उपायुक्त की पहल से जगी आस, सारंडा ग्राम विकास परिषद की लंबी लड़ाई निर्णायक मोड़ पर
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
पश्चिमी सिंहभूम जिले के ऐतिहासिक और खनिज संपदा से भरपूर सारंडा क्षेत्र के दस वैध वनग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलाने की वर्षों पुरानी मांग अब पूरी होने की दिशा में बढ़ती दिख रही है। 12 जून को जिला समाहरणालय स्थित सभागार में उपायुक्त-सह-जिला दंडाधिकारी श्री मनीष कुमार की अध्यक्षता में आयोजित जिला स्तरीय चयन समिति की बैठक ने उन हजारों ग्रामीणों की उम्मीदों को नई ऊर्जा दी है, जो लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं और वैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
बैठक में व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वनाधिकार पट्टा वितरण के साथ-साथ वनग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने के प्रस्तावों पर गंभीरता से विचार किया गया। उपायुक्त ने संबंधित अधिकारियों को सभी प्रस्तावित वनग्रामों की वास्तविक स्थिति का स्थलीय सत्यापन कर विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, ताकि तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।

सारंडा ग्राम विकास परिषद का वर्षों पुराना आंदोलन
सारंडा के ग्रामीणों के लिए यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि दशकों से चले आ रहे संघर्ष का महत्वपूर्ण पड़ाव है। सारंडा ग्राम विकास परिषद लगातार क्षेत्र के दस वैध वनग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने की मांग उठाती रही है। परिषद का कहना रहा है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी इन गांवों के लोग मूलभूत सुविधाओं और कई सरकारी योजनाओं के पूर्ण लाभ से वंचित हैं।
विभिन्न स्तरों पर ज्ञापन, धरना-प्रदर्शन, जनप्रतिनिधियों से मुलाकात और प्रशासनिक बैठकों के माध्यम से परिषद ने इस मुद्दे को लगातार उठाया। अब उपायुक्त स्तर पर इस दिशा में पहल होने से ग्रामीणों में यह विश्वास बढ़ा है कि उनकी लंबी लड़ाई रंग ला सकती है।
राजस्व ग्राम बनने से क्या बदलेगी तस्वीर
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी वनग्राम को राजस्व ग्राम का दर्जा मिलने के बाद विकास की संभावनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं। राजस्व ग्राम बनने से वहां सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली कई प्रशासनिक बाधाएं दूर हो जाती हैं।
ग्रामीणों को सड़क, बिजली, पेयजल, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, आंगनबाड़ी, सामाजिक सुरक्षा पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अधिक व्यवस्थित तरीके से मिल सकेगा। साथ ही भूमि अभिलेखों के सुव्यवस्थित होने से भविष्य की विकास परियोजनाओं को भी गति मिलेगी।
वनाधिकार पट्टा वितरण पर भी प्रशासन गंभीर
बैठक में विभिन्न प्रखंडों से प्राप्त व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वनाधिकार पट्टा के आवेदनों की समीक्षा की गई। उपायुक्त श्री मनीष कुमार ने स्पष्ट निर्देश दिया कि सभी आवेदनों की जांच नियमानुसार, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से की जाए तथा पात्र लाभुकों को वनाधिकार अधिनियम के तहत उनका अधिकार दिलाया जाए।
उन्होंने कहा कि जांच प्रक्रिया इतनी संवेदनशील हो कि कोई भी पात्र व्यक्ति या समुदाय अपने अधिकार से वंचित न रहे। साथ ही अनावश्यक विलंब से बचते हुए लंबित मामलों का शीघ्र निष्पादन किया जाए।
सारंडा के ग्रामीणों में बढ़ी उम्मीद
बैठक की खबर सामने आने के बाद सारंडा क्षेत्र के ग्रामीणों में नई उम्मीद जगी है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि दसों वैध वनग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा मिल जाता है, तो क्षेत्र के विकास को नई दिशा मिलेगी और वर्षों से चली आ रही कई समस्याओं का समाधान संभव होगा।
ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से वे अपने अधिकारों और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते रहे हैं। अब प्रशासन की सक्रियता से उन्हें लगने लगा है कि उनकी आवाज शासन तक पहुंच रही है।
अधिकारियों को दिए गए स्पष्ट निर्देश
उपायुक्त ने सभी संबंधित विभागों के पदाधिकारियों को आपसी समन्वय के साथ कार्य करने और वनाधिकार से जुड़े मामलों के त्वरित निष्पादन का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि विकास योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना प्रशासन की प्राथमिकता है और इस दिशा में किसी भी स्तर पर लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।
बैठक में उप विकास आयुक्त, परियोजना निदेशक आईटीडीए, अपर उपायुक्त सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी उपस्थित थे। वहीं जिले के सभी अंचल अधिकारी, प्रखंड कल्याण पदाधिकारी और अन्य संबंधित अधिकारी वर्चुअल माध्यम से बैठक में शामिल हुए।
अब ग्रामीणों की नजर अगली कार्रवाई पर
सारंडा ग्राम विकास परिषद और क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों की निगाहें अब प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि स्थलीय सत्यापन और अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं समय पर पूरी होती हैं, तो वर्षों से लंबित यह मांग जल्द ही हकीकत में बदल सकती है।
सारंडा के लोगों का मानना है कि यह केवल दस गांवों की पहचान का सवाल नहीं है, बल्कि उन वनवासी परिवारों के सम्मान, अधिकार और समग्र विकास का विषय है, जिन्होंने पीढ़ियों से जंगलों के बीच अपना जीवन बसाया है और अब विकास की मुख्यधारा से जुड़ने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।














