सीजीएम से मिले झामसंघ अध्यक्ष, आंदोलनकारी ग्रामीण और ठेका कंपनी को आमने-सामने बैठाने की मांग
रिपोर्ट शैलेश सिंह
गुवा। सेल गुवा की रांजाबुरु खदान में जारी अनिश्चितकालीन आंदोलन और इसके कारण लगातार बढ़ते विवाद के बीच झारखंड मजदूर संघर्ष संघ के केंद्रीय अध्यक्ष रामा पाण्डे ने समाधान की पहल की है। 27 अगस्त को उन्होंने गुवा के सीजीएम सी. वी. कुमार से मुलाकात कर पूरे मामले का जल्द से जल्द स्थायी समाधान निकालने की मांग की।
रामा पाण्डे ने सीजीएम के समक्ष स्पष्ट प्रस्ताव रखा कि आंदोलनकारी ग्रामीणों, मां सरला नामक ठेका कंपनी के मालिक और प्रबंधन को एक ही टेबल पर बैठाकर बातचीत कराई जाए तथा उनके नेतृत्व में सभी पक्षों के बीच वार्ता के माध्यम से ऐसा रास्ता निकाला जाए, जिससे विवाद का स्थायी समाधान हो सके।
सीजीएम सी. वी. कुमार ने भी रामा पाण्डे को भरोसा दिया कि प्रबंधन जल्द ही मामले के समाधान की दिशा में आवश्यक प्रयास करेगा।

“आंदोलन को दबाने से नहीं, बातचीत से निकलेगा रास्ता”
रामा पाण्डे ने कहा कि वर्तमान परिस्थिति में किसी भी पक्ष के लिए लगातार टकराव की स्थिति उचित नहीं है। आंदोलन जितना लंबा खिंचेगा, नुकसान उतना ही बढ़ता जाएगा।
उन्होंने कहा कि एक ओर प्रभावित ग्रामीण रोजगार और अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, दूसरी ओर खदान संचालन प्रभावित हो रहा है और ठेका कंपनी को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में सभी पक्षों को टकराव से बाहर निकलकर बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि “जब तक सभी पक्ष एक टेबल पर बैठकर एक-दूसरे की बात नहीं सुनेंगे, तब तक समाधान कैसे निकलेगा?”
“प्रभावित ग्रामीण सेल परिवार का अभिन्न हिस्सा हैं”
झामसंघ अध्यक्ष ने कहा कि यह बात सेल प्रबंधन को गंभीरता से समझनी होगी कि गुवा खदान से प्रभावित सारंडा के दर्जनों गांवों के ग्रामीण केवल बाहरी पक्ष नहीं हैं, बल्कि वे लंबे समय से खदान संचालन की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सेल की लोक जनसुनवाई, ग्रामसभा और अन्य प्रक्रियाओं में प्रभावित ग्रामीणों ने कई मौकों पर सहयोग किया है। उनके अनुसार, ग्रामीणों ने इन प्रक्रियाओं को पूरा कराने में सहयोग दिया और खदान संचालन के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में भी भूमिका निभाई।
रामा पाण्डे ने कहा कि इसलिए प्रबंधन को प्रभावित ग्रामीणों को “सेल परिवार का अभिन्न अंग” मानते हुए उनकी समस्याओं और मांगों को गंभीरता से सुनना चाहिए।
“रोजगार मांग रहे हैं तो उनकी बात सुनिए”
रामा पाण्डे ने कहा कि सारंडा क्षेत्र के ग्रामीण लंबे समय से रोजगार और बुनियादी समस्याओं को लेकर अपनी आवाज उठाते रहे हैं। यदि रांजाबुरु खदान से प्रभावित कुछ बेरोजगार रोजगार की मांग कर रहे हैं तो उनके साथ बैठकर उनकी बात सुनने में कोई नुकसान नहीं है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीणों की मांगों को केवल आंदोलन या विरोध के चश्मे से देखने के बजाय उनकी वास्तविक परिस्थितियों को समझना जरूरी है।
“सारंडा के आदिवासी और ग्रामीण सीधे-सादे लोग हैं। यदि वे अपने बेरोजगार बच्चों के लिए रोजगार मांग रहे हैं तो उनके साथ बैठकर उनकी समस्या सुननी चाहिए। साथ ही प्रबंधन और कंपनी की अपनी समस्याएं हैं तो वे भी सामने रखी जाएं। बातचीत से बीच का रास्ता निकाला जा सकता है।”
“किसी एक पक्ष की जीत नहीं, समाधान जरूरी”
रामा पाण्डे ने संकेत दिया कि इस विवाद का समाधान तभी संभव है, जब सभी पक्ष अपनी-अपनी जिद से पीछे हटकर व्यावहारिक रास्ता अपनाएं।
उनके अनुसार, मामला इस बात का नहीं होना चाहिए कि कौन जीता और कौन हारा। प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि खदान का संचालन सुचारु हो, प्रभावित ग्रामीणों को न्याय मिले और ठेका कंपनी के साथ भी ऐसी व्यवस्था बने जिससे भविष्य में विवाद की पुनरावृत्ति न हो।
उन्होंने कहा कि प्रबंधन को प्रभावित गांवों की समस्याओं को दूर करने की दिशा में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
“लंबा आंदोलन सभी के लिए नुकसानदेह”
रामा पाण्डे ने कहा कि रांजाबुरु खदान में लंबे समय से जारी गतिरोध का असर केवल एक पक्ष पर नहीं पड़ रहा है। इसका नुकसान गुवा प्रबंधन, ठेका कंपनी और आंदोलनकारी ग्रामीण—सभी को उठाना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि आंदोलन लंबा चलने से उत्पादन और कामकाज प्रभावित होगा, कंपनी को आर्थिक नुकसान होगा और ग्रामीणों के सामने भी रोजगार तथा आर्थिक कठिनाइयां बढ़ेंगी।
उन्होंने चेताया कि यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो नुकसान का दायरा आगे और बढ़ सकता है।
बयानबाजी ने बढ़ाई दूरी, बिगड़ रहा सामाजिक माहौल
रामा पाण्डे ने इस पूरे विवाद के एक और गंभीर पहलू की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि मामले को लेकर अलग-अलग लोगों और टीमों द्वारा बैठकें और बयानबाजी की जा रही है। इससे विवाद का समाधान होने के बजाय गुवा और सारंडा क्षेत्र के लोगों के बीच आपसी दूरी बढ़ने का खतरा पैदा हो रहा है।
उन्होंने कहा कि वर्षों से गुवा और सारंडा क्षेत्र में विभिन्न समुदायों के लोगों के बीच प्रेम, सहयोग और भाईचारे का संबंध रहा है। यदि किसी आर्थिक या रोजगार संबंधी विवाद के कारण सामाजिक रिश्तों में दरार आती है तो यह किसी के हित में नहीं होगा।
“बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप से विवाद और गहरा सकता है। हमें ऐसा माहौल बनाना होगा, जिसमें लोग एक-दूसरे को विरोधी नहीं बल्कि समस्या के समाधान का हिस्सा समझें।”
प्रबंधन से निर्णायक पहल की अपील
रामा पाण्डे ने गुवा प्रबंधन से आग्रह किया कि मामले को अब और लंबा न खींचा जाए। उन्होंने कहा कि प्रबंधन की पहल पर आंदोलनकारी ग्रामीणों और मां सरला कंपनी के प्रतिनिधियों को एक साथ बैठाकर वार्ता कराई जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि जरूरत हो तो सभी पक्ष अपनी-अपनी मांग, समस्या और व्यावहारिक सीमाएं सामने रखें और बीच का रास्ता तलाशें। इससे न केवल वर्तमान आंदोलन समाप्त करने में मदद मिलेगी, बल्कि भविष्य में भी ऐसे विवादों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्थायी व्यवस्था तैयार की जा सकती है।
रांजाबुरु विवाद में ‘संवाद’ ही अंतिम रास्ता
रांजाबुरु खदान का विवाद अब लगातार लंबा खिंचता जा रहा है। ऐसे समय में रामा पाण्डे की ओर से सामने रखा गया वार्ता और मध्यस्थता का प्रस्ताव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उनकी पहल का मूल संदेश स्पष्ट है—टकराव से किसी का स्थायी हित नहीं हो सकता। प्रभावित ग्रामीणों की रोजगार संबंधी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, वहीं खदान संचालन और ठेका कंपनी की व्यावहारिक समस्याओं को भी बातचीत की मेज पर रखना जरूरी है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि गुवा प्रबंधन रामा पाण्डे की पहल को किस तरह आगे बढ़ाता है और क्या आंदोलनकारी ग्रामीणों तथा मां सरला कंपनी को एक साथ बैठाकर वास्तविक वार्ता शुरू हो पाती है।
यदि ऐसा होता है तो रांजाबुरु विवाद को टकराव से निकालकर समझौते, संवाद और स्थायी समाधान की दिशा में ले जाने का रास्ता खुल सकता है। रामा पाण्डे ने भी इसी उम्मीद के साथ प्रबंधन से तत्काल पहल करने की अपील की है, ताकि आंदोलन का नुकसान बढ़ने से पहले सभी पक्षों के बीच सहमति बनाई जा सके।














