“आधी रोटी खाएंगे, फिर भी पढ़ेंगे”… लेकिन दो बसों में कैद हो गया सारंडा के बच्चों का भविष्य।
15 गांवों के बच्चों के लिए सिर्फ दो बस, खतरनाक घाटी और लंबी दूरी बनी सबसे बड़ी चुनौती
ग्रामीणों की मांग- अतिरिक्त बस मिले या करमपदा व थोलकोबाद के स्कूलों का जल्द हो उत्क्रमण
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
नक्सल प्रभावित सारंडा के करमपदा, थोलकोबाद समेत आसपास के गांवों में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली सोमवार को सड़क पर उतर आई। करमपदा गांव के समीप किरीबुरू-थोलकोबाद मुख्य चौक पर ग्रामीणों और स्कूली बच्चों ने सेल (SAIL) किरीबुरू प्रबंधन की दोनों स्कूल बसों को सुबह से ही रोक दिया। बच्चों और अभिभावकों का आरोप है कि वर्षों से चली आ रही इस समस्या के बावजूद न तो सेल प्रबंधन और न ही प्रशासन ने कोई ठोस समाधान निकाला। नतीजा यह है कि हर दिन दर्जनों बच्चे स्कूल जाने से वंचित रह जाते हैं।
बस रोककर प्रदर्शन कर रहे बच्चों ने हाथों में किताबें लेकर कहा, “हम आधी रोटी खाएंगे, फिर भी स्कूल जाएंगे। हमें खूब पढ़ना है, जीवन में आगे बढ़ना है।” लेकिन उनकी यह इच्छा शिक्षा व्यवस्था की लचर हालत के सामने दम तोड़ती नजर आ रही है।

दो बसों पर 15 गांवों के बच्चों का बोझ
ग्रामीणों ने बताया कि सेल, किरीबुरू प्रबंधन ने अपनी सीएसआर योजना के तहत करमपदा, थोलकोबाद समेत लगभग 15 गांवों के बच्चों को किरीबुरू स्थित विभिन्न स्कूलों तक लाने-ले जाने के लिए केवल दो स्कूल बस उपलब्ध कराई है। शुरुआत में यह व्यवस्था पर्याप्त थी, लेकिन अब विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ गई है। ऐसे में बसों में क्षमता से अधिक बच्चे हो जाते हैं।
सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए बस चालक निर्धारित क्षमता से अधिक बच्चों को बस में बैठाने से इनकार कर देते हैं। इसका सीधा असर उन बच्चों पर पड़ता है जो रोजाना स्कूल जाने के लिए बस पर निर्भर हैं। कई छात्र-छात्राएं मजबूर होकर घर लौट जाते हैं और उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है।
40 किलोमीटर दूर स्कूल, गांव में नहीं उच्च शिक्षा
ग्रामीणों ने बताया कि थोलकोबाद और करमपदा से किरीबुरू की दूरी लगभग 25 से 40 किलोमीटर तक है। यानी कई बच्चों को रोजाना करीब 80 किलोमीटर तक सफर करना पड़ता है। सारंडा के अधिकांश गांवों में आठवीं या उससे आगे की पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं है। उच्च शिक्षा के लिए बच्चों को किरीबुरू या मेघाहातुबुरु ही जाना पड़ता है।
लंबी दूरी, उबड़-खाबड़ और संकरी पहाड़ी सड़कें, खतरनाक घाटियां और सीमित बस सेवा बच्चों की शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा बन गई हैं। कई बार बस छूट जाने पर बच्चों का पूरा दिन खराब हो जाता है।
खतरनाक रास्ते के कारण चालक भी मजबूर
ग्रामीणों का कहना है कि बस चालकों की भी अपनी मजबूरी है। किरीबुरू से सारंडा की ओर जाने वाला रास्ता पहाड़ी, घुमावदार और खतरनाक घाटियों से होकर गुजरता है। ऐसे में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाना दुर्घटना का कारण बन सकता है। इसलिए चालक सुरक्षा के मद्देनजर अतिरिक्त बच्चों को बस में चढ़ाने से मना कर देते हैं। लेकिन इसका खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।
ग्रामीणों ने रखी दो प्रमुख मांगें
प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों और अभिभावकों ने सरकार और सेल प्रबंधन के सामने दो प्रमुख मांगें रखी हैं—
* सीएसआर योजना के तहत तत्काल अतिरिक्त स्कूल बस उपलब्ध कराई जाए, ताकि सभी बच्चों को नियमित रूप से स्कूल पहुंचाया जा सके।
* यदि अतिरिक्त बस उपलब्ध कराना संभव नहीं है तो थोलकोबाद स्कूल को कम से कम आठवीं तक तथा करमपदा स्कूल को दसवीं या प्लस-टू स्तर तक जल्द उत्क्रमित किया जाए, ताकि बच्चों को रोजाना लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़े।
ग्रामीणों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर बेहतर शिक्षा की व्यवस्था होने से बच्चों का समय बचेगा, पढ़ाई में सुधार होगा और अभिभावकों की चिंता भी कम होगी।
बच्चों का भविष्य दांव पर
प्रदर्शन के दौरान बच्चों की आंखों में बेहतर भविष्य का सपना साफ दिखाई दे रहा था। उनका कहना था कि वे पढ़-लिखकर अपने परिवार और समाज का नाम रोशन करना चाहते हैं। लेकिन संसाधनों की कमी और शिक्षा व्यवस्था की अनदेखी उनके सपनों को अधूरा छोड़ रही है।
ग्रामीणों ने कहा कि सरकार शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करती है, लेकिन सारंडा जैसे दूरदराज के इलाकों में आज भी बच्चे केवल बस की कमी के कारण स्कूल नहीं पहुंच पा रहे हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।
प्रशासन और सेल से तत्काल हस्तक्षेप की मांग
ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया तो उनका आंदोलन और तेज होगा। उन्होंने जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग तथा सेल किरीबुरू प्रबंधन से तत्काल हस्तक्षेप कर समस्या का समाधान करने की मांग की है।
सारंडा के लोगों का कहना है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र में शिक्षा ही विकास और बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम है। यदि बच्चों को समय पर स्कूल पहुंचाने की व्यवस्था नहीं होगी तो क्षेत्र के विकास के सभी दावे खोखले साबित होंगे।
सवाल जो जवाब मांग रहा है
आज सारंडा के मासूम बच्चे सिर्फ एक अतिरिक्त बस नहीं मांग रहे, बल्कि अपने सपनों को मंजिल तक पहुंचाने का अधिकार मांग रहे हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार और सेल प्रबंधन इन बच्चों की पुकार सुनेंगे, या फिर “आधी रोटी खाएंगे, फिर भी पढ़ेंगे” का उनका संकल्प व्यवस्था की उदासीनता के आगे दम तोड़ देगा?














