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सारंडा के बिटकिलसोय स्कूल में शिक्षा का ‘हत्या कांड’! वेतन खा रहे शिक्षक, आदिवासी बच्चों का भविष्य हो रहा बर्बाद

On: June 29, 2026 3:20 PM
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नक्सल दंश झेल चुके गांव के बच्चों को मुख्यधारा में लाने के लिए खुला था स्कूल, अब वही स्कूल बना सरकारी लापरवाही और भ्रष्टाचार का अड्डा

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

बिटकिलसोय गांव — मनोहरपुर प्रखंड के नक्सल प्रभावित सारंडा के सुदूरवर्ती बिटकिलसोय गांव में स्थित एकमात्र सरकारी विद्यालय आज शिक्षा का मंदिर कम, सरकारी लापरवाही और शिक्षकीय भ्रष्टाचार का प्रतीक ज्यादा बन चुका है। जिस स्कूल को यहां के गरीब आदिवासी और वनवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देकर समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए खोला गया था, आज वही स्कूल बच्चों के भविष्य के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ करता नजर आ रहा है।
ग्रामीणों, अभिभावकों और खुद स्कूल में नामांकित बच्चों का आरोप है कि यहां नियुक्त शिक्षक महीनों स्कूल नहीं आते। अगर आते भी हैं तो केवल हाजिरी रजिस्टर दुरुस्त करने, मध्याह्न भोजन का हिसाब-किताब ठीक करने और सरकारी रिकॉर्ड चमकाने के लिए। पढ़ाई? वह तो जैसे इस स्कूल की किस्मत से ही गायब हो चुकी है।

सरकारी वेतन पूरा, पढ़ाई शून्य

यह सवाल अब गांव से निकलकर पूरे शिक्षा विभाग और सरकार के सामने खड़ा है कि आखिर जिन शिक्षकों को बच्चों का भविष्य गढ़ने की जिम्मेदारी दी गई, वे अपना कर्तव्य निभाने के बजाय मनोहरपुर में बैठकर दूसरे कामों में कैसे व्यस्त हैं?
ग्रामीणों का आरोप है कि महीने में मुश्किल से तीन-चार दिन शिक्षक स्कूल पहुंचते हैं। वह भी केवल खानापूर्ति के लिए। लेकिन वेतन हर महीने पूरा उठाते हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी धन की खुली लूट और आदिवासी बच्चों के अधिकारों की हत्या है।

किसके संरक्षण में चल रहा यह खेल?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने लंबे समय से यह सब चल रहा है, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं? ग्रामीणों का कहना है कि इन शिक्षकों को कुछ जनप्रतिनिधियों और विभागीय अधिकारियों का खुला संरक्षण प्राप्त है। यही वजह है कि वर्षों से शिकायतों के बावजूद न जांच हुई, न कार्रवाई।
यदि यह आरोप सही हैं तो यह केवल शिक्षक नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम कटघरे में खड़ा है।

जिस गांव ने पायलट दिया, वहां बच्चे किताबों से दूर

विडंबना देखिए। बिटकिलसोय गांव सारंडा के सबसे शिक्षित गांवों में गिना जाता है। इसी गांव के आदिवासी युवक पढ़-लिखकर पायलट तक बने। यानी यहां शिक्षा की मजबूत परंपरा रही है।
लेकिन आज वही गांव अपने बच्चों को शिक्षा के लिए तरसता देख रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि वे अपने बच्चों को पढ़ाकर बेहतर इंसान और बेहतर भविष्य देना चाहते हैं। लेकिन स्कूल के शिक्षक ही इस सपने के सबसे बड़े दुश्मन बन बैठे हैं।

नक्सलवाद का दर्द झेल चुका है बिटकिलसोय

यह गांव सिर्फ शिक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि सारंडा के नक्सल इतिहास में भी महत्वपूर्ण रहा है।
27 नवंबर 2001 को पहली बार नक्सलियों का 20 सदस्यीय हथियारबंद दस्ता इसी गांव के स्कूल में आकर रुका था। उसी दिन पुलिस मुठभेड़ में नक्सली ईश्वर महतो मारा गया था।
इसके एक वर्ष बाद गांव के मुंडा जीवन मसीह भुइयां की नक्सलियों ने जन अदालत लगाकर हत्या कर दी थी। उन पर पुलिस मुखबिर होने का आरोप लगाया गया था।
इसके बाद लगभग ढाई दशक तक नक्सलियों ने सारंडा को अपनी गिरफ्त में रखा। इस दौरान सैकड़ों बच्चे शिक्षा से वंचित रहे और कई युवकों को नक्सल संगठन में शामिल कर लिया गया।

अब जब शांति लौटी, तो शिक्षा पर फिर हमला

आज जब सारंडा में नक्सलवाद कमजोर पड़ा है और गांवों में विकास की उम्मीद जगी है, तब शिक्षा का यह संकट नई त्रासदी बनकर सामने आया है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर बच्चों को स्कूल में सही शिक्षा नहीं मिलेगी तो उनका भविष्य फिर अंधेरे में चला जाएगा। यह स्थिति सीधे-सीधे सामाजिक असंतुलन और पिछड़ेपन को बढ़ावा दे सकती है।

मोबाइल लोकेशन जांच से खुल सकता है बड़ा खेल

ग्रामीणों और बुद्धिजीवियों ने मांग की है कि इस स्कूल में नियुक्त शिक्षकों के पिछले एक वर्ष के मोबाइल लोकेशन की जांच कराई जाए। इससे यह साफ हो जाएगा कि वे वास्तव में स्कूल आते थे या नहीं।
यदि जांच हुई तो सिर्फ गैरहाजिरी ही नहीं, बल्कि मिड-डे मील, छात्र उपस्थिति, सरकारी रिकॉर्ड और अन्य योजनाओं में भी बड़े भ्रष्टाचार का खुलासा हो सकता है।

उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज

ग्रामीणों ने झारखंड सरकार, शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन से इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जो शिक्षक बच्चों का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं, उन्हें तत्काल निलंबित किया जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो।

सबसे बड़ा सवाल—क्या आदिवासी बच्चों की शिक्षा की कोई कीमत नहीं?

बिटकिलसोय की कहानी सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। यह उस पूरे सिस्टम का चेहरा है जो आदिवासी क्षेत्रों में विकास और शिक्षा के बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन जमीन पर बच्चों को उनके हाल पर छोड़ देता है।
सरकार करोड़ों खर्च कर स्कूल खोलती है, शिक्षक नियुक्त करती है, योजनाएं बनाती है। लेकिन जब शिक्षक स्कूल ही नहीं जाते, तो यह सब सिर्फ कागजों की दुनिया बनकर रह जाता है।
अब देखना यह है कि क्या झारखंड सरकार इस गंभीर मामले को संज्ञान में लेकर कार्रवाई करती है या फिर बिटकिलसोय के बच्चों का भविष्य ऐसे ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता रहेगा। क्योंकि यहां सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं, बल्कि आने वाली पूरी पीढ़ी के अस्तित्व और भविष्य का है।

SINGHBHUMHALCHAL NEWS

सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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