छोटानागरा और जामकुंडिया बाजार में दिखी आदिवासी एकता की ताकत, पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे हो, संथाल, मुंडा और उरांव समाज के लोग
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
* “वीर बिरसा मुंडा अमर रहे, सिद्धू-कान्हू अमर रहे, पोटो हो अमर रहे, तिलका मांझी अमर रहे, लाको बोदरा अमर रहे, चांद-भैरो अमर रहें, फूलो-झानो अमर रहें…”
* “एक तीर, एक कमान—आदिवासी एक समान।”
* “जन-जन का नारा है—भारत देश हमारा है।”
* “जल, जंगल, जमीन हमारा है। देश की रक्षा कौन करेगा—हम करेंगे, हम करेंगे।”
इन गगनभेदी नारों, ढोल-नगाड़ों और मांदर की थाप से रविवार को सारंडा का छोटानागरा और जामकुंडिया बाजार गूंज उठा। अवसर था विश्व आदिवासी दिवस का। सारंडा के दर्जनों गांवों से हजारों की संख्या में आदिवासी महिला, पुरुष, बच्चे और युवा पारंपरिक वेशभूषा में कार्यक्रम स्थल पहुंचे। पूरा क्षेत्र आदिवासी संस्कृति, परंपरा, एकता और संघर्ष की भावना से सराबोर नजर आया।

पारंपरिक वेशभूषा में उमड़ा जनसैलाब
विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर सारंडा के विभिन्न गांवों से ग्रामीण समूह बनाकर छोटानागरा और जामकुंडिया पहुंचे। किसी के हाथ में पारंपरिक वाद्य यंत्र था तो कोई मांदर और नगाड़े की थाप पर नाचता-गाता कार्यक्रम स्थल तक पहुंचा।
हो, संथाल, मुंडा, उरांव सहित विभिन्न आदिवासी समुदायों की महिलाओं और पुरुषों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा में हिस्सा लेकर कार्यक्रम को सांस्कृतिक रंग दे दिया। बच्चे और युवा भी पूरे उत्साह के साथ कार्यक्रम में शामिल हुए।
गांवों से पहुंचे समूह अपने साथ चावल और अन्य खाद्य सामग्री भी लेकर आए थे। रास्ते भर मांदर और ढोल की थाप के साथ पारंपरिक गीत और नृत्य का दौर चलता रहा। इससे छोटानागरा और जामकुंडिया बाजार का वातावरण पूरी तरह उत्सवमय हो गया।

आदिवासी ध्वज की पूजा के बाद हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम की शुरुआत आदिवासी समाज के पुजारियों द्वारा पारंपरिक विधि-विधान के साथ की गई। सबसे पहले छोटानागरा चौक पर आदिवासी ध्वज की पूजा-अर्चना कर उसे स्थापित किया गया। इसके बाद जामकुंडिया बाजार में भी आदिवासी ध्वज की विधिवत पूजा-अर्चना की गई।
इस दौरान आदिवासी समाज के पुरोधाओं, स्वतंत्रता सेनानियों और वीर शहीदों को श्रद्धापूर्वक नमन किया गया तथा उनके चित्रों एवं स्मृतियों पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी गई।

बिरसा से लेकर सिद्धू-कान्हू तक वीरों को किया याद
कार्यक्रम में आदिवासी समाज के महानायकों और शहीदों को याद करते हुए उनके संघर्ष और बलिदान को नमन किया गया। भगवान बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, पोटो हो, तिलका मांझी, लाको बोदरा, चांद-भैरो, फूलो-झानो सहित आदिवासी समाज के अनेक वीरों के जयकारे लगाए गए।
वक्ताओं ने कहा कि इन महानायकों ने अपने जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। उनके संघर्ष और बलिदान से वर्तमान पीढ़ी को प्रेरणा लेने की जरूरत है।

मांदर की थाप पर थिरके कदम, युवतियों ने दी सांस्कृतिक प्रस्तुति
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिली। युवतियों ने पारंपरिक गीत और नृत्य की शानदार प्रस्तुति देकर लोगों का मन मोह लिया।
मांदर, ढोल और नगाड़े की थाप के साथ पारंपरिक नृत्य ने पूरे कार्यक्रम में नई ऊर्जा भर दी। बड़ी संख्या में मौजूद ग्रामीणों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया और कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।

मधु कोड़ा बोले—एकता ही आदिवासी समाज की सबसे बड़ी ताकत
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने आदिवासी समाज की एकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में जिस दिन पूरी एकता स्थापित हो जाएगी, उस दिन मानकी-मुंडा, सामाजिक व्यवस्था और पारंपरिक व्यवस्था भी पूरी मजबूती के साथ एकजुट होकर काम करेगी।
उन्होंने कहा कि आज समाज में एकता की कमी के कारण आदिवासी समुदाय अपने कई अधिकारों से वंचित हो रहा है। उन्होंने लोगों से अपनी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करने का आह्वान किया।
मधु कोड़ा ने कहा कि छोटानागरा में जल्द ही वीर बिरसा मुंडा की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के महानायकों की स्मृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है, ताकि युवा उनके संघर्ष और बलिदान से प्रेरणा ले सकें।

दुबिल खदान का मुद्दा भी उठा
पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में दुबिल खदान से जुड़े स्थानीय आदिवासियों के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के आदिवासियों को रोजगार और अन्य सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जिस क्षेत्र की जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से खनन गतिविधियां संचालित होती हैं, वहां के स्थानीय लोगों को विकास और रोजगार का लाभ मिलना चाहिए। आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए सामूहिक आवाज उठाने की जरूरत है।

गीता कोड़ा बोलीं—आज भी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा आदिवासी समाज
पूर्व सांसद गीता कोड़ा ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस केवल उत्सव मनाने का दिन नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, संस्कृति और पहचान को याद करने और उन्हें सुरक्षित रखने का अवसर भी है।
उन्होंने कहा कि आज भी आदिवासी समाज अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। उन्होंने मझगांव में आदिवासी सरना स्थल को असामाजिक तत्वों द्वारा अपवित्र किए जाने की बात उठाते हुए कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों का सम्मान होना चाहिए। ऐसे स्थलों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
गीता कोड़ा ने कहा कि समाज में एकता की कमी का फायदा उठाकर कई जगह आदिवासियों का शोषण और उत्पीड़न किया जा रहा है। यदि समाज एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएगा तो निश्चित रूप से आदिवासी समुदाय को उसका अधिकार मिलेगा।
महापुरुषों के सपनों को साकार करने का संकल्प
पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और पूर्व सांसद गीता कोड़ा ने आदिवासी समाज के महानायकों और वीर शहीदों को याद करते हुए उनके सपनों को साकार करने का आह्वान किया। दोनों नेताओं ने कहा कि सशक्त, शिक्षित, एकजुट और विकसित आदिवासी समाज ही विकसित झारखंड की मजबूत नींव बन सकता है।
उन्होंने युवाओं से अपनी संस्कृति और परंपरा से जुड़े रहने के साथ शिक्षा, रोजगार और सामाजिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने की अपील की।

जल-जंगल-जमीन की गूंज रही सबसे तेज
पूरे कार्यक्रम के दौरान जल, जंगल और जमीन का मुद्दा प्रमुखता से उठता रहा। आदिवासी समाज के लोगों ने कहा कि जल, जंगल और जमीन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का आधार हैं।
कार्यक्रम में लोगों ने एक स्वर में कहा कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के साथ स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा भी जरूरी है। यही कारण रहा कि “जल, जंगल, जमीन हमारा है” जैसे नारों से कार्यक्रम स्थल बार-बार गूंजता रहा।

परंपरा के साथ दिखी नई पीढ़ी की भागीदारी
इस बार विश्व आदिवासी दिवस समारोह में सबसे खास बात युवाओं और बच्चों की बड़ी भागीदारी रही। पारंपरिक परिधान पहने बच्चे और युवा मांदर की थाप पर नाचते नजर आए। युवतियों की सांस्कृतिक प्रस्तुति ने भी कार्यक्रम को विशेष आकर्षण प्रदान किया।
ग्रामीणों ने कहा कि आधुनिक दौर में अपनी संस्कृति और परंपरा को जीवित रखना बड़ी चुनौती है। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी अपनी जड़ों, भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ती है।
सारंडा में दिखी आदिवासी एकता की तस्वीर
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर छोटानागरा और जामकुंडिया में उमड़ी भीड़ ने सारंडा में आदिवासी एकता की मजबूत तस्वीर पेश की। अलग-अलग गांवों से पहुंचे लोगों ने मिलकर अपने सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम में सारंडा पीड़ के मानकी लागुड़ा देवगम, मनोज चांपिया, मुंडा बिनोद बारीक, मुंडा कानूराम देवगम, मुंडा जामदेव चांपिया, मुंडा सुकराम तोड़कोट, मुंडा चिंतामणि चांपिया, मुंडा लेबेया देवगम, बामिया माझी, मानसिंह चांपिया, रॉबी लकड़ा, राजेश सांडिल, साधो देवगम, भुवनेश्वर जारीका, बुधराम देवगम, सर्गेया चांपिया, सुनील चांपिया, दीयूरी जोया चांपिया, सुलेमान टोपनो, रोया सुरीन, राजा सुरीन सहित हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग शामिल हुए।

नारों में गूंजा अधिकार और राष्ट्रप्रेम
कार्यक्रम के दौरान एक ओर जहां आदिवासी समाज के वीर शहीदों के जयकारे लगाए गए, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रप्रेम की भावना भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी। “जन-जन का नारा है, भारत देश हमारा है” और “देश की रक्षा कौन करेगा—हम करेंगे” जैसे नारों ने कार्यक्रम को देशभक्ति के रंग से भी जोड़ दिया।
आयोजकों ने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से देश की प्राकृतिक संपदा और सीमाओं की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। समाज के वीरों के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

संस्कृति, अधिकार और एकता का संदेश देकर संपन्न हुआ समारोह
छोटानागरा और जामकुंडिया में आयोजित विश्व आदिवासी दिवस समारोह केवल सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने आदिवासी एकता, अधिकार, संस्कृति, परंपरा और जल-जंगल-जमीन की रक्षा का संदेश भी दिया।
मांदर की थाप, पारंपरिक नृत्य, वीर शहीदों के जयकारे और अधिकारों की आवाज के बीच हजारों लोगों ने आदिवासी समाज की समृद्ध विरासत को जीवंत किया। कार्यक्रम के अंत में लोगों ने अपनी संस्कृति और परंपरा को बचाने, समाज में एकता मजबूत करने तथा वीर शहीदों के सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया।
सारंडा की धरती पर विश्व आदिवासी दिवस का यह आयोजन एक बार फिर यह संदेश दे गया कि—
“एक तीर, एक कमान, आदिवासी एक समान।”












