लंबित निविदा, अधूरे निर्माण और घटिया गुणवत्ता पर जीरो टॉलरेंस की तैयारी
कार्यपालक अभियंताओं को दो टूक—पहले पुरानी निविदा और योजनाओं का निपटारा करें, तभी मिलेगा नया कार्य
सूत्र: समय पर काम नहीं करने वाले संवेदकों पर डिबार की कार्रवाई, अभियंताओं की भी तय होगी जवाबदेही
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
पश्चिमी सिंहभूम जिले में वर्षों से विकास योजनाओं की धीमी रफ्तार, लंबित निविदाएं, अधूरे निर्माण कार्य और समय पर योजनाओं का लाभ नहीं मिलने से जनता में लगातार नाराजगी रही है। अब जिला प्रशासन इस व्यवस्था को बदलने की तैयारी में दिखाई दे रहा है। समाहरणालय सूत्रों के अनुसार जिला उपायुक्त मनीष कुमार ने विकास योजनाओं की समीक्षा के दौरान कार्यपालक अभियंताओं के साथ स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जिस कार्यकारी एजेंसी के पास निविदा निष्पादन की प्रक्रिया लंबित होगी, उसे नया कार्य दायित्व नहीं दिया जाएगा।
सूत्रों का कहना है कि यह निर्देश केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि जिले में विकास कार्यों की पूरी कार्यसंस्कृति बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यदि इसका प्रभावी क्रियान्वयन हुआ तो वर्षों से लंबित पड़ी योजनाओं, विलंबित निविदाओं और अधूरे निर्माण कार्यों पर अंकुश लग सकता है।

छह माह से लेकर एक वर्ष तक लटकी हैं कई निविदाएं
समाहरणालय सूत्रों के अनुसार जिले में विशेषकर DMFT (जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट) से संचालित अनेक योजनाओं की निविदा प्रक्रिया पिछले छह माह से लेकर लगभग एक वर्ष तक लंबित है। परिणामस्वरूप करोड़ों रुपये की विकास योजनाएं धरातल पर नहीं उतर सकीं और जिन योजनाओं का लाभ ग्रामीणों तक समय पर पहुंचना चाहिए था, वे कागजों में ही अटकी रहीं।
सूत्रों का कहना है कि निविदा प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब से केवल सरकारी कार्य प्रभावित नहीं होते, बल्कि इसका सीधा असर उन गांवों पर पड़ता है जहां सड़क, पुलिया, पेयजल, सिंचाई, सामुदायिक भवन और अन्य बुनियादी सुविधाओं की प्रतीक्षा वर्षों से की जा रही है।
मझगांव विधानसभा की योजनाओं पर भी उठ रहे सवाल
सूत्रों के अनुसार मझगांव विधानसभा क्षेत्र की कुछ योजनाओं की निविदा प्रक्रिया भी समय पर पूरी नहीं हो सकी है। बताया जा रहा है कि कई योजनाएं तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर लंबित हैं।
कुछ सूत्रों का दावा है कि संवेदकों के बीच प्रतिस्पर्धा, आपसी खींचतान तथा अन्य कारणों से कई मामलों में अंतिम निर्णय समय पर नहीं हो पाया। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और प्रशासन की ओर से इस संबंध में कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
‘पहले लंबित काम, फिर नया दायित्व’
सूत्रों के अनुसार उपायुक्त का स्पष्ट संदेश है कि विकास योजनाओं में लंबित मामलों का बोझ बढ़ाते हुए नई योजनाएं सौंपने की परंपरा अब समाप्त होनी चाहिए।
बताया जा रहा है कि जिन कार्यकारी एजेंसियों के पास पहले से टेंडर निष्पादन या निर्माण कार्य लंबित हैं, उन्हें पहले उनका निष्पादन करना होगा। उसके बाद ही नई जिम्मेदारियों पर विचार किया जाएगा।
प्रशासनिक हलकों में इसे जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
कार्यपालक अभियंताओं की भी होगी जवाबदेही
समाहरणालय सूत्रों के अनुसार अब केवल संवेदकों की ही नहीं, बल्कि संबंधित कार्यपालक अभियंताओं की भूमिका की भी समीक्षा की जाएगी।
यदि किसी स्तर पर यह पाया जाता है कि बिना ठोस कारण के निविदा प्रक्रिया लंबित रखी गई या निर्माण कार्यों की निगरानी में लापरवाही बरती गई, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जा सकती है।
समय पर निविदा, समय पर निर्माण—नई प्राथमिकता
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि अब जिले में दो बातें सर्वोच्च प्राथमिकता होंगी—
- निविदा प्रक्रिया का समयबद्ध निष्पादन।
- स्वीकृत योजनाओं का निर्धारित अवधि में गुणवत्तापूर्ण निर्माण।
सूत्रों के अनुसार उपायुक्त का मानना है कि यदि टेंडर समय पर होगा तो निर्माण कार्य भी समय पर शुरू होंगे और जनता को योजनाओं का लाभ निर्धारित अवधि में मिल सकेगा।
कार्य अधूरा छोड़ने वालों पर हो सकती है कार्रवाई
सूत्रों के अनुसार प्रशासन उन संवेदकों की सूची तैयार कर रहा है जिन्होंने लंबे समय तक कार्य लंबित रखा है अथवा अनुबंध की शर्तों के अनुरूप कार्य पूरा नहीं किया।
बताया जा रहा है कि ऐसे मामलों में नियमों के अनुरूप अन्य विभागों की तर्ज पर डिबार (काली सूची में शामिल करने) जैसी कार्रवाई पर भी विचार किया जा रहा है। हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ है।
EMD फंसने से संवेदकों को भी नुकसान
सूत्रों का कहना है कि निविदा प्रक्रिया में अनावश्यक देरी का नुकसान केवल जनता को ही नहीं बल्कि संवेदकों को भी उठाना पड़ता है।
कई बार संवेदकों की EMD (Earnest Money Deposit) राशि लंबे समय तक विभागीय खातों में फंसी रहती है, जबकि बैंकिंग और वित्तीय दायित्व उनके ऊपर बने रहते हैं।
समय पर निर्णय होने से ईमानदारी से काम करने वाले संवेदकों को भी राहत मिलेगी।

जनता को भुगतनी पड़ती है सबसे बड़ी कीमत
जब कोई सड़क समय पर नहीं बनती तो ग्रामीणों को वर्षों तक कीचड़ और गड्ढों से गुजरना पड़ता है।
जब पुल समय पर नहीं बनता तो बरसात में गांवों का संपर्क कट जाता है।
जब सिंचाई योजना पूरी नहीं होती तो किसानों की खेती प्रभावित होती है।
जब पेयजल योजना अधूरी रहती है तो ग्रामीण दूषित पानी पीने को मजबूर हो जाते हैं।
सूत्रों का कहना है कि प्रशासन अब चाहता है कि विकास योजनाओं का लाभ कागजों से निकलकर वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचे।
गुणवत्ता पर रहेगा विशेष फोकस
समाहरणालय सूत्रों के अनुसार अब योजनाओं के प्राक्कलन (Estimate) की गहन तकनीकी जांच के बाद ही प्रशासनिक स्वीकृति दी जाएगी।
बताया जा रहा है कि गार्डवाल, पुलिया और अन्य संरचनाओं को केवल आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर ही स्वीकृत किया जाएगा, ताकि अनावश्यक प्रावधानों पर सरकारी धन खर्च न हो।
घटिया निर्माण पर भी रहेगी नजर
सूत्रों का कहना है कि प्रशासन निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर विशेष निगरानी रखने की तैयारी कर रहा है।
यदि किसी निर्माण कार्य में गुणवत्ता संबंधी शिकायत मिलती है तो उसकी जांच कराई जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर नियमानुसार कार्रवाई भी की जा सकती है।
‘टेंडर मैनेज’ की चर्चाओं पर प्रशासन की सख्ती
प्रशासनिक और संवेदक वर्ग में लंबे समय से विभिन्न प्रकार की चर्चाएं होती रही हैं कि कुछ मामलों में निविदा प्रक्रिया अपेक्षा से अधिक समय तक लंबित रहती है। सूत्रों का दावा है कि जिला प्रशासन अब ऐसी शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाने पर जोर दे रहा है।
हालांकि किसी विशेष मामले में अनियमितता की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
जवाबदेह व्यवस्था की ओर बढ़ता जिला
समाहरणालय सूत्रों का मानना है कि यदि उपायुक्त के निर्देशों का सभी विभाग ईमानदारी से पालन करते हैं तो आने वाले महीनों में जिले की विकास योजनाओं की गति तेज हो सकती है।
निविदा समय पर होगी, निर्माण समय पर पूरा होगा, गुणवत्ता बेहतर होगी और जनता को योजनाओं का लाभ भी शीघ्र मिलेगा।
यही कारण है कि जिला प्रशासन की इस पहल को विकास कार्यों में पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।












