हजारीबाग ओपन जेल से बाहर आने के बाद फिर जराइकेला थाना का नोटिस, गरीब परिवार के सामने कानूनी खर्च का संकट
रिपोर्ट शैलेश सिंह
सारंडा। हिंसा का रास्ता छोड़कर सरकार की आत्मसमर्पण नीति के तहत मुख्यधारा में लौटे सारंडा के छोटानागरा थाना क्षेत्र अंतर्गत टिटिलीघाट निवासी पूर्व नक्सली मुगा चांपिया की परेशानियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। आत्मसमर्पण कर हजारीबाग स्थित ओपन जेल में रहने और वहां से बाहर आने के बाद अब उन्हें अलग-अलग थाना क्षेत्रों से नोटिस मिल रहे हैं। लगातार नोटिस और न्यायालय के चक्कर ने आर्थिक रूप से बेहद कमजोर मुगा चांपिया को परेशान कर दिया है।

11 अप्रैल 2024 को किया था आत्मसमर्पण
मुगा चांपिया ने 11 अप्रैल 2024 को टोंटो थाना में जाकर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। आत्मसमर्पण के बाद उन्हें हजारीबाग स्थित ओपन जेल भेजा गया। सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत उन्हें आर्थिक सहायता सहित अन्य लाभ भी दिए गए।
ओपन जेल में निर्धारित अवधि पूरी करने के बाद जब वह बाहर निकले तो उन्हें उम्मीद थी कि अब वह अपने परिवार के साथ सामान्य और शांतिपूर्ण जीवन जी सकेंगे। लेकिन बाहर आने के बाद कानूनी मामलों से संबंधित नोटिसों ने उनकी मुश्किलें फिर बढ़ा दीं।
अब जराइकेला थाना से आया नया नोटिस
मुगा चांपिया के अनुसार, अब जराइकेला थाना पुलिस की ओर से भी उन्हें नोटिस भेजा गया है। नोटिस में थाना कांड संख्या 01/2024 का उल्लेख करते हुए धारा 302/24 आईपीसी, 27 आर्म्स एक्ट तथा 17 CLA एक्ट का जिक्र किया गया है।
नए नोटिस के बाद मुगा चांपिया की परेशानी और बढ़ गई है। उनका कहना है कि एक तरफ वह आत्मसमर्पण कर चुके हैं और पुलिस रिकॉर्ड में भी उनके आत्मसमर्पण की पुष्टि है, दूसरी तरफ अलग-अलग मामलों को लेकर उन्हें लगातार कानूनी प्रक्रिया में उलझना पड़ रहा है।
टोंटो पुलिस ने खुद जारी किया आत्मसमर्पण प्रमाण पत्र
मुगा चांपिया के पास टोंटो थाना पुलिस द्वारा जारी आत्मसमर्पण संबंधी प्रमाण पत्र भी है। 24 अगस्त 2026 को जारी प्रमाण पत्र में आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर यह प्रमाणित किया गया है कि मुगा चांपिया भाकपा माओवादी संगठन के सक्रिय सदस्य थे और उन्होंने 11 अप्रैल 2024 को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष आत्मसमर्पण किया था।
ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि जब पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनके आत्मसमर्पण की पुष्टि है, तो आत्मसमर्पण के बाद भी उन्हें विभिन्न थाना क्षेत्रों से लगातार नोटिस क्यों मिल रहे हैं और उन्हें बार-बार न्यायालय का चक्कर क्यों लगाना पड़ रहा है?
न्यायालय और वकील के खर्च ने तोड़ी कमर
मुगा चांपिया बेहद गरीब परिवार से आते हैं। आत्मसमर्पण के बाद सरकार से मिली आर्थिक सहायता को उन्होंने नई जिंदगी शुरू करने का सहारा माना था। लेकिन लगातार कानूनी प्रक्रिया के कारण चाईबासा न्यायालय आने-जाने, वकील की फीस और अन्य खर्चों में उनकी सहायता राशि का बड़ा हिस्सा समाप्त हो चुका है।
मुगा चांपिया का कहना है कि अब उनके पास पर्याप्त पैसा भी नहीं है। इसके बावजूद अलग-अलग थानों से आने वाले नोटिस के कारण उन्हें न्यायालय और वकीलों के पास जाना पड़ रहा है। गरीब व्यक्ति के लिए यह खर्च उठाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
सरकार से मिली मदद नई जिंदगी के बजाय मुकदमों में हो रही खर्च
जिस आर्थिक सहायता का उद्देश्य आत्मसमर्पण करने वाले व्यक्ति को समाज की मुख्यधारा में लौटकर सम्मानजनक जीवन शुरू करने में मदद करना था, वही रकम अब कानूनी प्रक्रिया में खर्च हो रही है।
मुगा चांपिया की स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व नक्सलियों के लंबित मामलों को लेकर संबंधित पुलिस थाना, जांच एजेंसी और न्यायालय के स्तर पर बेहतर समन्वय क्यों नहीं किया जा रहा है, ताकि उन्हें अनावश्यक परेशानी से बचाया जा सके।
गांव के मुंडा के साथ छोटानागरा थाना पहुंचे थे मुगा
अपनी परेशानी लेकर मुगा चांपिया 29 अगस्त को गांव के मुंडा मंचूरिया सिद्धू के साथ छोटानागरा थाना पहुंचे थे। उन्होंने थाना प्रभारी से मुलाकात कर अपनी स्थिति बताई और मानवीय आधार पर समाधान की गुहार लगाई।
मुगा का कहना है कि उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर सरकार की नीति पर भरोसा किया था। अब वह अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन जीना चाहते हैं, लेकिन लगातार मिलने वाले नोटिस और मुकदमों की कानूनी प्रक्रिया ने उन्हें फिर से परेशानी में डाल दिया है।
सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, आत्मसमर्पण नीति की विश्वसनीयता का भी
पूर्व नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए सरकार आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति चला रही है। इसका उद्देश्य हथियार छोड़ने वाले लोगों को एक नई शुरुआत का अवसर देना है।
ऐसे में मुगा चांपिया का मामला यह सोचने पर मजबूर करता है कि आत्मसमर्पण के बाद लंबित मामलों की कानूनी स्थिति स्पष्ट करने और पुनर्वास प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए संबंधित विभागों के बीच कितना समन्वय है।
एक गरीब पूर्व नक्सली, जिसने हथियार छोड़कर सामान्य जीवन की उम्मीद में आत्मसमर्पण किया, आज नोटिस, न्यायालय और वकील की फीस के बीच फंसकर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। ऐसे में प्रशासन से उम्मीद है कि पूरे मामले की समीक्षा कर उसे कानूनी स्थिति स्पष्ट करने के साथ मानवीय आधार पर उचित सहायता और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाएगा।












