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सारंडा के आदिवासी परिवारों के हक की लड़ाई अब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग तक

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सुशील बारला की पहल पर आयोग ने लिया संज्ञान, 7 सितंबर को रांची में होगी सुनवाई; वनाधिकार पट्टा और मूलभूत सुविधाओं का मुद्दा उठेगा

रिपोर्ट : शैलेश सिंह

सारंडा वन क्षेत्र में वर्षों से निवासरत जनजातीय परिवारों के वनाधिकार, आवास, कृषि भूमि और मूलभूत सुविधाओं से जुड़े मुद्दे को लेकर अब न्याय की उम्मीद जगी है। भारत आदिवासी पार्टी, पश्चिमी सिंहभूम के जिलाध्यक्ष सुशील बारला द्वारा उठाए गए इस मामले पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, नई दिल्ली ने त्वरित संज्ञान लेते हुए सुनवाई की तिथि निर्धारित कर दी है। आयोग की इस कार्रवाई को सारंडा के हजारों जनजातीय परिवारों के अधिकारों की लड़ाई में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

सुशील बारला ने आयोग के समक्ष उठाया था मुद्दा

भारत आदिवासी पार्टी के जिलाध्यक्ष सुशील बारला ने सारंडा वन क्षेत्र में वर्ष 2005 से पूर्व से निवासरत जनजातीय परिवारों को वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत वनाधिकार पट्टा उपलब्ध कराने तथा उन्हें आवश्यक मूलभूत सुविधाएं दिलाने की मांग को लेकर 1 जून 2026 को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपा था। ज्ञापन का पत्रांक BAP/JHD-30/2026 था।
बारला ने अपने ज्ञापन में लंबे समय से सारंडा के जंगलों में निवास कर रहे जनजातीय परिवारों के अधिकारों और उनकी समस्याओं को प्रमुखता से उठाया था।

7 सितंबर को रांची में होगी सुनवाई

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने मामले पर संज्ञान लेते हुए सुनवाई की तारीख निर्धारित कर दी है। आयोग द्वारा जारी सूचना के अनुसार 7 सितंबर 2026 को अपराह्न 2 बजे राजकीय अतिथिशाला, रांची में इस प्रकरण से संबंधित अन्वेषण एवं जांच की कार्रवाई के लिए सुनवाई आयोजित की जाएगी।
इस सुनवाई के दौरान सारंडा क्षेत्र में लंबे समय से रह रहे जनजातीय परिवारों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को आयोग के समक्ष रखा जाएगा।

वनाधिकार पट्टा सबसे अहम मांग

सारंडा के जनजातीय परिवारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा वनाधिकार पट्टा का है। पीढ़ियों से जंगल और उसके आसपास रहकर जीवनयापन करने वाले परिवारों को उनके कानूनी अधिकार दिलाने की मांग लगातार उठती रही है। सुशील बारला का कहना है कि पात्र परिवारों को वनाधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत उनके अधिकार मिलने चाहिए।
इसके साथ ही जनजातीय परिवारों के आवास, कृषि भूमि और अन्य बुनियादी जरूरतों से जुड़े मामलों को भी आयोग के समक्ष प्रमुखता से रखा जाएगा।

शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क-पानी का भी उठेगा सवाल

सुनवाई में केवल वनाधिकार पट्टे का मुद्दा ही नहीं, बल्कि सारंडा के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले जनजातीय परिवारों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं की स्थिति पर भी चर्चा होने की उम्मीद है।
भारत आदिवासी पार्टी की ओर से शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क और बिजली जैसी सुविधाओं को जनजातीय परिवारों का जरूरी अधिकार बताते हुए इनके बेहतर क्रियान्वयन की मांग की गई है।

“पीढ़ियों से रह रहे परिवारों को अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता”

सुशील बारला ने कहा कि सारंडा वन क्षेत्र में जनजातीय समुदाय के अनेक परिवार पीढ़ियों से निवास करते आ रहे हैं। ऐसे परिवारों को उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत जो परिवार पात्र हैं, उन्हें नियमानुसार वनाधिकार पट्टा मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जनजातीय परिवारों को केवल कागजों पर अधिकार देने के बजाय जमीन पर उनके अधिकार और जरूरी सुविधाएं सुनिश्चित करना सरकार एवं प्रशासन की जिम्मेदारी है।

आयोग के संज्ञान से बढ़ी उम्मीद

सुशील बारला ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा मामले का संज्ञान लेकर सुनवाई निर्धारित किए जाने का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि यह कदम सारंडा के जनजातीय परिवारों के लिए न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि 7 सितंबर की सुनवाई के बाद पात्र जनजातीय परिवारों के वनाधिकार, आवास, कृषि भूमि और मूलभूत सुविधाओं से संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कार्रवाई सुनिश्चित होगी।
सारंडा के हजारों जनजातीय परिवारों की नजर अब 7 सितंबर को रांची में होने वाली इस महत्वपूर्ण सुनवाई पर टिकी है।

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