राशि विमुक्ति में भारी विलंब और चालान की पेचीदगी से संवेदक परेशान, चार माह से खनन विभाग के आदेश का असर—DMFT समेत कई योजनाएं प्रभावित
रिपोर्ट शैलेश सिंह।
पश्चिमी सिंहभूम जिले में विकास कार्यों की रफ्तार पर मानो ब्रेक लग गया है। एक ओर विकास योजनाओं के लिए स्वीकृति और प्राक्कलन तैयार किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राशि विमुक्ति, खनिज चालान और बालू घाटों की नीलामी जैसी समस्याओं ने विकास की पूरी प्रक्रिया को उलझाकर रख दिया है। स्थिति यह है कि संवेदक काम करना चाहते हैं, लेकिन भुगतान और खनन संबंधी नियमों की पेचीदगियों के बीच उनकी कार्यक्षमता लगातार प्रभावित हो रही है।

चालान की पेचीदगी ने बढ़ाई मुश्किल
सबसे बड़ी समस्या निर्माण कार्यों में उपयोग होने वाले पत्थर और बालू के चालान को लेकर बताई जा रही है। कई योजनाओं के प्राक्कलन में जिस बंद पत्थर खदान से पत्थर की ढुलाई का प्रावधान किया गया है, वहां से वैध चालान उपलब्ध कराने की स्थिति ही स्पष्ट नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि संवेदक आखिर प्राक्कलन के अनुरूप निर्माण सामग्री कहां से और किस प्रक्रिया के तहत लाएं?
बालू घाटों की नीलामी नहीं होने के कारण भी निर्माण कार्यों पर सीधा असर पड़ रहा है। विकास योजनाओं में बालू की आवश्यकता है, लेकिन वैध स्रोत और चालान की व्यवस्था स्पष्ट नहीं होने से संवेदक काम शुरू करने से पहले ही कई तरह की प्रशासनिक अड़चनों में फंस जा रहे हैं।
चार माह से आदेश का असर, संवेदक बेहाल
सूत्रों के अनुसार, खनन विभाग से जुड़े आदेशों के कारण पिछले करीब चार माह से संवेदक प्रभावित हैं। निर्माण सामग्री की उपलब्धता और चालान की समस्या ने योजनाओं की गति को बुरी तरह प्रभावित किया है। संवेदकों का कहना है कि एक तरफ विभाग समय पर योजनाएं पूर्ण करने का दबाव बनाता है, दूसरी तरफ आवश्यक निर्माण सामग्री के वैध चालान की व्यवस्था नहीं हो पा रही है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि योजना समय पर पूरी नहीं होने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है—संवेदक की या व्यवस्था की?
कोषागार में भुगतान अटका, हजारों करोड़ की चर्चा
दूसरी गंभीर समस्या राशि भुगतान को लेकर सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि कोषागार स्तर पर पूरे राज्य में बड़ी मात्रा में विकास कार्यों से संबंधित भुगतान प्रभावित है। हजारों करोड़ रुपये के विकास कार्यों के भुगतान के अटकने की चर्चाओं के बीच संवेदकों की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती जा रही है।
पश्चिमी सिंहभूम में भी संवेदकों की शिकायत है कि पुराने कार्यों के विपत्रों की राशि तक समय पर विमुक्त नहीं हो रही है। विशेष रूप से 24 अप्रैल से पहले के विपत्रों के भुगतान में भी विलंब होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। यदि यह स्थिति सही है तो यह केवल संवेदकों की समस्या नहीं, बल्कि जिले में चल रही विकास योजनाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
पुरानी योजनाएं अधूरी, दोषी कौन?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि पुरानी योजनाएं अब तक पूरी क्यों नहीं हो पाई हैं? यदि संवेदक को समय पर भुगतान नहीं मिलेगा, निर्माण सामग्री के चालान की व्यवस्था स्पष्ट नहीं होगी और विभागीय स्तर पर समन्वय का अभाव रहेगा, तो योजना की समयसीमा प्रभावित होना स्वाभाविक है।
जिले में जिला प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी की भी चर्चा है। यदि विभागों के बीच बेहतर समन्वय होता तो चालान, राशि विमुक्ति और निर्माण सामग्री जैसी समस्याओं का समाधान पहले ही किया जा सकता था।
मंत्री दे रहे आश्वासन, संवेदक कर रहे इंतजार
राज्य सरकार के विभिन्न मंत्री अपने-अपने जिलों के संवेदकों को चालान की समस्या का समाधान कैबिनेट स्तर पर होने का आश्वासन देते रहे हैं। संवेदक भी इसी उम्मीद में अब तक इंतजार कर रहे हैं। लेकिन जमीन पर स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं होने से उनमें नाराजगी बढ़ती जा रही है।
संवेदकों का कहना है कि केवल आश्वासन से बैंक का ब्याज नहीं रुकता, मजदूरों का भुगतान नहीं रुकता और निर्माण सामग्री की कीमतें भी कम नहीं होतीं। काम शुरू करने के लिए पूंजी लगानी पड़ती है और भुगतान में महीनों की देरी होने पर पूरा आर्थिक बोझ संवेदक के कंधे पर आ जाता है।
बैंक ब्याज और आर्थिक संकट का दोहरा बोझ
कई संवेदक बैंक से ऋण लेकर विकास कार्यों में पूंजी लगाते हैं। समय पर विभागीय भुगतान नहीं होने पर उन्हें बैंक का ब्याज अपनी जेब से चुकाना पड़ रहा है। एक ओर भुगतान अटका हुआ है, दूसरी ओर मजदूरी, सामग्री, मशीनरी और बैंक ब्याज का खर्च लगातार बढ़ रहा है।
इस स्थिति ने छोटे और मध्यम संवेदकों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। संवेदक यदि काम रोकते हैं तो योजना प्रभावित होती है और यदि अपने संसाधनों से काम जारी रखते हैं तो भुगतान की अनिश्चितता उन्हें कर्ज के बोझ में धकेल रही है।
छह माह से विकास की रफ्तार सुस्त
बताया जा रहा है कि पिछले करीब छह माह से जिले में विकास कार्यों की गति पहले की तुलना में काफी धीमी हुई है। इसका असर केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है। देहाती बाजारों, प्रखंड मुख्यालयों और स्थानीय व्यापारिक गतिविधियों में भी आर्थिक सुस्ती दिखाई देने लगी है।
निर्माण कार्यों से हजारों मजदूरों, ट्रांसपोर्टरों, दुकानदारों, मशीन मालिकों और छोटे कारोबारियों की रोजी-रोटी जुड़ी होती है। जब विकास कार्यों की गति रुकती है तो उसका सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
DMFT की योजनाएं सबसे ज्यादा प्रभावित
पश्चिमी सिंहभूम जैसे खनिज बहुल जिले में DMFT (जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट) की योजनाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना से जुड़े कई कार्य DMFT के माध्यम से संचालित होते हैं। भुगतान और निर्माण सामग्री से जुड़ी समस्याओं के कारण इन योजनाओं के प्रभावित होने से ग्रामीण क्षेत्रों में विकास का इंतजार और लंबा होता जा रहा है।
संवेदक विकास की रीढ़, फिर भी उपेक्षित क्यों?
संवेदक किसी भी जिले के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। विभाग योजना बनाता है, प्रशासन निगरानी करता है और संवेदक जमीन पर उसे वास्तविक रूप देता है। ऐसे में यदि संवेदक ही आर्थिक और प्रशासनिक समस्याओं में फंस जाएं तो विकास योजनाओं की गति प्रभावित होना तय है।
अब जिले के कई संवेदक अपनी समस्याओं को लेकर जिले के जनप्रतिनिधियों और माननीय लोगों के समक्ष अपनी बात रखने की तैयारी में हैं। उनकी मांग साफ है—पुराने लंबित विपत्रों का शीघ्र भुगतान हो, चालान की समस्या का स्थायी समाधान निकले और निर्माण सामग्री की वैध उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

सरकार और प्रशासन से अब जवाब की उम्मीद
पश्चिमी सिंहभूम में विकास की स्थिति पर अब केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा। जरूरत है कि सरकार, जिला प्रशासन, खनन विभाग और संबंधित एजेंसियां एक साथ बैठकर समस्या का स्थायी समाधान निकालें। आखिर विकास योजनाओं की फाइलें आगे बढ़ाने के बाद यदि भुगतान और चालान की व्यवस्था ही बाधा बन जाए, तो इसका खामियाजा जनता को ही भुगतना पड़ेगा।
ऐसे में बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार और प्रशासन संवेदकों की वास्तविक समस्याओं को समझते हुए समयबद्ध समाधान निकालेगा, या पश्चिमी सिंहभूम की विकास योजनाएं भुगतान, चालान और विभागीय पेचीदगियों में ही उलझी रहेंगी?
फिलहाल, पश्चिमी सिंहभूम में विकास की तस्वीर यही संकेत दे रही है कि योजनाएं कागज पर चल रही हैं, लेकिन जमीन पर विकास की गाड़ी भुगतान और चालान के चक्कर में फंस गई है।











