रामा पाण्डे ने गुवा, किरीबुरू, मेघाहातुबुरु और चिड़िया खदान प्रबंधन को दी चेतावनी, ठेका श्रमिकों पर एकतरफा कार्रवाई बर्दाश्त नहीं करेगा झारखंड मजदूर संघर्ष संघ
‘श्रमिकों के मोबाइल छीनने से पहले अस्पताल, जर्जर आवास, पेयजल, शिक्षा और सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त करे सेल’
काम के दौरान मोबाइल इस्तेमाल पर रोक जायज, लेकिन खदान परिसर में मोबाइल ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध अन्यायपूर्ण: रामा पाण्डे
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
किरीबुरू/मेघाहातुबुरु। स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के झारखंड ग्रुप ऑफ माइंस (JGOM) प्रबंधन द्वारा खदान परिसरों में ठेका श्रमिकों के मोबाइल फोन ले जाने और इस्तेमाल करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के आदेश ने मजदूर संगठनों के बीच विरोध की चिंगारी भड़का दी है। झारखंड मजदूर संघर्ष संघ के केंद्रीय अध्यक्ष रामा पाण्डे ने प्रबंधन के इस फैसले को ‘तालिबानी फरमान’ करार देते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है। उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि यदि सेल प्रबंधन ने आदेश वापस नहीं लिया, तो गुवा, किरीबुरू, मेघाहातुबुरु और चिड़िया की चारों खदानों में एक साथ बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा।

रामा पाण्डे ने सवाल उठाया कि जिस ठेका श्रमिक और सेल कर्मी की मेहनत, पसीने और परिश्रम के दम पर कंपनी लगातार लाभ अर्जित कर रही है, उसकी बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने के बजाय मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाने को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है? उनका कहना है कि प्रबंधन को सबसे पहले श्रमिकों के स्वास्थ्य, आवास, पेयजल, शिक्षा, परिवहन और सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं का समाधान करना चाहिए। इसके बाद सुरक्षा के नाम पर बनाए जाने वाले किसी भी नियम को न्यायसंगत और सभी के लिए समान होना चाहिए।
‘श्रमिकों के हाथ में मोबाइल नहीं, पहले उनकी बुनियादी समस्याओं का समाधान करे प्रबंधन’
रामा पाण्डे ने कहा कि सेल की खदानों में ठेका श्रमिक और नियमित कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में दिन-रात मेहनत करते हैं। लौह अयस्क उत्पादन से लेकर खनन, परिवहन और मशीनों के संचालन तक हर स्तर पर श्रमिकों की भूमिका अहम है। इसके बावजूद श्रमिकों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर गंभीर सवाल बने हुए हैं।
उन्होंने मांग की कि सेल प्रबंधन सबसे पहले सेल अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराए, जर्जर आवासों की मरम्मत कराए, टाउनशिप की नागरिक सुविधाओं में सुधार करे और खदानों में 24 घंटे एंबुलेंस की उपलब्धता सुनिश्चित करे। इसके साथ ही आम जनता को शुद्ध पेयजल, बच्चों को बेहतर शिक्षा और श्रमिकों को गुणवत्तापूर्ण सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएं।
उनका कहना है कि जब श्रमिकों और उनके परिवारों की रोजमर्रा की समस्याएं दूर करने की जरूरत है, तब केवल मोबाइल फोन को निशाना बनाना प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है।
रामा पाण्डे के मुताबिक, सुरक्षा के नाम पर प्रतिबंध लगाने से पहले प्रबंधन को यह बताना चाहिए कि श्रमिकों की स्वास्थ्य, आवास, पेयजल और अन्य जरूरी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।
काम के दौरान मोबाइल पर रोक समझ में आती है, लेकिन परिसर में ले जाने पर पाबंदी क्यों?
रामा पाण्डे ने स्पष्ट किया कि झारखंड मजदूर संघर्ष संघ सुरक्षा व्यवस्था के खिलाफ नहीं है। यदि कोई कर्मचारी या श्रमिक काम करते समय, मशीन चलाते हुए अथवा वाहन का संचालन करते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल करता है, तो उस पर रोक लगाना उचित है। ऐसी पाबंदी दुर्घटनाओं को रोकने और कार्यस्थल पर एकाग्रता बनाए रखने के लिहाज से जायज और न्यायसंगत है।
लेकिन काम के दौरान मोबाइल इस्तेमाल करने पर रोक लगाने और पूरे खदान परिसर में मोबाइल फोन ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बीच बड़ा अंतर है। संघ का विरोध इसी व्यापक प्रतिबंध को लेकर है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मोबाइल फोन से काम के दौरान ध्यान भटकने का खतरा है, तो नियम को जोखिम वाले कार्यों और परिस्थितियों के अनुसार लागू किया जाना चाहिए। मोबाइल को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय स्पष्ट सुरक्षा नियम बनाए जा सकते हैं, जिनके तहत मशीन संचालन, वाहन चलाने, खतरनाक कार्य करने और प्रतिबंधित परिचालन क्षेत्रों में मोबाइल के इस्तेमाल पर सख्ती से रोक लगाई जाए।
रामा पाण्डे का कहना है कि सुरक्षा नियमों का उद्देश्य दुर्घटनाओं को रोकना होना चाहिए, न कि श्रमिकों पर अनावश्यक पाबंदियां थोपना।
‘ठेका श्रमिकों के लिए अलग नियम, अधिकारियों को छूट क्यों?’
संघ के केंद्रीय अध्यक्ष ने मोबाइल प्रतिबंध के आदेश में ठेका श्रमिकों को निशाना बनाए जाने पर भी सवाल उठाया। उनका आरोप है कि ठेका श्रमिकों के मोबाइल पर रोक लगाई जा रही है, जबकि सेल के अधिकारियों को मोबाइल इस्तेमाल करने की छूट है।
उन्होंने सवाल किया कि यदि मोबाइल फोन खदान की सुरक्षा के लिए इतना बड़ा खतरा है, तो यह नियम सभी संबंधित लोगों पर समान रूप से लागू क्यों नहीं होना चाहिए? सुरक्षा के नाम पर बनाए गए नियमों में ठेका श्रमिकों और अधिकारियों के बीच भेदभाव नहीं होना चाहिए।
रामा पाण्डे के अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था तभी प्रभावी और स्वीकार्य बन सकती है, जब नियमों का पालन सभी से समान रूप से कराया जाए। यदि किसी गतिविधि से दुर्घटना की आशंका है, तो उसके लिए पद या रोजगार की श्रेणी के आधार पर अलग-अलग मापदंड नहीं होने चाहिए।
उन्होंने प्रबंधन से मांग की कि आदेश की समीक्षा कर ठेका श्रमिकों के साथ समानता और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप निर्णय लिया जाए।
ओपन माइंस में ग्रामीणों और पर्यटकों की आवाजाही, प्रतिबंध की उपयोगिता पर सवाल
रामा पाण्डे ने सेल की गुवा, किरीबुरू, मेघाहातुबुरु और चिड़िया खदानों की भौगोलिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए कहा कि ये खदानें ओपन माइंस हैं। इनके आसपास और रास्तों से ग्रामीणों, स्थानीय लोगों तथा पर्यटकों की आवाजाही बनी रहती है। सारंडा क्षेत्र में आवागमन के दौरान विभिन्न स्थानों पर लोगों का पहुंचना भी सामान्य बात है।
ऐसी परिस्थितियों में केवल ठेका श्रमिकों के मोबाइल फोन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से तस्वीरें या वीडियो सामने आने की हर संभावना समाप्त नहीं हो जाती। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई व्यक्ति खदान के किसी हिस्से की तस्वीर या वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा करना चाहे, तो केवल ठेका श्रमिकों के मोबाइल प्रतिबंध से इस संभावना को पूरी तरह कैसे रोका जा सकता है?
उनका तर्क है कि मोबाइल फोन पर रोक लगाने के बजाय खदान परिसर की सुरक्षा व्यवस्था, संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश नियंत्रण और जोखिम वाले स्थानों की निगरानी को प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
दुर्घटना या भ्रष्टाचार की तस्वीर वायरल होने का डर है तो घटनाएं रोकने पर ध्यान दे प्रबंधन
रामा पाण्डे ने प्रबंधन के सुरक्षा संबंधी तर्कों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी दुर्घटना, अव्यवस्था या कथित भ्रष्टाचार से जुड़ी तस्वीरों के वायरल होने की आशंका के कारण मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, तो यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
उनका कहना है कि प्रबंधन को ऐसी परिस्थितियां पैदा होने से रोकने पर ध्यान देना चाहिए, जिनसे दुर्घटनाएं हों या खदान की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हों। सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन, मशीनों का उचित रखरखाव, कार्यस्थलों की निगरानी, पर्याप्त सुरक्षा उपकरण और समय पर सुधारात्मक कार्रवाई से दुर्घटनाओं की आशंका कम की जा सकती है।
यदि कहीं लापरवाही या अनियमितता होती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय होनी चाहिए। तस्वीर या वीडियो सामने आने की संभावना को समाप्त करने के बजाय उस समस्या को दूर करना अधिक महत्वपूर्ण है, जिसकी वजह से ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं।
हालांकि, किसी भी दुर्घटना की तस्वीर या वीडियो साझा करते समय पीड़ितों की निजता, सुरक्षा संबंधी संवेदनशील जानकारी और जांच प्रक्रिया का ध्यान रखना भी जरूरी है। लेकिन इन चिंताओं के समाधान के लिए स्पष्ट और समान नियम बनाए जा सकते हैं।
मोबाइल फोन केवल मनोरंजन का साधन नहीं, आपात स्थिति में जीवनरक्षक संपर्क का माध्यम भी
रामा पाण्डे ने मोबाइल फोन पर पूर्ण प्रतिबंध के संभावित व्यावहारिक नुकसान की ओर भी ध्यान दिलाया। उनका कहना है कि आज मोबाइल फोन केवल बातचीत या मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि आपातकालीन संपर्क, परिवार से संवाद और जरूरी सूचनाएं प्राप्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है।
विशेषकर दूरदराज के खनन क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए मोबाइल फोन कई परिस्थितियों में उपयोगी हो सकता है।
मोबाइल फोन उपलब्ध रहने के प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:
- आपातकालीन सूचना: किसी दुर्घटना, अचानक तबीयत बिगड़ने या अन्य संकट की स्थिति में संबंधित लोगों तक शीघ्र सूचना पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
- परिवार से संपर्क: दूरस्थ क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक अपने परिवार और बच्चों से जरूरी बातचीत कर सकते हैं, खासकर किसी आकस्मिक पारिवारिक परिस्थिति में।
- स्वास्थ्य संबंधी सहायता: अस्पताल, एंबुलेंस या संबंधित सहायता केंद्र से संपर्क स्थापित करने में मोबाइल उपयोगी हो सकता है, बशर्ते कार्यस्थल की सुरक्षा व्यवस्था इसकी अनुमति दे।
- जरूरी संदेश और समन्वय: शिफ्ट से जुड़ी सूचना, कार्यस्थल में बदलाव या अन्य जरूरी संदेश प्राप्त करने में मोबाइल सहायक हो सकता है।
- शिकायत और जवाबदेही: श्रमिक अपनी समस्याओं को संबंधित अधिकारियों या श्रमिक संगठन तक पहुंचाने के लिए मोबाइल का उपयोग कर सकते हैं। नियमों के अनुरूप उपलब्ध साक्ष्य शिकायतों की जांच में भी सहायक हो सकते हैं।
- डिजिटल सेवाएं: बैंकिंग, भुगतान, जरूरी दस्तावेजों और अन्य दैनिक सेवाओं तक पहुंच में मोबाइल की भूमिका महत्वपूर्ण है।
हालांकि, इन लाभों का अर्थ यह नहीं है कि मोबाइल का इस्तेमाल मशीन संचालन, वाहन चलाने या किसी खतरनाक कार्य के दौरान किया जाए। वास्तविक जरूरत यह है कि सुरक्षा से समझौता किए बिना श्रमिकों के लिए ऐसा संतुलित नियम बनाया जाए, जिससे कार्यस्थल पर अनुशासन भी बना रहे और आपातकालीन संपर्क की सुविधा भी पूरी तरह बाधित न हो।
मोबाइल जमा कराने की व्यवस्था के साथ आपातकालीन संपर्क का भरोसेमंद विकल्प जरूरी
जेओजीओएम के सर्कुलर में ठेकेदारों को साइट कार्यालय अथवा अधिकृत पर्यवेक्षक के माध्यम से आपातकालीन संचार व्यवस्था स्थापित करने का निर्देश दिया गया है। इसके बावजूद सवाल यह है कि क्या प्रत्येक खदान में यह व्यवस्था पर्याप्त, विश्वसनीय और चौबीसों घंटे उपलब्ध होगी?
रामा पाण्डे की मांग के मद्देनजर प्रबंधन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मोबाइल जमा कराने के बाद किसी आपात स्थिति में श्रमिक अपने परिवार या जरूरी सहायता केंद्र तक सूचना पहुंचाने से वंचित न हों। इसके लिए चौबीसों घंटे सक्रिय संपर्क नंबर, पर्याप्त टेलीफोन सुविधाएं, एंबुलेंस से त्वरित संपर्क और आपातकालीन संदेश पहुंचाने की स्पष्ट प्रक्रिया उपलब्ध कराई जा सकती है।
ऐसी व्यवस्था से सुरक्षा नियमों का उद्देश्य भी पूरा होगा और श्रमिकों की व्यावहारिक जरूरतों की अनदेखी भी नहीं होगी।
चार खदानों में एक साथ आंदोलन की चेतावनी, प्रबंधन पर बढ़ा दबाव
रामा पाण्डे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि झारखंड मजदूर संघर्ष संघ इस आदेश को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने सेल प्रबंधन से मांग की कि ठेका श्रमिकों के मोबाइल फोन पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को तत्काल वापस लिया जाए और सभी संबंधित पक्षों से बातचीत कर व्यावहारिक एवं न्यायसंगत सुरक्षा नीति बनाई जाए।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रबंधन ने श्रमिकों की मांगों की अनदेखी की और आदेश वापस नहीं लिया, तो संघ गुवा, किरीबुरू, मेघाहातुबुरु और चिड़िया की चारों खदानों में एक साथ बड़ा आंदोलन शुरू करेगा।
इस चेतावनी के बाद अब निगाहें सेल प्रबंधन के अगले कदम पर टिकी हैं। एक ओर प्रबंधन खदानों में सुरक्षा और कार्य के दौरान ध्यान भटकने की समस्या को रोकने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर श्रमिक संगठन इस आदेश को एकतरफा और ठेका श्रमिकों के साथ भेदभावपूर्ण बता रहा है।
अब सवाल—सुरक्षा के नाम पर प्रतिबंध या सुविधाओं के साथ संतुलित व्यवस्था?
सेल प्रबंधन के सामने अब दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं—खदानों में दुर्घटनाओं की आशंका कम करना और श्रमिकों के अधिकारों तथा व्यावहारिक जरूरतों का ध्यान रखना। कार्य के दौरान मोबाइल इस्तेमाल पर सख्ती, जोखिम वाले क्षेत्रों में नियंत्रित प्रवेश, सभी संबंधित कर्मियों पर समान नियम और आपातकालीन संपर्क की मजबूत व्यवस्था जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
वहीं श्रमिक संगठन की मांग है कि मोबाइल प्रतिबंध के आदेश को वापस लेकर संवाद के जरिए समाधान निकाला जाए तथा स्वास्थ्य, आवास, पेयजल, शिक्षा, एंबुलेंस और सुरक्षा उपकरणों जैसी बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता दी जाए।
अब देखना होगा कि सेल प्रबंधन श्रमिक संगठन की इस खुली चुनौती पर बातचीत का रास्ता अपनाता है या मोबाइल प्रतिबंध का मुद्दा चारों खदानों में बड़े मजदूर आंदोलन का रूप लेता है।











