सड़क, बिजली, पेयजल और पुल-पुलियों के निर्माण की भी उठाई मांग
उपायुक्त ने वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में बदलने समेत अन्य समस्याओं के समाधान का दिया भरोसा
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा, 27 अक्टूबर 2026। पश्चिमी सिंहभूम जिले के सारंडा जंगल में बसे 10 वैध वन ग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलाने की वर्षों पुरानी मांग एक बार फिर तेज हो गई है। बुनियादी सुविधाओं और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे इन गांवों के ग्रामीण मुंडाओं ने उप मुख्य सचेतक सह जगन्नाथपुर विधायक सोनाराम सिंकु और पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त मनीष कुमार को अलग-अलग दो मांग पत्र सौंपे। एक मांग पत्र में सारंडा के 10 वैध वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने की मांग की गई, जबकि दूसरे में पेयजल, बिजली, शिक्षा, सड़क तथा पुल-पुलियों सहित अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग उठाई गई।
ग्रामीणों ने विधायक सोनाराम सिंकु के समक्ष अपनी समस्याएं रखते हुए वन ग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलाने की दिशा में आवश्यक पहल करने का आग्रह किया। वहीं, उपायुक्त को सौंपे गए मांग पत्र के माध्यम से ग्रामीणों ने प्रशासन से वर्षों से लंबित मांगों पर ठोस कार्रवाई करने की अपील की। ग्रामीणों की समस्याएं सुनने के बाद उपायुक्त ने वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने तथा अन्य समस्याओं के समाधान की दिशा में आवश्यक पहल करने का भरोसा दिया।

राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं मिलने से अधिकारों पर संकट
सारंडा के ग्रामीणों की सबसे प्रमुख मांग क्षेत्र के 10 वैध वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने की है। ग्रामीणों के अनुसार, इन गांवों का इतिहास सौ साल से भी अधिक पुराना है। वन विभाग द्वारा जंगलों के संरक्षण के उद्देश्य से इन गांवों को बसाया गया था। इसके बावजूद आज तक इन गांवों को राजस्व ग्राम का पूर्ण दर्जा नहीं मिल सका है।
ग्रामीणों का कहना है कि बिहार सरकार के समय वर्ष 1991-92 में अमीन से जमीन की मापी कराकर स्थायी ग्रामीणों को रैयती खतियान भी दिया गया था। खतियान में काबिल लगान अंकित होने के बावजूद मालगुजारी रसीद नहीं काटे जाने की समस्या बनी हुई है। इसके कारण जमीन से संबंधित सरकारी प्रक्रियाओं में ग्रामीणों को परेशानी होती है।
जाति प्रमाण पत्र, आवासीय प्रमाण पत्र तथा अन्य आवश्यक दस्तावेज बनवाने के दौरान भी ग्रामीणों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, गांवों के मुंडा, डाकुवा एवं दिजरियों को सरकारी मानदेय नहीं मिलने और जमीन के स्वामित्व संबंधी अधिकारों में बाधाओं का मुद्दा भी उठाया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि राजस्व ग्राम का दर्जा केवल प्रशासनिक पहचान का विषय नहीं, बल्कि जमीन, सरकारी योजनाओं तक पहुंच और स्थानीय व्यवस्था में अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल है। इसलिए इस मांग पर अब ठोस निर्णय लिया जाना चाहिए।
सारंडा के 10 वैध वन ग्रामों का ऐतिहासिक विवरण
मांग पत्र में सारंडा के अंतर्गत आने वाले 10 वैध वन ग्रामों के नाम और उनकी स्थापना के वर्ष का उल्लेख किया गया है। इनमें मनोहरपुर प्रखंड के छह तथा नोवामुंडी प्रखंड के चार गांव शामिल हैं।
मांग पत्र में दिए गए विवरण के अनुसार गांवों की स्थापना इस प्रकार है—
- थोलकोबाद — 1905
- तिरिलपोसी — 1906
- नयागांव — 1908
- दीघा — 1911
- बिटकिलसोया — 1914
- बलिबा — 1917
- कुमडी — 1927
- नवागांव — 1910
- करमपदा — 1910
- भनगांव — 1910
इन गांवों का पुराना इतिहास इस बात को रेखांकित करता है कि यहां लंबे समय से ग्रामीण आबादी निवास कर रही है। ऐसे में ग्रामीणों की मांग है कि इनके प्रशासनिक और राजस्व संबंधी मामलों का स्थायी समाधान किया जाए, ताकि उन्हें सरकारी सुविधाओं और अधिकारों का लाभ लेने में अनावश्यक परेशानी न हो।
2013 के केंद्रीय दिशा-निर्देशों का दिया हवाला
ग्रामीण मुंडाओं ने अपने मांग पत्र में जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार के पत्रांक 23011/33/2010-FRA, दिनांक 8 नवंबर 2013 का हवाला दिया है। उनके अनुसार, इस पत्र के माध्यम से वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने के संबंध में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए थे।
मांग पत्र में यह भी कहा गया है कि ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों में वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने की प्रक्रिया अपनाई गई है। ग्रामीणों ने झारखंड में भी संबंधित दिशा-निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई करने की मांग की है।
उनका कहना है कि सारंडा के वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने की मांग कोई नई पहल नहीं है। इस विषय पर वर्षों से प्रशासन और सरकार के विभिन्न स्तरों पर पत्राचार तथा जनप्रतिनिधियों के माध्यम से प्रयास किए जाते रहे हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि पूर्व में हुई प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाते हुए समयबद्ध कार्रवाई की जाए।
2021 से 2024 तक कई स्तरों पर उठ चुका है मामला
मांग पत्र में वन ग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलाने के लिए पूर्व में किए गए प्रयासों का भी उल्लेख किया गया है।
9 जनवरी 2021: ग्रामीणों के अनुसार, तत्कालीन उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक के सारंडा दौरे के दौरान वन ग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलाने की बात कही गई थी।
20 अक्टूबर 2022: झारखंड के मुख्यमंत्री के समक्ष सचिवालय में गांवों के मुंडा-मानकियों ने आवेदन पत्र और संबंधित अधिसूचनाओं की प्रतियां प्रस्तुत की थीं। इस दौरान मौखिक रूप से भी समस्या और मांग को विस्तार से रखा गया था।
22 अक्टूबर 2022: पश्चिमी सिंहभूम के चाईबासा स्थित परिसदन में जिला 20 सूत्री कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति की बैठक के दौरान वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने के सुझाव पर चर्चा होने का उल्लेख किया गया है।
29 जुलाई 2024: उपायुक्त कार्यालय की राजस्व शाखा से पत्रांक 1037/रा. के माध्यम से मनोहरपुर, नोवामुंडी, गुदड़ी, सोनुवा, खुटपानी और टोंटो के अंचल अधिकारियों से वन ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित करने के संबंध में आवश्यक प्रतिवेदन मांगे जाने की जानकारी दी गई है।
2 अगस्त 2024: विधायक सोनाराम सिंकु द्वारा विधानसभा में सारंडा के 10 वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने की मांग उठाए जाने का उल्लेख भी मांग पत्र में किया गया है। इससे संबंधित विभागीय पत्राचार का हवाला देते हुए ग्रामीणों ने लंबित प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अपील की है।
इन घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि ग्रामीणों की मांग विभिन्न स्तरों पर उठती रही है। अब ग्रामीण चाहते हैं कि पहले से की गई पहल और विभागीय पत्राचार का परिणाम धरातल पर दिखाई दे।
सड़क और पुल-पुलिया के अभाव में आवागमन मुश्किल
राजस्व ग्राम का दर्जा देने के साथ-साथ ग्रामीणों ने सारंडा क्षेत्र में सड़क और पुल-पुलियों के निर्माण की मांग भी प्रमुखता से उठाई है। उनका कहना है कि दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कई गांवों तक पहुंचना मुश्किल है। बरसात के दिनों में आवागमन की समस्या और बढ़ जाती है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तथा अन्य आवश्यक कार्यों पर असर पड़ता है।
मांग पत्र में निम्नलिखित निर्माण कार्यों का प्रस्ताव रखा गया है—
- करमपदा से जराईकेला तक लगभग 52 किलोमीटर सड़क का कालीकरण।
- थोलकोबाद जंक्शन से बलिबा गांव तक सड़क का निर्माण।
- उकासरजोम से तिरिलपोसी तक लगभग 3 किलोमीटर नई पीसीसी सड़क।
- बिटकिलसोया से बलजोड़ी, ओडिशा सीमा तक लगभग 15 किलोमीटर नई पीसीसी सड़क।
- कुमडी गांव में कोयना पुलिया से कमल बारला के घर तक लगभग 400 मीटर पीसीसी सड़क।
- कुमडी गांव से कुलायबुरू गांव जंक्शन तक लगभग 12 किलोमीटर सड़क।
- किरीबुरू से करमपदा गांव तक लगभग 17 किलोमीटर सड़क।
- नवागांव स्कूल के समीप नाले पर तीन स्पैन वाले आरसीसी पुल का निर्माण।
ग्रामीणों के अनुसार, इन सड़कों और पुल-पुलियों के निर्माण से गांवों का संपर्क बेहतर होगा। विद्यार्थियों को विद्यालय पहुंचने, मरीजों को अस्पताल ले जाने और ग्रामीणों को प्रखंड मुख्यालय तक आने-जाने में सुविधा मिलेगी। साथ ही, क्षेत्र में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के नए अवसर भी विकसित हो सकते हैं।
बिजली, पेयजल और सामुदायिक भवन की भी मांग
ग्रामीणों ने बिजली और पेयजल की समस्या को भी गंभीरता से उठाया है। मांग पत्र में बलिबा गांव में तीन सोलर संचालित जलमीनारों के निर्माण का प्रस्ताव दिया गया है। तिरिलपोसी में एक अतिरिक्त जलमीनार बनाने तथा खराब जलमीनारों की मरम्मत कराने की मांग भी की गई है।
इसके अलावा करमपदा, नवागांव और भनगांव में बिजली की सुविधा उपलब्ध कराने तथा नयागांव में विद्युतीकरण कराने की मांग की गई है। तिरिलपोसी गांव में सामुदायिक भवन निर्माण का प्रस्ताव भी रखा गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि पेयजल, बिजली और सामुदायिक सुविधाओं की उपलब्धता ग्रामीण जीवन की बुनियादी जरूरत है। इन सुविधाओं के अभाव में लोगों को अतिरिक्त मेहनत और खर्च उठाना पड़ता है। इसलिए विकास योजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जाना चाहिए।
शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच भी बड़ी चुनौती
सारंडा के दुर्गम गांवों में सड़क और पुल-पुलियों की कमी का सीधा असर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है। विद्यार्थियों के लिए नियमित रूप से विद्यालय पहुंचना कठिन हो सकता है, जबकि आपात स्थिति में मरीजों को अस्पताल तक ले जाना चुनौतीपूर्ण बन जाता है।
ग्रामीणों ने इन समस्याओं के समाधान के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की मांग की है। उनका मानना है कि सड़क, बिजली और पेयजल जैसी सुविधाएं विकसित होने से शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भी बेहतर होगी।
हालांकि मांग पत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए अलग-अलग संस्थानों अथवा पदों का विस्तृत प्रस्ताव नहीं दिया गया है, लेकिन ग्रामीणों ने इन सेवाओं की कमी को क्षेत्र के समग्र विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है।

उपायुक्त से ठोस पहल की उम्मीद
दो अलग-अलग मांग पत्रों के माध्यम से ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने स्पष्ट किया है कि सारंडा के विकास का सवाल केवल कुछ निर्माण योजनाओं तक सीमित नहीं है। यह वन ग्रामों की पहचान, भूमि संबंधी अधिकारों, बुनियादी सुविधाओं और सरकारी योजनाओं तक प्रभावी पहुंच से भी जुड़ा हुआ है।
उपायुक्त द्वारा समस्याओं के समाधान और वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने की दिशा में पहल का भरोसा दिए जाने के बाद ग्रामीणों को उम्मीद जगी है। अब उनकी निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
ग्रामीण प्रतिनिधियों में देवधारी कुमार, अनिल तोपनो, शांतिएल भेंगरा, राहुल नायक, विनोद होनहागा, परमेश्वर तोरकोट, बीरबल गुड़िया, राजेश मुंडा सहित अन्य लोग शामिल थे।
ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है—सारंडा के ऐतिहासिक वन ग्रामों को उनका वैधानिक राजस्व दर्जा मिले और सड़क, बिजली, पेयजल, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं गांवों तक पहुंचें। वर्षों से लंबित इन मांगों पर अब आश्वासन से आगे बढ़कर ठोस और समयबद्ध कार्रवाई की आवश्यकता है।









