किरीबुरू–मेघाहातुबुरु में प्यीवॉन स्पास प्लस के कथित नशे का बढ़ता जाल—स्कूली बच्चे भी चपेट में, अच्छे घरों के किशोरों पर मंडरा रहा गंभीर खतरा
न शराब की गंध, न नशेड़ी जैसा हुलिया—टैबलेट के पीछे छिपा नशे का खतरनाक खेल!
रिपोर्ट शैलेश सिंह
किरीबुरू/मेघाहातुबुरु। सारंडा के किरीबुरू, मेघाहातुबुरु और आसपास के क्षेत्रों में प्रिस्क्रिप्शन दवा प्यीवॉन स्पास प्लस के कथित गैर-चिकित्सीय इस्तेमाल की खबरें बेहद गंभीर चिंता पैदा कर रही हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसकी चपेट में किशोर और स्कूली बच्चे तक आने की बात सामने आ रही है।
चिंता सिर्फ यह नहीं कि कुछ युवा नशे की ओर बढ़ रहे हैं। असली सवाल यह है कि क्या दर्द और ऐंठन के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं अब किशोरों के बीच नशे का छिपा माध्यम बन रही हैं?
यदि ऐसा है तो यह किसी एक परिवार की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।

‘अच्छे घर’ के बच्चों तक पहुंचा नशे का नया रास्ता!
नशे का नाम आते ही अक्सर लोगों के मन में शराब, गांजा या अन्य पारंपरिक नशीले पदार्थों की तस्वीर उभरती है। लेकिन प्रिस्क्रिप्शन दवाओं का दुरुपयोग कहीं अधिक छिपा हुआ हो सकता है।
जानकारी के अनुसार, कुछ किशोर सामान्य टैबलेट की तरह इसका सेवन कर रहे हैं। परिवार को भी लंबे समय तक इसका अंदाजा नहीं लग पाता।
यही इसकी सबसे खतरनाक सामाजिक चुनौती है—नशा दिखाई नहीं देता, लेकिन असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगता है।
स्कूल बैग में किताबों के साथ पहुंच रही नशे की गोली?
यदि स्कूली बच्चे वास्तव में ऐसी दवाओं के दुरुपयोग की गिरफ्त में आ रहे हैं, तो यह अभिभावकों, विद्यालय प्रबंधन और प्रशासन के लिए बेहद गंभीर चेतावनी है।
जिस उम्र में बच्चे के हाथ में किताब, कॉपी और कलम होनी चाहिए, उस उम्र में यदि वह नशे की गोलियों के संपर्क में पहुंच रहा है तो सवाल केवल स्वास्थ्य का नहीं बल्कि पूरी पीढ़ी के भविष्य का है।
स्कूल प्रबंधन और अभिभावकों को बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव, पढ़ाई से दूरी, अत्यधिक सुस्ती, असामान्य चिड़चिड़ापन या दवाओं के पत्ते मिलने जैसी परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
ट्रामाडॉल—दवा का वह घटक जिसे हल्के में लेना भारी पड़ सकता है
प्यीवॉन स्पास प्लस के उपलब्ध विवरण के अनुसार इसमें ट्रामाडॉल जैसे ओपिओइड दर्द निवारक घटक के साथ अन्य औषधीय घटक हो सकते हैं। ट्रामाडॉल चिकित्सकीय उपयोग में डॉक्टर की निगरानी में दिया जाता है।
लेकिन इसे नशे के लिए लेना बेहद जोखिमपूर्ण हो सकता है। बार-बार या गलत तरीके से इस्तेमाल करने पर निर्भरता विकसित होने और ओवरडोज के गंभीर प्रभाव का खतरा रहता है।
‘गंध नहीं आती’—युवाओं के बीच सबसे खतरनाक भ्रम
नशे के लिए दवा का इस्तेमाल करने वालों में यह सोच हो सकती है कि टैबलेट लेने पर शराब जैसी गंध नहीं आती और इसलिए परिवार को आसानी से पता नहीं चलेगा।
लेकिन यह सोच बेहद खतरनाक है।
गंध नहीं आने का मतलब खतरा नहीं होना बिल्कुल नहीं है।
ओपिओइड दवाओं की अधिक मात्रा से अत्यधिक नींद, बेहोशी और सांस धीमी पड़ने जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है। ट्रामाडॉल के साथ दौरे पड़ने का जोखिम भी मौजूद है।
सस्ता नशा समझना पड़ सकता है जान पर भारी
युवाओं के बीच यदि ऐसी दवाओं को दूसरे नशीले पदार्थों की तुलना में सस्ता या आसानी से हासिल होने वाला विकल्प समझा जा रहा है, तो यह प्रवृत्ति तत्काल रोकने की जरूरत बताती है।
दवा बीमारी के इलाज के लिए है, नशे के लिए नहीं।
बिना डॉक्टर की सलाह के प्रिस्क्रिप्शन दवाओं का सेवन करना स्वास्थ्य के साथ खतरनाक प्रयोग है।
पैरासिटामोल भी बन सकता है गंभीर खतरा
यदि किसी संयोजन दवा में पैरासिटामोल मौजूद है, तो निर्धारित सीमा से अधिक सेवन करने पर गंभीर यकृत क्षति हो सकती है।
यानी नशे के लिए ज्यादा गोली लेने वाला व्यक्ति एक साथ कई स्वास्थ्य जोखिमों को आमंत्रित कर सकता है।
सबसे बड़ा निशाना—किशोर दिमाग
किशोरावस्था जीवन निर्माण का समय है। इसी उम्र में नशे की आदत पढ़ाई, करियर, पारिवारिक संबंध और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।
एक बार दवा पर निर्भरता विकसित होने के बाद इसे छोड़ना भी कठिन हो सकता है और व्यक्ति को चिकित्सकीय सहायता की जरूरत पड़ सकती है।
अब प्रशासन को सिर्फ दवा दुकान नहीं, पूरे नेटवर्क पर नजर रखनी होगी
यदि क्षेत्र में प्रिस्क्रिप्शन दवाओं की अवैध या संदिग्ध बिक्री की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो औषधि नियंत्रण विभाग और स्थानीय प्रशासन को दवा दुकानों के रिकॉर्ड, प्रिस्क्रिप्शन और बिक्री व्यवस्था की जांच करनी चाहिए।
साथ ही स्कूलों के आसपास और किशोरों के बीच दवाओं के दुरुपयोग को लेकर जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है।
अभिभावक बच्चों से पूछें—डांटकर नहीं, समझाकर
नशे के संदेह में बच्चे को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना या मारना समाधान नहीं है। अभिभावकों को बच्चे से शांतिपूर्वक बात करनी चाहिए और आवश्यकता होने पर डॉक्टर या नशा मुक्ति विशेषज्ञ की सहायता लेनी चाहिए।
समय रहते पहचान और इलाज—नशे की गिरफ्त से बच्चे को वापस लाने का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है।
ओवरडोज के संकेत दिखें तो इंतजार न करें
अत्यधिक उनींदापन, बेहोशी, सांस लेने में परेशानी या सांस बहुत धीमी होना, दौरे पड़ना अथवा व्यक्ति का सामान्य रूप से प्रतिक्रिया न देना आपात स्थिति हो सकती है। ऐसी स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।
अब सवाल सीधा है—बच्चों तक पहुंच रही है तो पहुंचा कौन रहा है?
किरीबुरू–मेघाहातुबुरु में यदि स्कूली बच्चों और किशोरों के बीच ऐसी दवाओं के नशे के रूप में इस्तेमाल की पुष्टि होती है, तो इसे मामूली मामला मानना भारी भूल होगी।
कौन बेच रहा है? किसे बेच रहा है? क्या वैध चिकित्सकीय पर्चा लिया जा रहा है? किशोरों तक दवा कैसे पहुंच रही है? क्या बिक्री का कोई रिकॉर्ड है?
इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है।
क्योंकि मामला सिर्फ एक टैबलेट का नहीं है।
मामला उस पीढ़ी का है जिसके हाथ में कल देश और समाज की जिम्मेदारी होगी।
नशे के खिलाफ अब चुप्पी नहीं—सतर्कता जरूरी
बच्चों को बचाना है तो परिवार को जागना होगा, स्कूलों को सजग होना होगा, दवा विक्रेताओं को जिम्मेदार बनना होगा और प्रशासन को निगरानी कड़ी करनी होगी।
आज एक गोली पर रोक लगेगी तो कल एक जिंदगी बच सकती है।
आज एक बच्चे को समझाया जाएगा तो कल एक पूरा परिवार टूटने से बच सकता है।
युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी नशे के रास्ते को समय रहते रोकना ही समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।













