गोलियों और आईईडी से बचा, लेकिन मच्छरों ने ले ली जान — असम के जवान के. आनंद सिंह की मौत ने खड़े किए गंभीर सवाल
रिपोर्ट शैलेश सिंह/संदीप गुप्ता
सारंडा के घने और दुर्गम जंगलों में चल रहे नक्सल विरोधी अभियान के बीच एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई है, जिसने सुरक्षा व्यवस्था और जवानों की सेहत को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा संभाले एक जवान की मौत गोली या विस्फोट से नहीं, बल्कि मलेरिया जैसी ‘अदृश्य बीमारी’ से हो गई।
असम निवासी जवान के. आनंद सिंह की मौत ने यह साफ कर दिया है कि सारंडा में लड़ाई सिर्फ नक्सलियों से नहीं, बल्कि जानलेवा बीमारियों से भी है।

नक्सल ऑपरेशन के बीच अचानक बिगड़ी तबीयत
सूत्रों के अनुसार, के. आनंद सिंह सारंडा जंगल में चल रहे नक्सल विरोधी अभियान में तैनात थे। लगातार गश्त, कठिन परिस्थितियों और जंगल के बीच डेरा डालने के दौरान उन्हें तेज बुखार हुआ। शुरुआत में इसे सामान्य बुखार समझा गया, लेकिन हालत जल्द ही गंभीर हो गई।
प्राथमिक जांच में मलेरिया की पुष्टि हुई। स्थिति बिगड़ते देख उन्हें तत्काल एयरलिफ्ट कर रांची भेजा गया।

रांची में टूटी जिंदगी की डोर
रांची के अस्पताल में इलाज के दौरान जवान की हालत लगातार बिगड़ती गई। डॉक्टरों के अनुसार, मलेरिया संक्रमण ने तेजी से शरीर को प्रभावित किया और मल्टीपल ऑर्गन फेलियर की स्थिति बन गई।
शनिवार को इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।
यह खबर मिलते ही पूरी बटालियन और पुलिस महकमे में शोक की लहर दौड़ गई।
सारंडा: जहां दुश्मन सिर्फ नक्सली नहीं
सारंडा को लंबे समय से मलेरिया जोन माना जाता रहा है। घने जंगल, नमी, जलभराव और सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं यहां मच्छरों के लिए आदर्श माहौल बनाते हैं।
* बारिश के बाद हालात और भी खराब हो जाते हैं
* मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है
* जवानों को खुले या अस्थायी कैंप में रहना पड़ता है
* लगातार गश्त के कारण पर्याप्त आराम और सुरक्षा नहीं मिल पाती
ऐसे में मलेरिया और डेंगू जैसे रोग जवानों के लिए ‘साइलेंट किलर’ साबित हो रहे हैं।
जंगल की जिंदगी: हर कदम पर खतरा
नक्सल विरोधी अभियान में शामिल जवानों को कई स्तरों पर संघर्ष करना पड़ता है—
* एक ओर घात लगाए बैठे नक्सली
* दूसरी ओर आईईडी और बारूदी सुरंगें
* और अब तीसरी चुनौती — मच्छर जनित बीमारियां
दुर्गम इलाकों में लंबे समय तक रहना, सीमित संसाधन और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी इस खतरे को और बढ़ा देती है।
घटना के बाद अलर्ट मोड में प्रशासन
इस दुखद घटना के बाद वरीय अधिकारियों ने तत्काल कदम उठाए हैं।
* अभियान में शामिल अन्य जवानों की स्वास्थ्य जांच के निर्देश दिए गए हैं
* मच्छरदानी, कीटनाशक और जरूरी दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है
* कैंप क्षेत्रों में साफ-सफाई और जलभराव रोकने पर जोर दिया गया है
अधिकारियों का कहना है कि नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई के साथ-साथ जवानों के स्वास्थ्य की सुरक्षा भी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
सम्मान के साथ घर वापसी की तैयारी
शहीद जवान के पार्थिव शरीर को पूरे सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव असम भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
उनकी मौत ने न सिर्फ परिवार, बल्कि पूरे सुरक्षा तंत्र को झकझोर दिया है।
एक बड़ा सवाल: क्या पर्याप्त हैं इंतजाम?
यह घटना कई गंभीर सवाल छोड़ जाती है—
* क्या नक्सल ऑपरेशन में स्वास्थ्य सुरक्षा को पर्याप्त प्राथमिकता मिल रही है?
* क्या जवानों को मलेरिया जैसे खतरों से बचाने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं?
* क्या जंगलों में मेडिकल सपोर्ट सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत नहीं है?
अब ‘दो मोर्चों’ पर लड़ाई
सारंडा में यह साफ हो गया है कि लड़ाई अब सिर्फ नक्सलियों के खिलाफ नहीं रही।
जवानों को अब दो मोर्चों पर जंग लड़नी पड़ रही है—
* हथियारबंद नक्सली
* और अदृश्य लेकिन घातक बीमारियां
के. आनंद सिंह की मौत एक चेतावनी है—
अगर समय रहते स्वास्थ्य सुरक्षा पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह ‘अदृश्य दुश्मन’ और भी कई जिंदगियां निगल सकता है।










