कोबरा, सीआरपीएफ, झारखंड जगुआर और पुलिस जवानों की कुर्बानियों से नक्सलवाद की कमर टूटी, लेकिन सारंडा के सुदूर गांव आज भी विकास की राह ताक रहे हैं। अब मानकी, मुंडा, पंचायत प्रतिनिधि और ग्रामीणों ने मंत्री दीपक बिरुवा के सामने रखी अपनी पीड़ा और मांगों की पूरी फेहरिस्त।
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा का नाम कभी देश के सबसे खतरनाक नक्सल प्रभावित इलाकों में लिया जाता था। यहां की पहाड़ियों और जंगलों में कभी बारूदी सुरंगें बिछी रहती थीं, गोलियों की आवाजें गूंजती थीं और ग्रामीण भय के साए में जीवन बिताते थे।
यह वही धरती है जहां कोबरा बटालियन, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, झारखंड जगुआर और जिला पुलिस के जवानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर वर्षों तक संघर्ष किया। कई जवान शहीद हुए, कई अधिकारी घायल हुए और अनगिनत अभियान चलाए गए। उन्हीं बलिदानों का परिणाम है कि आज सारंडा के अधिकांश गांव नक्सल प्रभाव से लगभग मुक्त हो चुके हैं।
हालांकि कुख्यात एक करोड़ के इनामी नक्सली नेता मिसिर बेसरा और उसके कुछ बड़े सहयोगी अब भी चुनौती बने हुए हैं।
लेकिन आज असली सवाल नक्सलवाद नहीं, बल्कि विकास है।

नक्सलवाद खत्म हुआ, लेकिन विकास अब भी अधूरा
सारंडा के सुदूरवर्ती गांवों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है। जिन गांवों में कभी सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ होती थी, वहां आज भी लोग सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
यह विडंबना है कि जिन गांवों ने नक्सल हिंसा की सबसे बड़ी कीमत चुकाई, वही आज विकास की दौड़ में सबसे पीछे हैं।
चाईबासा में मंत्री के सामने फूटा ग्रामीणों का दर्द
इसी पीड़ा को लेकर सारंडा और आसपास के करीब 15 गांवों के मानकी, मुंडा, पंचायत प्रतिनिधि और ग्रामीण चाईबासा पहुंचे और मंत्री दीपक बिरुवा से मुलाकात कर अपनी समस्याएं रखीं।
इनमें शामिल प्रमुख लोगों के नाम इस प्रकार हैं—
सारंडा पीड़ के मानकी लागुड़ा देवगम, गंगदा पंचायत के मुखिया राजू शांडिल, जामकुंडिया के मुंडा खुशी देवगम, दुईया के मुंडा जानुम सिंह चेरोवा, रोआम के मुंडा बुधराम सिद्धू, विजय सिद्धू, राजू गोप, झामुमो नेता बृंदा गोप, गुआ से सुमित दास, प्रीतम गोप, गंगदा पंचायत समिति सदस्य रामेश्वर चांपिया, कैलाश सुरीन, चिड़िया से मुन्नू चौबे, अग्रवां/बिऊबेड़ा से जगदीश कोड़ा आदि दर्जनों।
इन सभी ग्रामीणों ने मंत्री के सामने गांवों की समस्याओं को विस्तार से रखा और कहा कि अब उन्हें सुरक्षा नहीं, विकास चाहिए।
ग्रामीणों ने रखीं ये प्रमुख मांगें
ग्रामीणों ने मंत्री से कहा कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई खत्म हो चुकी है, लेकिन अब विकास की लड़ाई शुरू होनी चाहिए। उनकी प्रमुख मांगें थीं—
हर गांव तक सड़क और पुल
आज भी कई गांव बरसात में मुख्य मार्ग से कट जाते हैं।
स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना
बीमारों और गर्भवती महिलाओं को कई किलोमीटर दूर ले जाना पड़ता है।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार
स्कूल भवन तो हैं, लेकिन शिक्षक और संसाधन नहीं हैं।
पेयजल संकट का समाधान
गर्मी के मौसम में पानी की भारी समस्या रहती है।
बिजली और मोबाइल नेटवर्क
आज भी कई गांव अंधेरे में हैं और संचार व्यवस्था कमजोर है।
स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार
बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है।

मंत्री ने दिया भरोसा
मंत्री दीपक बिरुवा ने ग्रामीणों की सभी समस्याओं को गंभीरता से सुना और भरोसा दिलाया कि इनका समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सारंडा जैसे संघर्षशील क्षेत्र के गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
21 जून को बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम संभव
सूत्रों के अनुसार 21 जून को सारंडा और कोल्हान क्षेत्र के दर्जनों गांवों के 50 से अधिक मानकी, मुंडा, समाजसेवी, पंचायत प्रतिनिधि और ग्रामीण, जो वर्तमान में विभिन्न दलों से जुड़े हैं, मंत्री दीपक बिरुवा के प्रयास से झारखंड मुक्ति मोर्चा में शामिल हो सकते हैं।
हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चा तेज है।
अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा असर भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और आजसू पार्टी पर पड़ सकता है।

अब असली जंग विकास की है
सारंडा में अब गोलियों की आवाजें लगभग थम चुकी हैं, लेकिन विकास की आवाजें और तेज हो गई हैं।
जिन जवानों ने अपनी शहादत देकर इस क्षेत्र को नक्सलवाद से मुक्त कराया, उनके बलिदान का असली सम्मान तभी होगा जब यहां के गांवों में सड़कें बनेंगी, अस्पताल खुलेंगे, स्कूलों में शिक्षक आएंगे और युवाओं को रोजगार मिलेगा।
आज सारंडा की लड़ाई जंगल में छिपे नक्सलियों से नहीं, बल्कि वर्षों की उपेक्षा और सरकारी सुस्ती से है।
अगर अब भी सरकार नहीं जागी, तो यह सवाल हमेशा उठेगा—
क्या शहीदों की कुर्बानी सिर्फ सुरक्षा तक सीमित थी, या उसके पीछे एक विकसित और समृद्ध सारंडा का सपना भी था?













