9 वन ग्रामों तक पहुंची पक्की सड़क, लेकिन बालिबा के हिस्से अब भी कीचड़, दलदल और उपेक्षा
रिपोर्ट शैलेश सिंह
अरबों के राजस्व और करोड़ों के DMFT फंड के बावजूद 7 किमी सड़क का सपना अधूरा
सारंडा। पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा जंगल का सबसे चर्चित और ऐतिहासिक गांव बालिबा आजादी के 78 वर्ष बाद भी विकास की मूलभूत सुविधा सड़क के लिए संघर्ष कर रहा है। विडंबना यह है कि जिस गांव की पहचान कभी देश की सबसे बड़ी नक्सली घटनाओं में से एक के कारण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी, उसी गांव तक आज भी पक्की सड़क नहीं पहुंच सकी है।
ग्रामीणों का दर्द यह है कि ब्रिटिश शासन द्वारा वर्ष 1917 में बसाए गए इस वन ग्राम को करीब 110 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज भी लगभग 7 किलोमीटर कच्ची सड़क ही उनकी जीवनरेखा बनी हुई है। बरसात में यह सड़क दलदल में बदल जाती है, जिससे गांव का संपर्क लगभग टूट जाता है।

अंग्रेजों ने बसाया था बालिबा
जानकारी के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने सारंडा के घने जंगलों में वन संपदा के दोहन के उद्देश्य से अलग-अलग वर्षों में थोलकोबाद, करमपदा, भनगांव, नोवागांव, कुमड़ी, तिरिलपोसी, बिटकिलसोय, बालिबा, दीघा और नवागांव जैसे वन ग्राम बसाए थे। इन गांवों में बाहर से आदिवासी परिवारों को लाकर बसाया गया और उन्हें वन ग्राम का दर्जा दिया गया।
इन ग्रामीणों से साल की लकड़ियों की कटाई, लोडिंग और परिवहन का काम कराया जाता था। आज समय बदल चुका है, लेकिन बालिबा की तस्वीर अब भी विकास से कोसों दूर है।
नौ गांवों तक सड़क, बालिबा आज भी इंतजार में
ग्रामीणों का कहना है कि इन वन ग्रामों में से नौ गांवों तक सरकार ने किसी न किसी रूप में पक्की सड़क पहुंचा दी, लेकिन बालिबा आज भी इससे वंचित है।
छोटानागरा से कुदलीबाद होते हुए थोलकोबाद तक पक्की सड़क है, लेकिन बालिबा चौक से बालिबा गांव तक लगभग सात किलोमीटर सड़क आज भी कच्ची है।
बरसात में दलदल बन जाती है सड़क
ग्रामीण बताते हैं कि बारिश शुरू होते ही सड़क कीचड़ और दलदल में बदल जाती है। कई जगह पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। साइकिल और दोपहिया वाहन चलाना लगभग असंभव हो जाता है।
ऐसे में गांव का संपर्क बाजार, अस्पताल और सरकारी कार्यालयों से लगभग कट जाता है।
देशभर में नक्सल वारदात से हुई थी पहचान
बालिबा गांव वर्ष 2006 में उस समय देशभर की सुर्खियों में आया था, जब यहां झारखंड की सबसे बड़ी पुलिस-नक्सली मुठभेड़ों में से एक हुई थी। इस घटना में 30 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे और नक्सली बड़ी संख्या में अत्याधुनिक हथियार लूटकर ले गए थे।
हालांकि सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई के बाद आज सारंडा में नक्सली गतिविधियां काफी हद तक समाप्त हो चुकी हैं। इसके बावजूद विकास की रफ्तार यहां नहीं पहुंच सकी।
सड़क नहीं, तो हर दिन संघर्ष
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क नहीं होने का सबसे ज्यादा असर बीमार मरीजों, गर्भवती महिलाओं और स्कूली बच्चों पर पड़ता है। गंभीर मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में घंटों लग जाते हैं। शिक्षकों को भी विद्यालय आने-जाने में भारी परेशानी होती है।
बाजार, बैंक, प्रखंड कार्यालय और जिला मुख्यालय तक पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं है।
विधायक से लगाई गुहार
बालिबा गांव के मुंडा बिनोद होनहागा ने हाल ही में बरायबुरु में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जगन्नाथपुर विधायक सोनाराम सिंकू से मुलाकात कर गांव तक पक्की सड़क निर्माण की मांग की।
ग्रामीणों को उम्मीद है कि वर्षों पुरानी यह मांग अब पूरी होगी।
ग्रामीणों का सवाल—हमारी गलती क्या है?
ग्रामीण कहते हैं कि वे भी संविधान में विश्वास रखते हैं, मतदान करते हैं, सरकार चुनते हैं और देश के जिम्मेदार नागरिक हैं। फिर भी विकास की योजनाओं में उनके गांव की लगातार अनदेखी क्यों की जा रही है?
उनका सवाल है कि जब दूसरे गांवों तक सड़क पहुंच सकती है तो बालिबा क्यों नहीं?

अरबों का राजस्व, करोड़ों का DMFT, फिर भी सड़क नहीं
ग्रामीणों ने सरकार और जनप्रतिनिधियों से सवाल किया कि सारंडा क्षेत्र की सेल और निजी खदानों से सरकार को हर वर्ष अरबों रुपये का राजस्व मिलता है। इसके अलावा जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMFT) में भी सैकड़ों करोड़ रुपये उपलब्ध हैं।
इसके बावजूद मात्र सात किलोमीटर सड़क का निर्माण आज तक नहीं होना कई सवाल खड़े करता है।
अब भी इंतजार या बदलेगी तस्वीर?
करीब 110 वर्षों से विकास की राह देख रहे बालिबा के ग्रामीण अब उम्मीद लगाए बैठे हैं कि उनकी आवाज इस बार शासन-प्रशासन तक पहुंचेगी। यदि सड़क का निर्माण होता है तो यह केवल सात किलोमीटर सड़क नहीं होगी, बल्कि दशकों से उपेक्षित एक गांव के सम्मान, विकास और बेहतर भविष्य की राह भी खुलेगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या बालिबा का 110 वर्षों का इंतजार खत्म होगा, या यह गांव आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उपेक्षा की मिसाल बना रहेगा?













