अरबों की संपदा उगलने वाले सारंडा में पत्तों पर टिकी जिंदगी, खदानों की चमक के बीच आदिवासियों की बेबसी पर कौन देगा जवाब?
रिपोर्ट : शैलेश सिंह/संदीप गुप्ता
सारंडा। जिस धरती के सीने से निकलने वाला लौह अयस्क देश की बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों को शक्ति देता है, जिस जंगल की हरियाली को एशिया का गौरव बताया जाता है, उसी सारंडा की पगडंडियों पर आज सैकड़ों आदिवासी परिवार भूख और बेरोजगारी से जंग लड़ रहे हैं। यह विडंबना नहीं, बल्कि विकास के उन दावों पर एक करारा तमाचा है जिनमें आदिवासी कल्याण और रोजगार की लंबी-लंबी बातें की जाती हैं।
लगभग 850 वर्ग किलोमीटर में फैला सारंडा, जिसका अर्थ है “सात सौ पहाड़ियों का जंगल”, आज एक ऐसे दर्द को अपने भीतर समेटे हुए है जिसे आंकड़ों और सरकारी फाइलों में महसूस नहीं किया जा सकता। यहां के लोग अब खदानों की मशीनों की आवाज नहीं सुनते, बल्कि जंगल में पत्ते तोड़ते समय हाथियों की चिंघाड़ और सांपों की सरसराहट के बीच अपनी जिंदगी तलाशते हैं।
यह कहानी सिर्फ साल पत्तों की नहीं है, यह उस टूटे हुए सपने की कहानी है जिसे कभी रोजगार, विकास और समृद्धि का नाम दिया गया था।

धरती सोना उगले, लेकिन घरों में चूल्हा बुझा रहे
सारंडा की पहाड़ियों के नीचे अरबों रुपये का लौह और मैंगनीज अयस्क दबा पड़ा है। दशकों तक यहां संचालित खदानों ने सरकारों को राजस्व दिया, उद्योगों को कच्चा माल दिया और देश की अर्थव्यवस्था को गति दी।
लेकिन जब एक-एक कर अधिकांश खदानें बंद होती चली गईं, तब सबसे बड़ा सवाल उन हजारों मजदूर परिवारों का था जिनकी जिंदगी इन्हीं खदानों पर टिकी थी।
आज सेल की कुछ खदानों को छोड़ अधिकांश खदानें बंद हैं। खदानों की बंदी के साथ रोजगार भी बंद हो गया। मजदूर बेरोजगार हो गए, ट्रकों के पहिए थम गए, छोटे कारोबार खत्म हो गए और पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था चरमरा गई।
सरकारी रिपोर्टों में शायद यह सिर्फ “खनन गतिविधियों में कमी” होगी, लेकिन गांवों में यह भूख, बेबसी और टूटती उम्मीदों की कहानी है।
सुबह रोटी की तलाश में निकलता है पूरा परिवार
सारंडा के नुइयां, कमारबेड़ा, डिम्बुली, गंगदा, छोटानागरा और आसपास के गांवों में सुबह का दृश्य किसी युद्ध पर निकलने वाले काफिले जैसा दिखता है।
पुरुष, महिलाएं और कई बार बच्चे भी अपने साथ थोड़ा भोजन और पानी लेकर जंगल की ओर निकल पड़ते हैं। उनके हाथों में कोई रोजगार कार्ड नहीं होता, कोई सरकारी नियुक्ति पत्र नहीं होता, कोई वेतन पर्ची नहीं होती।
उनके पास सिर्फ एक उम्मीद होती है—शाम तक इतने पत्ते इकट्ठा हो जाएं कि घर का चूल्हा जल सके।
घंटों जंगल में भटककर साल और सियाली के पत्ते तोड़े जाते हैं। धूप, पसीना और थकान के बीच पूरा दिन बीत जाता है। शाम को जब वे लौटते हैं तो उनके सिर पर पत्तों का बोझ होता है और दिल में अगले दिन की चिंता।
45 रुपये किलो में बिकती है जिंदगी
ग्रामीण बताते हैं कि एक परिवार दिनभर मेहनत कर पत्तों का बंडल तैयार करता है। इन बंडलों को व्यापारी खरीदते हैं।
प्रति किलो लगभग 45 रुपये की दर से बिकने वाले इन पत्तों में सिर्फ हरियाली नहीं होती, बल्कि एक परिवार की भूख, बच्चों की पढ़ाई, बूढ़े माता-पिता की दवा और पूरे घर का भविष्य बंधा होता है।
विडंबना देखिए, जिस क्षेत्र की मिट्टी अरबों का खनिज देती है, वहां के लोग कुछ सौ रुपये की कमाई के लिए पूरा दिन जंगलों में खाक छानने को मजबूर हैं।

जंगल में हर कदम पर मौत खड़ी रहती है
सारंडा सिर्फ रोजगार का स्रोत नहीं, बल्कि खतरे का दूसरा नाम भी है।
यहां हाथियों के विशाल झुंड विचरण करते हैं। भालू, तेंदुआ, जंगली सूअर, विषैले सांप और बिच्छू हर समय खतरा बने रहते हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि कई बार हाथियों के सामने पड़ने पर उन्हें जान बचाने के लिए भागना पड़ा है। कई बार सांपों ने रास्ता रोक लिया, तो कई बार जंगली जानवरों की आहट से पूरा परिवार दहशत में आ गया।
लेकिन भूख का डर जंगल के डर से बड़ा होता है।
यही कारण है कि अगली सुबह वे फिर उसी जंगल की ओर निकल पड़ते हैं।
सरकारी योजनाएं कागजों में, रोजगार जंगल में
सरकारें आदिवासी विकास, रोजगार सृजन और ग्रामीण उत्थान के दावे करती हैं। हर वर्ष करोड़ों रुपये की योजनाएं बनाई जाती हैं। बैठकों में आंकड़े गिनाए जाते हैं और मंचों से उपलब्धियों के गीत गाए जाते हैं।
लेकिन यदि इन दावों की सच्चाई देखनी हो तो सारंडा के उन गांवों में जाना होगा जहां पूरा परिवार जंगल के पत्तों पर निर्भर है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब खदानें बंद हुईं तो हजारों परिवारों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
यदि सरकारें रोजगार देने में सफल रहीं होतीं, तो क्या आज आदिवासी महिलाओं को जहरीले सांपों और जंगली हाथियों के बीच पत्ते तोड़ने जाना पड़ता?
यदि विकास वास्तव में गांवों तक पहुंचा होता, तो क्या बच्चों का भविष्य साल पत्तों के बंडलों में बंधा होता?
पतझड़ आते ही भूख और गहरी हो जाती है
साल पत्तों पर निर्भर इन परिवारों की जिंदगी वैसे ही कठिन है, लेकिन पतझड़ का मौसम उनकी परेशानियों को कई गुना बढ़ा देता है।
जब पेड़ों से पत्ते झड़ने लगते हैं तो रोजगार लगभग समाप्त हो जाता है। आय का स्रोत रुक जाता है। घरों में आर्थिक संकट गहरा जाता है।
ऐसे समय में कई परिवारों को उधार लेना पड़ता है। कुछ लोग पलायन कर जाते हैं। कुछ आधे पेट भोजन कर दिन गुजारते हैं।
यह वही क्षेत्र है जहां कभी खदानों की वजह से रोजगार की कमी नहीं थी।
जंगल काटने वालों से ज्यादा जंगल बचा रहे हैं गरीब
एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि जिन लोगों को अक्सर पिछड़ा और अशिक्षित कहा जाता है, वही आज सारंडा के सबसे बड़े संरक्षक बने हुए हैं।
ग्रामीण साफ कहते हैं कि जंगल कटेगा तो उनका जीवन भी कट जाएगा।
वे पेड़ों को रोजगार मानते हैं, जीवन मानते हैं और आने वाली पीढ़ियों की पूंजी मानते हैं। यही कारण है कि पत्ते तोड़ने वाले ये परिवार जंगल को बचाने की अपील भी करते हैं।
जंगल उनके लिए सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि अस्तित्व है।
सारंडा पूछ रहा है—आखिर हमारा कसूर क्या है?
आज सारंडा की पहाड़ियां एक सवाल पूछ रही हैं।
जिस क्षेत्र ने देश को खनिज दिया, उद्योगों को ताकत दी और सरकारों को राजस्व दिया, आखिर उसी क्षेत्र के लोगों को बेरोजगारी और अभाव क्यों मिला?
आखिर विकास की दौड़ में सबसे पीछे वही लोग क्यों छूट गए जिनकी जमीन और जंगलों से विकास की नींव रखी गई?
यह सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, बल्कि पूरे तंत्र से है।

पत्तों में कैद है सारंडा की पीड़ा
सारंडा के जंगलों में टूटते पत्तों की आवाज शायद शहरों तक नहीं पहुंचती, लेकिन उन पत्तों में यहां के लोगों का दर्द साफ सुनाई देता है।
हर बंडल के साथ एक मां की चिंता बंधी होती है, हर गठरी में बच्चों की पढ़ाई का सपना छिपा होता है और हर पत्ते के पीछे एक बेरोजगार परिवार की मजबूरी होती है।
सारंडा आज भी देश को खनिज दे रहा है, जंगल दे रहा है, पर्यावरण दे रहा है। लेकिन बदले में सारंडा के लोग सिर्फ इतना मांग रहे हैं—रोजगार, सम्मान और जीने का अधिकार।
जब तक यह अधिकार उन्हें नहीं मिलता, तब तक सारंडा की हर पगडंडी, हर पहाड़ी और हर साल का पेड़ विकास के उन दावों पर सवाल उठाता रहेगा, जिनमें चमक तो बहुत है, लेकिन आदिवासियों की जिंदगी के अंधेरे को मिटाने का जवाब नहीं।














