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मेघाहातुबुरू में धूमधाम से मना विश्व आदिवासी दिवस, संस्कृति और अधिकारों की गूंज से सराबोर हुआ सामुदायिक केंद्र

On: August 11, 2026 6:37 PM
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सैकड़ों लोगों ने लिया हिस्सा, पारंपरिक नृत्य-संगीत और वेशभूषा ने मोहा मन; शिक्षा, नशामुक्ति और अधिकारों की रक्षा पर दिया जोर

रिपोर्ट : शैलेश सिंह | मेघाहातुबुरू

मेघाहातुबुरू सामुदायिक केंद्र में 9 अगस्त को आदिवासी संयुक्त मंच, किरीबुरू-मेघाहातुबुरू के तत्वावधान में विश्व आदिवासी दिवस हर्षोल्लास और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में आदिवासी संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज और समृद्ध विरासत की शानदार झलक देखने को मिली। करीब 2000 से 2200 लोगों की मौजूदगी में आयोजित समारोह में पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-नगाड़ों, दमा-दुमांग, नृत्य, गीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को आदिवासी रंग में रंग दिया।

कार्यक्रम का मंच संचालन प्रतिमा पुरती, एलिजावेद पुरती, एस. होरो एवं गोपी लागुरी ने किया। मुख्य अतिथि एस.एस. शाह, सीजीएम मेंटेनेंस, झारखंड ग्रुप ऑफ माइंस का आदिवासी रीति-रिवाज के अनुसार दमा-दुमांग और पारंपरिक नृत्य के साथ स्वागत किया गया। इसके बाद अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया।

अधिकारों की रक्षा और संस्कृति के सम्मान का संदेश

मुख्य अतिथि एस.एस. शाह ने विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आदिवासी समाज को अपने अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ अपनी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखना होगा। उन्होंने विशेष रूप से युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों, भाषा, परंपरा और सामाजिक विरासत के प्रति जागरूक होने का संदेश दिया।

विशिष्ट अतिथि विनीत कुमार किंडो, एसडीपीओ किरीबुरू ने कहा कि समाज को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण हथियार है। उन्होंने आदिवासी समाज को नशे की बुराई से दूर रखने तथा युवाओं को शिक्षा से जोड़ने पर जोर दिया।

जिला परिषद अध्यक्ष पश्चिमी सिंहभूम लक्ष्मी सुरेन, सम्मानित अतिथि श्याम सुंदर कमल, डीएम सिविल विभाग, एमआईओएम, विजय कुमार, शाखा प्रबंधक झारखंड ग्रामीण बैंक मेघाहातुबुरू तथा श्यामलाल बोयपाई, एएसआई किरीबुरू थाना का अंगवस्त्र प्रदान कर स्वागत एवं सम्मान किया गया।

‘अधिकार सुरक्षित होंगे, तभी सिर उठाकर जी सकेगा समाज’

आयोजन समिति की संरक्षक पार्वती किड़ो ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1994 में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति का सबसे पहला संरक्षक रहा है। जंगल, नदी, पहाड़, बीज और औषधीय ज्ञान की समृद्ध परंपरा पीढ़ियों से आदिवासी समुदायों के पास रही है।

उन्होंने कहा कि जमीन से बेदखली, शिक्षा और स्वास्थ्य की कमी, भाषाओं के अस्तित्व पर संकट तथा पहचान को कमजोर करने की कोशिशें आज भी बड़ी चुनौतियां हैं। अधिकारों की रक्षा का अर्थ जल, जंगल और जमीन पर अधिकार, शिक्षा-स्वास्थ्य एवं रोजगार में समान अवसर, कानून और नीतियों में भागीदारी तथा भेदभाव और शोषण का अंत सुनिश्चित करना है।

उन्होंने कहा, “जब अधिकार सुरक्षित होते हैं, तभी कोई समुदाय सिर उठाकर सम्मान के साथ जी सकता है।”

‘आदिवासी संस्कृति केवल नृत्य-संगीत नहीं, जीवन जीने की पद्धति’

आयोजन समिति के सचिव गोपी लागुरी ने संस्कृति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आदिवासी संस्कृति केवल नाच-गाना नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण पद्धति है। हो, संथाल, मुंडा और उरांव समाज की अपनी-अपनी भाषा, लोककथाएं, कला, कृषि परंपराएं और पर्व-त्योहार हैं।

उन्होंने कहा कि मागे पर्व, बाहा पर्व, सरहुल और करमा जैसे पर्व आदिवासी समाज को प्रकृति से जोड़ते हैं। पारंपरिक बुनाई, चित्रकला और औषधीय ज्ञान पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण विरासत है।

उन्होंने कहा कि संस्कृति का सम्मान करने का अर्थ उसका मजाक उड़ाना नहीं, बल्कि उससे सीखना है। आदिवासी भाषाओं को विद्यालयों में स्थान मिले, पारंपरिक शिल्प को बाजार मिले और युवा अपनी जड़ों पर गर्व करें—यही संस्कृति का वास्तविक सम्मान होगा।

उन्होंने लोगों से आदिवासी आवाजों को मंच देने, उनके पर्यावरण और समुदाय आधारित जीवन से सीखने, अधिकारों की लड़ाई में सहयोगी बनने तथा देश की विविधता को अपनी ताकत मानने का आह्वान किया।

मुंडाओं, समाजसेवियों और शिक्षकों का हुआ सम्मान

कार्यक्रम में ग्रामीण मुंडा राजेश मुंडा करमपदा और ग्रामीण मुंडा निर्मल सिदू कलायता समेत समाजसेवियों, आंगनबाड़ी सेविकाओं एवं शिक्षकों को सम्मानित किया गया। ओडिशा के क्योंझर जिले से पहुंचे नेशनल हो यूथ मीट के सचिव अर्जुन कुमार सिंकु तथा चंपुआ बस्ती के समाजसेवी रमेश चंपिया को भी अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में नृत्य, गीत-संगीत एवं अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देने वाले कलाकारों को भी मंच पर सम्मानित किया गया। कलाकारों की प्रस्तुतियों के दौरान पूरा सामुदायिक केंद्र तालियों और ढोल-नगाड़ों की गूंज से उत्साहपूर्ण बना रहा।

पारंपरिक नृत्य-संगीत ने बांधा समां

समारोह में विभिन्न आदिवासी समुदायों के कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा में आकर्षक नृत्य और संगीत प्रस्तुत किए। ढोल, नगाड़े और दमा-दुमांग की थाप पर महिला-पुरुषों और युवाओं ने सामूहिक नृत्य कर आदिवासी संस्कृति की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत की। बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया।

सहयोगी संगठनों और प्रशासन का जताया आभार

अंत में संगठन सचिव माधव चन्द्र कोड़ा ने ढोल-नगाड़ों की गूंज और सामूहिक नृत्य के बीच धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले आदिवासी कल्याण केंद्र किरीबुरू-मेघाहातुबुरू-प्रॉस्पेक्टिंग, आदिवासी सरना समिति किरीबुरू-मेघाहातुबुरू, आदिवासी हो समाज युवा महासभा, संथाल समाज, उरांव-खड़िया समाज, ऑल क्रिश्चियन एसोसिएशन, मुखिया एवं अन्य जनप्रतिनिधियों, पुलिस प्रशासन, किरीबुरू-मेघाहातुबुरू लौह अयस्क खदान के प्रबंधन तथा पत्रकार बंधुओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के समापन की घोषणा की।

समारोह में रोया राम चंपिया, बिरसिंह मुंडा, गोपी लागुरी, श्यामचरण टुडू, प्रभात माझी, इलियस चंपिया, शांतियल भेंगरा, बिनोद होनहागा, रंजीत हेंब्रम, आलोक अजय टोपनो, लखन चंपिया, बीरबल गुड़िया, सेरगेया अंगारिया, माधव चन्द्र कोड़ा, एस. होरो, प्रदीप चतर, रमेश लागुरी, श्याम बिरुवा, सनिका गुड़िया, पी.सी. माझी, बुधवा कोनगाड़ी, महेश्वरनाथ लागुरी, लिपि मुंडा, पार्वती किड़ो, प्रफुलित ग्लोरिया टोपनो, सुमन मुंडू, पालो सोय, सूर्यमणि पुरती, सानी हेस्सा, प्रतिमा पुरती, एलिजावेद पुरती, गंगा मार्डी, सबिता हेंब्रम, मिरु मार्डी, अनीता लागुरी, नीलम सुंडी, असाई चांपिया, नीलिमा लागुरी, बिलाची सुंडी, गीता लागुरी, ग्रेस बोदरा, बसंती तिग्गा, उम्बलन हेस्सा, पांडु कोनगाड़ी, धनुर्जय लागुरी, संतोष सिंकु, प्रधान बारी, दुर्गाचरण बारी, एंथोनी सुम्बरूई, मार्शल पुरती, फ्रांसीस मुंडा, रमेश मुर्मू, विश्वनाथ सुंडी समेत बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।

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