हर बरसात में बह रही रैयती भूमि, खेतों पर जम रही लौह अयस्क पत्थरों की मोटी परत
रिपोर्ट शैलेश सिंह
छोटानागरा और गंगदा पंचायत के किसान बोले—अब नहीं बची तो खत्म हो जाएगी हमारी खेती
सारंडा। एशिया के सबसे बड़े साल जंगल सारंडा से निकलने वाली कोयना नदी अब नदी किनारे बसे किसानों के लिए बड़ी चिंता का कारण बन गई है। बरसात के मौसम में नदी की तेज धारा लगातार किसानों की रैयती कृषि भूमि को काटकर अपने आगोश में समेट रही है। नतीजतन हर वर्ष उपजाऊ खेत सिकुड़ते जा रहे हैं और किसानों की आजीविका पर गंभीर संकट गहराता जा रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते नदी कटाव रोकने के लिए ठोस उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में कई किसानों की खेती पूरी तरह समाप्त हो सकती है।
इन गांवों की सबसे ज्यादा जमीन हो रही प्रभावित
कोयना नदी के कटाव से जोजोगुट्टू, राजाबेड़ा, जामकुंडिया, लेम्ब्रे, दुईया, दोदारी सहित छोटानागरा और गंगदा पंचायत के दर्जनों गांव प्रभावित हैं। नदी किनारे स्थित खेतों की मिट्टी लगातार कट रही है और उपजाऊ जमीन नदी में समाती जा रही है।
ग्रामीणों के अनुसार वर्षों की मेहनत से तैयार की गई कृषि भूमि अब देखते ही देखते खत्म होती जा रही है।
मुखिया की जमीन भी नहीं बच सकी
ग्रामीणों ने बताया कि गंगदा पंचायत के मुखिया राजू सांडिल की भी काफी कृषि भूमि नदी कटाव की भेंट चढ़ चुकी है। उनका कहना है कि जब जनप्रतिनिधियों की जमीन तक सुरक्षित नहीं है, तो आम किसानों की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

लौह अयस्क बना कटाव की बड़ी वजह
ग्रामीणों के अनुसार सारंडा की ऊंची पहाड़ियों में बड़ी मात्रा में लौह अयस्क मौजूद है। बरसात के दौरान तेज बारिश का पानी अपने साथ लौह अयस्क के पत्थर, लौह चूर्ण, बड़े-बड़े पत्थर और लकड़ियां बहाकर कोयना नदी में ले आता है।
तेज बहाव में बहते ये भारी पत्थर नदी किनारे खेतों की मिट्टी से टकराकर कटाव को और तेज कर देते हैं। इससे उपजाऊ मिट्टी बह जाती है और खेतों पर पत्थरों की मोटी परत जमने लगती है।
खेती करना होता जा रहा मुश्किल
किसानों का कहना है कि जहां पहले धान और अन्य फसलें लहलहाती थीं, वहां अब पत्थर और बजरी दिखाई दे रही है। कई खेत खेती योग्य नहीं रह गए हैं। इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ रहा है और परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट गहराने लगा है।

कटाव रोकने के लिए स्थायी उपाय की मांग
ग्रामीणों ने सरकार और संबंधित विभाग से मांग की है कि कोयना नदी के किनारे कटावरोधी सुरक्षा दीवार (रिटेनिंग वॉल), बोल्डर पिचिंग और अन्य वैज्ञानिक उपाय जल्द से जल्द किए जाएं, ताकि किसानों की बची हुई कृषि भूमि सुरक्षित रह सके।
उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में नदी किनारे की बड़ी आबादी अपनी कृषि भूमि से पूरी तरह वंचित हो सकती है।
सरकार से राहत की उम्मीद
ग्रामीणों का कहना है कि सारंडा के किसान पूरी तरह खेती पर निर्भर हैं। यदि उनकी जमीन ही नदी में समा जाएगी तो उनके सामने जीविका का बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। किसानों ने सरकार से मांग की है कि प्रभावित क्षेत्रों का सर्वे कराकर कटाव रोकने की स्थायी योजना बनाई जाए तथा जिन किसानों की भूमि नदी में समा चुकी है, उन्हें भी उचित सहायता और राहत प्रदान की जाए।










