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बायोमेट्रिक उपस्थिति विवाद: CGIT कोर्ट में सेल प्रबंधन की फिर किरकिरी, साक्ष्य दाखिल करने में नाकाम

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चार तारीखों पर भी पेश नहीं हुए अधिकारी, दस्तावेजों का इंतजार

झारखंड मजदूर संघर्ष संघ के अध्यक्ष रमा पांडे का आरोप—अपने ही जाल में फंसा सेल प्रबंधन

श्रम कानूनों के उल्लंघन और कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर बढ़ा विवाद

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

किरीबुरू। सेल की किरीबुरू, मेघाहातुबुरु समेत झारखंड खान समूह की खदानों में बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू करने को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर चर्चा में है। 15 अक्टूबर 2026 को धनबाद स्थित केंद्रीय सरकारी औद्योगिक न्यायाधिकरण (CGIT) में मामले की सुनवाई के दौरान सेल प्रबंधन निर्धारित साक्ष्य एवं प्रमाणिक दस्तावेज दाखिल नहीं कर सका। शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों के बीच प्रबंधन के अधिकारियों की अनुपस्थिति और दस्तावेज दाखिल नहीं होने को लेकर अब अगली सुनवाई में अदालत के रुख पर सबकी निगाहें टिकी हैं।

साक्ष्य दाखिल नहीं कर सका प्रबंधन

मामले की सुनवाई के दौरान सेल प्रबंधन को अपने पक्ष में साक्ष्य और प्रमाणिक दस्तावेज प्रस्तुत करने थे। यूनियन पक्ष के अनुसार, निर्धारित तारीख पर न तो प्रबंधन की ओर से संबंधित अधिकारी उपस्थित हुए और न ही अपेक्षित दस्तावेज दाखिल किए गए। प्रबंधन के अधिवक्ता की ओर से भी इस संबंध में कोई प्रभावी पक्ष रखे जाने की जानकारी नहीं मिली।

यूनियन पक्ष का दावा है कि अब तक चार सुनवाई की तारीखों पर प्रबंधन की ओर से न तो संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति दर्ज हुई और न ही आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। हालांकि, इन दावों और अदालत की कार्यवाही की आधिकारिक पुष्टि न्यायाधिकरण के अभिलेखों से होना बाकी है।

15 जून से बायोमेट्रिक व्यवस्था लागू करने पर शुरू हुआ विवाद

विवाद की शुरुआत 15 जून 2026 से प्रस्तावित बायोमेट्रिक उपस्थिति व्यवस्था को लेकर हुई। यूनियन का आरोप है कि न्यायालय की अनुमति के बिना नई प्रणाली लागू करने की कोशिश की गई। इसके लिए प्रबंधन ने टाइम ऑफिस से कर्मचारियों के पुराने उपस्थिति कार्ड हटवा दिए, ताकि कर्मचारी बायोमेट्रिक प्रणाली से अपनी हाजिरी दर्ज करें।

इसके विरोध में कर्मचारियों ने कथित तौर पर उपस्थिति कार्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण नई प्रणाली से हाजिरी दर्ज नहीं की और पुरानी व्यवस्था के तहत टाइम ऑफिस में उपस्थिति दर्ज करने की मांग की। इस विवाद का असर झारखंड खान समूह की चार खदानों के कामकाज और उत्पादन पर पड़ने की बात भी सामने आई है। यूनियन पक्ष के अनुसार, इस दौरान उत्पादन बाधित हुआ और सेल को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। नुकसान की वास्तविक राशि की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

औद्योगिक विवाद के बीच धारा 33 का हवाला

यूनियन का कहना है कि मामला न्यायाधिकरण में विचाराधीन रहने के दौरान औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 33 के प्रावधानों का पालन करना आवश्यक था। इसी आधार पर प्रबंधन की ओर से सेवा शर्तों में बदलाव करने की कोशिश को चुनौती दी गई है।

धारा 33 औद्योगिक विवाद के लंबित रहने के दौरान कुछ परिस्थितियों में कर्मचारियों की सेवा शर्तों में बदलाव और उनके खिलाफ कार्रवाई पर कानूनी प्रतिबंध लगाती है। हालांकि, इसका लागू होना मामले की प्रकृति, संबंधित कार्यवाही और कानून में निर्धारित शर्तों पर निर्भर करता है। इसलिए इसे हर परिस्थिति में स्वतः लागू होने वाला स्टे ऑर्डर मानना उचित नहीं होगा।

यूनियन पक्ष के मुताबिक, न्यायाधिकरण ने सेल प्रबंधन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था, लेकिन निर्धारित सुनवाई तक जवाब दाखिल नहीं किया गया। अब इस मामले में न्यायाधिकरण आगे क्या रुख अपनाता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने का भी दावा

यूनियन से जुड़े सूत्रों के अनुसार, शिकायत मामले में संभावित कानूनी कार्रवाई से बचने के उद्देश्य से सेल प्रबंधन ने झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया था। दावा किया जा रहा है कि हाईकोर्ट ने प्रबंधन का मामला सुनने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद CGIT में सुनवाई जारी है।

हालांकि, हाईकोर्ट में दायर याचिका, उसके आदेश और खारिज किए जाने के आधार की आधिकारिक प्रति उपलब्ध नहीं होने के कारण इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकी है।

बायोमेट्रिक का विरोध नहीं, लागू करने के तरीके पर सवाल

इस पूरे विवाद में यूनियन का कहना है कि खदानों के कर्मचारी बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली के विरोधी नहीं हैं। उनकी आपत्ति इसे लागू करने की प्रक्रिया और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े पहलुओं को लेकर है।

यूनियन के अनुसार, उपस्थिति प्रणाली केवल वेतन निर्धारण तक सीमित नहीं है। खदानों जैसे जोखिमपूर्ण कार्यस्थलों पर कर्मचारियों की वास्तविक उपस्थिति का रिकॉर्ड उनकी सुरक्षा, आपातकालीन स्थिति में पहचान और श्रमिक अधिकारों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। इसलिए नई व्यवस्था लागू करते समय कानूनी प्रावधानों, सेवा शर्तों और कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

रमा पांडे ने सेल प्रबंधन पर साधा निशाना

झारखंड मजदूर संघर्ष संघ के केंद्रीय अध्यक्ष रमा पांडे ने सेल प्रबंधन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि प्रबंधन अपने ही जाल में फंस गया है। उनके अनुसार, श्रम कानूनों की अनदेखी कर मजदूरों पर दबाव बनाने और उनके अधिकारों की उपेक्षा करने की कोशिशों का अब कानूनी मंच पर जवाब देना पड़ रहा है।

रमा पांडे ने कहा कि श्रम कानून मजदूरों को शोषण और अत्याचार से बचाने के लिए बनाए गए हैं। किसी भी प्रबंधन या नियोक्ता को अपनी सुविधा के अनुसार इन कानूनों की अनदेखी करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि कर्मचारियों से संबंधित निर्णय कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप ही लिए जाने चाहिए।

अब न्यायाधिकरण के अगले कदम पर निगाहें

15 अक्टूबर की सुनवाई के बाद बायोमेट्रिक उपस्थिति विवाद में कानूनी प्रक्रिया और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। एक ओर यूनियन प्रबंधन पर जवाब और साक्ष्य दाखिल नहीं करने का आरोप लगा रही है, तो दूसरी ओर मामले में आगे की कार्रवाई न्यायाधिकरण के आदेशों और उपलब्ध अभिलेखों पर निर्भर करेगी।

अब देखना होगा कि CGIT अगली सुनवाई में सेल प्रबंधन से जवाब और दस्तावेज प्रस्तुत करने को लेकर क्या निर्देश देता है तथा बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू करने की प्रक्रिया पर उठाए गए सवालों का समाधान किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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