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अपने ही जिले में हक की लड़ाई लड़ रहे 18 स्थानीय ठेकेदार, बाहरी संवेदकों के प्रवेश से मचा घमासान!

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जिला परिषद की निविदा में रांची और गढ़वा के संवेदकों की भागीदारी पर स्थानीय ठेकेदारों ने उठाए सवाल, अधिकारियों पर नियमों की अनदेखी का आरोप

निविदा की शर्त संख्या-12 में स्थानीय संवेदकों को प्राथमिकता देने का स्पष्ट प्रावधान, फिर भी स्थानीय ठेकेदारों को अपने ही जिले में क्यों लड़नी पड़ रही है लड़ाई?

उपायुक्त मनीष कुमार से की गई शिकायत, डीडीसी सह मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, जिला परिषद और जिला अभियंता को भी सौंपा गया पत्र

रिपोर्ट : शैलेश सिंह

चाईबासा। पश्चिमी सिंहभूम जिले में जिला परिषद की सरकारी निविदाओं को लेकर स्थानीय और बाहरी संवेदकों के बीच विवाद गहराने लगा है। जिले के लगभग 18 स्थानीय ठेकेदार अब अपने ही जिले में अपने अधिकार और रोजगार के अवसरों की रक्षा के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। आरोप है कि जिला परिषद के अधिकारियों ने कथित तौर पर प्रभावशाली लोगों के दबाव में दूसरे जिलों के संवेदकों को पंजीकृत करने की प्रक्रिया अपनाई, जबकि स्थानीय ठेकेदार इस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

मामला अब केवल ठेकेदारी और निविदा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि स्थानीय रोजगार, आर्थिक हित और प्रशासनिक पारदर्शिता से भी जुड़ गया है। स्थानीय संवेदकों ने इस मामले में उपायुक्त मनीष कुमार से शिकायत की है। वहीं, जिला परिषद के उप विकास आयुक्त सह मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी को संबोधित विस्तृत शिकायत पत्र सौंपकर निविदा की शर्तों का पालन सुनिश्चित कराने की मांग की है।

 

निविदा की शर्त-12 बनी विवाद की सबसे बड़ी वजह

दरअसल, जिला परिषद, पश्चिमी सिंहभूम की ओर से ई-निविदा संख्या ZP/CHAIBASA/09/2026-27 आमंत्रित की गई है। इस निविदा के पृष्ठ संख्या-2 पर शर्त संख्या-12 में स्पष्ट उल्लेख है कि स्थानीय संवेदकों को प्राथमिकता दी जायेगी।

स्थानीय ठेकेदारों का सवाल है कि जब विभाग ने स्वयं निविदा में स्थानीय संवेदकों को प्राथमिकता देने का प्रावधान किया है, तो फिर इसका वास्तविक अनुपालन क्यों नहीं किया जा रहा है? उनका कहना है कि स्थानीय संवेदकों को प्राथमिकता देने की शर्त केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि निविदा प्रक्रिया में इसका व्यावहारिक लाभ भी मिलना चाहिए।

रांची और गढ़वा के संवेदकों की भागीदारी पर आपत्ति

स्थानीय संवेदकों ने अपनी शिकायत में उल्लेख किया है कि पश्चिमी सिंहभूम जिले की इस निविदा में गढ़वा, रांची एवं अन्य जिलों के संवेदकों ने भी भाग लिया है। उनका कहना है कि दूसरे जिलों के संवेदकों को पश्चिमी सिंहभूम में काम हासिल करने के अवसर मिल रहे हैं, जबकि यहां के ठेकेदारों को दूसरे जिलों में सरकारी निर्माण कार्यों की निविदाओं में भाग लेने और काम प्राप्त करने के अवसर बेहद सीमित मिलते हैं।

स्थानीय ठेकेदारों का तर्क है कि जब दूसरे जिलों में स्थानीय संवेदकों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था लागू होती है, तो पश्चिमी सिंहभूम में भी यहां के योग्य और पात्र संवेदकों को उचित अवसर मिलना चाहिए।

उन्होंने दूसरे जिलों से भाग लेने वाले संवेदकों के निबंधन, अनुभव प्रमाणपत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की निविदा की निर्धारित शर्तों के अनुरूप निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।

18 संवेदकों ने एकजुट होकर खोला मोर्चा

इस मामले में जिले के 18 स्थानीय संवेदक एकजुट होकर अपनी मांगों को प्रशासन के समक्ष रख रहे हैं। उप विकास आयुक्त सह मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी को दिए गए पत्र में उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति, स्थानीय स्तर पर रोजगार और वर्षों से इसी जिले में निर्माण कार्यों के माध्यम से आजीविका चलाने की मजबूरी का उल्लेख किया है।

संवेदकों ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य दूसरे जिलों के ठेकेदारों का व्यक्तिगत विरोध करना नहीं है, बल्कि जिला परिषद द्वारा निर्धारित नियमों और शर्तों का निष्पक्ष अनुपालन सुनिश्चित कराना है।

शिकायत पत्र की प्रतिलिपि स्थानीय विधायक सह मंत्री, जिला परिषद अध्यक्ष लक्ष्मी सूरीन और जिला अभियंता को भी भेजी गई है। अब स्थानीय संवेदकों की निगाहें जिला प्रशासन और जिला परिषद के निर्णय पर टिकी हैं।

12 योजनाएं, करोड़ों का निर्माण कार्य और स्थानीय हितों का सवाल

जिला परिषद की उक्त निविदा 15वें वित्त आयोग की राशि से संचालित होने वाली कुल 12 स्वास्थ्य केंद्र निर्माण योजनाओं से संबंधित है। इसमें आठ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तथा चार स्वास्थ्य उपकेंद्रों के निर्माण का प्रस्ताव है।

प्रमुख योजनाओं में कुमारडुंगी प्रखंड के अंधारी, मंझगांव के धोबाधोबिन, हाटगम्हरिया, मंझारी के पांगा, बंदगांव के दूधकुंडी, गुदड़ी के लोढ़ाई, नोवामुंडी तथा चक्रधरपुर प्रखंड के हथिया में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र निर्माण शामिल हैं।

इसके अलावा तांतनगर प्रखंड के गुमदापोखर, सोनुवा के देवा एवं पोड़ाहाट तथा मंझारी प्रखंड के कुंदरूगुट में स्वास्थ्य उपकेंद्रों का निर्माण कराया जाना है।

निविदा में आठ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए प्रत्येक की प्राक्कलित राशि 1 करोड़ 42 लाख 55 हजार 800 रुपये निर्धारित है, जबकि चार स्वास्थ्य उपकेंद्रों के लिए प्रत्येक की राशि 55 लाख 50 हजार रुपये है। इस प्रकार सभी 12 योजनाओं की कुल प्राक्कलित राशि लगभग 13 करोड़ 61 लाख 46 हजार 400 रुपये है।

इतनी बड़ी राशि की निर्माण योजनाओं में स्थानीय संवेदकों की भागीदारी और उन्हें प्राथमिकता देने का सवाल स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।

स्थानीय ठेकेदारों का तर्क : रोजगार का लाभ जिले के लोगों को भी मिले

स्थानीय संवेदकों ने अपने पत्र में एक महत्वपूर्ण पहलू भी उठाया है। उनका कहना है कि यदि जिले के स्थानीय ठेकेदारों को निर्माण कार्य मिलता है तो इसका लाभ केवल ठेकेदार तक सीमित नहीं रहेगा। स्थानीय मजदूरों, ट्रांसपोर्टरों, बालू, गिट्टी, सीमेंट एवं अन्य निर्माण सामग्री के विक्रेताओं तथा छोटे कारोबारियों को भी रोजगार और व्यवसाय के अवसर मिलेंगे।

इसके विपरीत, यदि जिले की अधिकांश बड़ी निर्माण योजनाओं का लाभ बाहरी संवेदकों को मिलता है तो स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को अपेक्षित बढ़ावा नहीं मिल पाएगा।

उनका कहना है कि पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिले में स्थानीय रोजगार और व्यापार को मजबूत करने के लिए जिला स्तर पर उपलब्ध योग्य संवेदकों को उचित अवसर देना जरूरी है।

बाहरी-भीतरी की लड़ाई राजनीतिक रंग ले सकती है!

संवेदक सूत्रों के अनुसार, यदि स्थानीय ठेकेदारों की शिकायत पर प्रशासन ने गंभीरता से विचार नहीं किया तो यह विवाद आने वाले दिनों में बाहरी और भीतरी संवेदकों के मुद्दे का रूप ले सकता है। स्थानीय ठेकेदारों की गोलबंदी और प्रशासन के समक्ष सामूहिक शिकायत से मामला अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बनने लगा है।

इस विवाद को लेकर जिले में राजनीतिक हलचल की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। स्थानीय हितों और रोजगार से जुड़ा यह मामला राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। सूत्रों का मानना है कि इस मुद्दे पर भाजपा सहित अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

अब प्रशासन के फैसले पर टिकी निगाहें

फिलहाल स्थानीय संवेदकों की मांग है कि जिला परिषद की निविदा की शर्त संख्या-12 का वास्तविक अनुपालन कराया जाए, बाहरी संवेदकों के निबंधन एवं तकनीकी दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच हो और सभी योग्य स्थानीय संवेदकों को नियमानुसार प्राथमिकता मिले।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जिला परिषद ने अपनी निविदा में स्थानीय संवेदकों को प्राथमिकता देने की शर्त स्वयं निर्धारित की है, तो उसके अनुपालन को लेकर विवाद की नौबत क्यों आई? क्या जिला प्रशासन इस शिकायत की जांच कर स्थानीय संवेदकों की आशंकाओं का समाधान करेगा या फिर यह विवाद आगे चलकर जिले में एक बड़े आंदोलन का रूप लेगा?

अब देखना होगा कि उपायुक्त और जिला परिषद प्रशासन इस मामले में क्या निर्णय लेते हैं।

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