जारी रखने के लिए तत्काल समाधान निकालना समय की मांग है।














