10 लाख की जगह 40 लाख रुपये से अधिक तक पहुंच सकता है जुर्माना, लंबित विपत्रों के भुगतान पर भी संकट
छह महीने से चालान की समस्या में उलझे संवेदकों को राहत नहीं, उल्टे बढ़ी आर्थिक मुश्किलें
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
किरीबुरू। झारखंड में विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने वाले ठेकेदारों और संवेदकों को जिस कैबिनेट बैठक से राहत मिलने की उम्मीद थी, उसी के फैसले ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। खनिज पदार्थों के चालान और रॉयल्टी भुगतान से जुड़ी समस्या का समाधान तलाश रहे संवेदकों को राहत मिलने के बजाय अब भारी आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ सकता है। संवेदक सूत्रों के अनुसार, खनन विभाग के संशोधित प्रावधानों के बाद बिना वैध चालान वाले खनिज पदार्थों पर रॉयल्टी मद में कटौती और जुर्माने की राशि पहले की तुलना में दो से चार गुना या उससे भी अधिक हो सकती है।
27 अक्टूबर को कैबिनेट बैठक के बाद जारी खनन विभाग के संशोधन को लेकर संवेदकों में गहरी नाराजगी है। उनका कहना है कि पिछले करीब छह महीने से चालान की अनिवार्यता के कारण भुगतान संबंधी समस्याएं बनी हुई हैं। ऐसे में सरकार से लंबित मामलों के समाधान और पुरानी योजनाओं के विपत्रों के भुगतान में राहत की अपेक्षा थी, लेकिन नई व्यवस्था ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी है।

10 लाख की जगह 40 लाख रुपये से अधिक का बोझ!
संवेदक सूत्रों का दावा है कि रॉयल्टी दरों में बढ़ोतरी और बिना चालान वाले खनिज पदार्थों पर लागू दंडात्मक प्रावधानों के कारण जुर्माने की राशि कई गुना बढ़ सकती है। उदाहरण देते हुए बताया जा रहा है कि जहां पहले किसी मामले में करीब 10 लाख रुपये की राशि देय होती थी, वहीं नई गणना के आधार पर यह रकम 40 लाख रुपये से अधिक तक पहुंच सकती है।
हालांकि, वास्तविक देय राशि संबंधित खनिज, लागू रॉयल्टी दर, चालान की स्थिति और विभागीय प्रावधानों पर निर्भर करेगी। इसलिए इस उदाहरण को सभी मामलों पर लागू होने वाली निश्चित दर नहीं माना जा सकता।
छह महीने से चालान की समस्या, अब बढ़ी भुगतान की चिंता
खनन विभाग के पूर्व प्रकाशित गजट में खनिज पदार्थों के परिवहन और उपयोग से जुड़े चालान को अनिवार्य किए जाने के बाद से ठेकेदारों के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां बनी हुई हैं। संवेदकों का कहना है कि वे करीब छह महीने से इस समस्या के समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
उनके मुताबिक, पर्याप्त मात्रा में वैध चालान उपलब्ध नहीं होने के कारण निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाले खनिज पदार्थों का हिसाब, रॉयल्टी कटौती और विपत्रों के भुगतान की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। अब संशोधित प्रावधानों के बाद पुराने मामलों में भी भारी कटौती की आशंका ने उनकी चिंता बढ़ा दी है।

बालू घाट बंद, पत्थर खदानों पर संकट, फिर चालान कहां से लाएं?
संवेदकों ने खनिज आपूर्ति की जमीनी स्थिति पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कई क्षेत्रों में बालू घाट बंद हैं, पत्थर खदानों से संबंधित लीज की उपलब्धता सीमित है और पर्याप्त भंडारण भी नहीं है। ऐसे में निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक खनिज पदार्थों की वैध खरीद और चालान की व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण हो रहा है।
ठेकेदारों का सवाल है कि जब खनिज पदार्थों की उपलब्धता और वैध चालान प्राप्त करने में ही कठिनाई है, तब केवल चालान की अनिवार्यता और भारी आर्थिक दंड से समस्या का समाधान कैसे होगा? उनका तर्क है कि सरकार को पहले खनिजों की वैध आपूर्ति, भंडारण और चालान की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि विकास योजनाओं का काम बाधित न हो।
खाली खजाना भरने का बोझ ठेकेदारों पर?
संवेदक सूत्रों का आरोप है कि खनिज पदार्थों की रॉयल्टी दरों में बढ़ोतरी से सरकार के राजस्व में वृद्धि तो हो सकती है, लेकिन इसका सीधा आर्थिक दबाव निर्माण कार्यों में लगे ठेकेदारों पर पड़ेगा। उनका कहना है कि नई एसओआर (SOR) में दरों के समायोजन और खनिज पदार्थों की बढ़ी लागत के बीच रॉयल्टी संबंधी अतिरिक्त कटौती ने योजनाओं की आर्थिक गणना को प्रभावित किया है।
संवेदकों के अनुसार, निर्माण सामग्री की लागत बढ़ने और विपत्रों से भारी कटौती होने की स्थिति में ठेकेदारों की कार्यशील पूंजी पर दबाव बढ़ेगा। इसका असर मजदूरों के भुगतान, सामग्री की खरीद, निर्माण कार्यों की गति और नई योजनाओं को समय पर पूरा करने की क्षमता पर भी पड़ सकता है।
पुरानी योजनाओं के भुगतान में राहत की मांग
संवेदकों ने सरकार से मांग की है कि पुरानी योजनाओं के लंबित विपत्रों का भुगतान पूर्व में लागू रॉयल्टी दरों और संबंधित पुराने प्रावधानों के आधार पर करने पर विचार किया जाए। उनका कहना है कि जिन योजनाओं की निविदा, लागत गणना और कार्य निष्पादन पुराने प्रावधानों के आधार पर हुआ है, उन पर बाद में बढ़े आर्थिक बोझ को लागू करने से गंभीर वित्तीय संकट पैदा हो सकता है।
उनकी मांग है कि पुरानी और नई योजनाओं के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए तथा लंबित विपत्रों के भुगतान के लिए व्यावहारिक और पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए। इससे ठेकेदारों को राहत मिलने के साथ विकास योजनाओं की गति बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।
सरकार की चुप्पी पर सवाल, सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों से भी अपेक्षा
संवेदकों का आरोप है कि उनकी समस्याओं पर सरकार की ओर से अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है। उनका कहना है कि चालान की अनिवार्यता, खनिजों की उपलब्धता, रॉयल्टी कटौती और लंबित विपत्रों के भुगतान जैसे मुद्दे लंबे समय से बने हुए हैं, लेकिन अब तक ऐसा समाधान सामने नहीं आया है जिससे उन्हें वास्तविक राहत मिल सके।
संवेदक चाहते हैं कि सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि इस मामले में हस्तक्षेप करें और सरकार के सामने उनकी समस्याओं को मजबूती से रखें। उनका कहना है कि विकास योजनाओं को समय पर पूरा कराने की जिम्मेदारी निभाने वाले ठेकेदारों की आर्थिक परेशानियों की अनदेखी करना अंततः राज्य के विकास कार्यों के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है।
दीपावली के बाद बड़े आंदोलन की तैयारी के संकेत
सरकार के फैसले से नाराज संवेदकों के बीच दीपावली के बाद आंदोलन की रणनीति तैयार किए जाने की चर्चा है। संवेदक सूत्रों के अनुसार, यदि रॉयल्टी कटौती, चालान की उपलब्धता और लंबित विपत्रों के भुगतान पर राहत नहीं मिली, तो राज्य सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध कार्यक्रम आयोजित किया जा सकता है।
हालांकि, आंदोलन की तारीख, स्वरूप और आधिकारिक निर्णय की अभी पुष्टि नहीं हुई है। संवेदकों की आगे की रणनीति सरकार की प्रतिक्रिया और समस्याओं के समाधान के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर निर्भर करेगी।

अब सरकार के सामने समाधान की चुनौती
झारखंड में खनिज संपदा से जुड़े नियमों का पालन और सरकारी राजस्व की सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन इसके साथ निर्माण कार्यों में पारदर्शिता, वैध खनिज आपूर्ति और समय पर भुगतान सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। संवेदकों की मांग है कि सरकार दंडात्मक प्रावधानों को लागू करने के साथ उन व्यावहारिक कठिनाइयों का भी समाधान करे, जिनके कारण चालान और भुगतान की समस्या उत्पन्न हुई है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार चालान और रॉयल्टी की समस्या का व्यावहारिक समाधान निकालकर ठेकेदारों को राहत देगी या बढ़ती आर्थिक देनदारियों के बीच राज्य की विकास योजनाएं भी प्रभावित होंगी?









