थाना प्रभारी की गाड़ी कौन चला रहा है और किसके इशारे पर? सरकारी व्यवस्था के समानांतर निजी लोगों का बढ़ता दबदबा बना गंभीर सवाल
रांची/झारखंड।
झारखंड के थानों में कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी पुलिस की है, लेकिन कई थाना क्षेत्रों से एक ऐसा सवाल लगातार उठ रहा है, जिसने पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब पुलिस विभाग में बाकायदा चालक संवर्ग और सरकारी वाहन चालकों की व्यवस्था मौजूद है, तो आखिर कई थाना प्रभारी निजी तौर पर प्राइवेट चालक क्यों रख रहे हैं?
झारखंड पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर चालक संवर्ग से संबंधित सरकारी आदेश और सेवा संबंधी दस्तावेज लगातार प्रकाशित किए जाते रहे हैं। ऐसे में थानों में सरकारी व्यवस्था से इतर निजी चालकों की मौजूदगी पर विभागीय स्तर पर स्पष्टता जरूरी हो जाती है।

सरकारी चालक अलग, ‘साहब’ का निजी चालक अलग!
स्थानीय स्तर पर मिल रही शिकायतों और चर्चाओं के अनुसार कुछ थानों में सरकारी चालक मौजूद होने के बावजूद थाना प्रभारी के साथ निजी व्यक्ति चालक के रूप में घूमते दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति किस आदेश के तहत होती है?
क्या इसके लिए जिला पुलिस मुख्यालय की अनुमति ली जाती है?
क्या निजी चालक का सत्यापन कराया जाता है?
क्या उसकी जिम्मेदारी और अधिकार लिखित रूप से तय होते हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—उसके वेतन और दूसरे खर्च का भुगतान आखिर कौन करता है?
अगर भुगतान थाना प्रभारी अपनी निजी आय से करते हैं तो यह भी जानना जरूरी है कि ऐसी व्यवस्था की विभागीय अनुमति है या नहीं। वहीं यदि किसी सरकारी मद से इसका भुगतान होता है तो उस मद, स्वीकृति और भुगतान प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
‘ड्राइवर’ से ज्यादा प्रभावशाली कैसे हो जाता है निजी व्यक्ति?
सबसे गंभीर शिकायत उन मामलों को लेकर है, जहां कथित तौर पर निजी चालक सिर्फ वाहन चलाने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि थाना प्रभारी के करीबी व्यक्ति के रूप में थाना क्षेत्र में अपना प्रभाव जमाने लगते हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि ऐसे कुछ निजी चालक थाना प्रभारी के नाम और पद का इस्तेमाल कर दुकानदारों, कारोबारियों, वाहन मालिकों और अन्य लोगों पर कथित रूप से दबाव बनाने की कोशिश करते हैं।
यदि ये आरोप सही हैं तो मामला महज निजी चालक रखने तक सीमित नहीं रह जाता। यह पुलिस पद और निजी व्यक्ति के बीच अधिकारों की सीमा धुंधली होने का गंभीर प्रश्न बन जाता है।
क्या निजी चालक ‘अनौपचारिक वसूली तंत्र’ बन रहे हैं?
कुछ शिकायतों में तो इससे भी गंभीर आरोप सामने आते हैं। आरोप है कि थाना प्रभारी के नाम पर कथित रूप से बातचीत, दबाव या आर्थिक लेन-देन के लिए निजी लोगों का इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि कहीं ऐसा हो रहा है तो इसकी निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। क्योंकि निजी व्यक्ति द्वारा पुलिस अधिकारी के नाम, पद अथवा प्रभाव का इस्तेमाल कर किसी नागरिक से पैसा मांगना या भय पैदा करना गंभीर मामला हो सकता है।
यही कारण है कि सवाल उठ रहा है कि क्या कुछ थाना प्रभारी सरकारी चालक की जगह निजी चालक रखकर अपने लिए एक ऐसा अनौपचारिक नेटवर्क तैयार कर रहे हैं, जिस पर विभागीय निगरानी अपेक्षाकृत कम हो?
वर्दी नहीं, फिर भी थाना प्रभारी का ‘रौब’ क्यों?
पुलिस विभाग में हर पद और जिम्मेदारी की अपनी निर्धारित सीमा होती है। आम जनता को पुलिस अधिकारी और पुलिस विभाग से जुड़े अधिकृत कर्मियों की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए।
लेकिन यदि कोई निजी व्यक्ति थाना प्रभारी के साथ लगातार सरकारी वाहन में घूमता है, थाने में बैठता है, पुलिसकर्मियों के बीच सक्रिय रहता है और लोगों पर पुलिस अधिकारी के नाम का प्रभाव दिखाता है, तो आम नागरिक के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वह व्यक्ति आखिर किस अधिकार से कार्रवाई या दबाव बना रहा है।
यहीं से पारदर्शिता का सवाल पैदा होता है।
थाना प्रभारी बताए—निजी चालक की जरूरत क्यों?
अगर किसी थाना प्रभारी को निजी चालक की आवश्यकता है तो विभाग को इसका स्पष्ट जवाब देना चाहिए—
- क्या निजी चालक रखने की अनुमति है?
- क्या जिला पुलिस मुख्यालय को इसकी जानकारी है?
- क्या निजी चालक का पुलिस सत्यापन हुआ है?
- क्या उसका कोई लिखित दायित्व निर्धारित है?
- क्या वह थाना परिसर में प्रवेश और पुलिस कार्यों में भाग ले सकता है?
- क्या उसे सरकारी वाहन चलाने की अनुमति है?
- दुर्घटना या किसी आपराधिक घटना की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी?
- और यदि वह सरकारी वाहन चलाता है तो उसकी वैधानिक जिम्मेदारी किसके ऊपर होगी?
इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।
ACB तक पहुंच सकती हैं शिकायतें
झारखंड पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों के लिए एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) का संपर्क माध्यम उपलब्ध कराती है। पुलिस पोर्टल पर भ्रष्टाचार संबंधी शिकायत के लिए ACB का हेल्पलाइन नंबर भी दिया गया है।
इसलिए यदि किसी थाना क्षेत्र में निजी चालक के माध्यम से कथित भयादोहन, अवैध वसूली अथवा पुलिस पद के दुरुपयोग की शिकायतें हैं, तो उनकी जांच संबंधित सक्षम एजेंसी द्वारा दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर की जा सकती है।
निगरानी की नजर में आए तो खुलेगा पूरा खेल!
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी थाना प्रभारी अथवा निजी चालक पर केवल शिकायत के आधार पर दोष सिद्ध नहीं माना जा सकता। लेकिन लगातार मिल रही शिकायतों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
जरूरत इस बात की है कि पुलिस मुख्यालय सभी जिलों से यह रिपोर्ट मंगाए कि—
कितने थानों में सरकारी चालक पदस्थापित हैं, कितने थाना प्रभारियों के साथ निजी चालक कार्यरत हैं और उन्हें रखने की अनुमति किस स्तर से दी गई है।
साथ ही उन निजी चालकों की भूमिका, पुलिस सत्यापन, सरकारी वाहन के उपयोग और थाना परिसर में उनकी गतिविधियों की भी जांच हो।
जनता का सीधा सवाल—पुलिस व्यवस्था में ‘बिचौलियों’ की जरूरत क्यों?
पुलिस का मूल दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना, अपराध की रोकथाम और नागरिकों की सुरक्षा है। झारखंड पुलिस का नागरिक चार्टर भी पुलिस की इन जिम्मेदारियों और नागरिकों के अधिकारों को रेखांकित करता है।
ऐसे में यदि कहीं निजी व्यक्ति पुलिस अधिकारी और जनता के बीच अनधिकृत प्रभावशाली कड़ी बन रहा है तो यह व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए चिंता का विषय है।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि “प्राइवेट चालक क्यों रखा गया?”
बल्कि बड़ा सवाल यह है—
“क्या किसी थाना प्रभारी को सरकारी व्यवस्था के समानांतर अपना निजी तंत्र खड़ा करने की अनुमति है?”
और यदि नहीं, तो ऐसे मामलों में विभागीय कार्रवाई कब होगी?
जनता अब इन सवालों का जवाब पुलिस मुख्यालय और संबंधित जिला पुलिस प्रशासन से चाहती है।










