रांजाबुरु आंदोलन फिर उग्र, स्थानीय रोजगार को लेकर सेल प्रबंधन के खिलाफ ग्रामीणों का आर-पार का ऐलान
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा के लौह अयस्क क्षेत्र में स्थानीय रोजगार को लेकर एक बार फिर बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया है। रांजाबुरु माइंस में खदान प्रभावित गांवों के मुंडा-मानकी, ग्रामीणों और सारंडा विकास समिति ने सेल प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए साफ चेतावनी दी है कि यदि 20 मई तक पूर्व में मंत्री दीपक बिरुवा और प्रशासन की मौजूदगी में हुए लिखित समझौते को जमीन पर लागू नहीं किया गया, तो 20 मई के बाद किसी भी दिन से गुवा खदान और लौह अयस्क डिस्पैच को पूरी तरह अनिश्चितकालीन बंद कर दिया जाएगा।

गंगदा पंचायत के मुखिया राजू शांडिल ने आक्रामक तेवर में कहा—
“हमारी जमीन, हमारा जंगल और हमारी खदान पर बाहरी लोगों का कब्जा बर्दाश्त नहीं होगा। दो-दो बार आंदोलन और खदान बंदी के बाद भी अगर प्रबंधन नहीं चेता, तो इस बार लड़ाई निर्णायक होगी। 20 मई के बाद गुवा खदान और डिस्पैच पूरी तरह ठप कर दिया जाएगा।”
दो बार बंद हुई खदान, फिर भी नहीं बदली व्यवस्था
समझौते के बावजूद बाहरी मजदूरों की बहाली से ग्रामीणों में आक्रोश
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि रांजाबुरु माइंस को लेकर पूर्व में लंबा आंदोलन चला था, जिसमें खदान का संचालन कई दिनों तक ठप रहा। आंदोलन के बाद मंत्री दीपक बिरुवा, प्रशासन, सेल प्रबंधन और ग्रामीणों के बीच त्रिपक्षीय वार्ता हुई थी, जिसमें 75 प्रतिशत स्थानीय रोजगार देने, खदान प्रभावित 18 गांवों के युवाओं को प्राथमिकता देने और स्थानीय समिति को रोजगार से जुड़े कार्य सौंपने पर लिखित सहमति बनी थी।
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि समझौते के बाद भी जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ। ठेका कंपनी “मां सरला” पर आरोप लगाया गया कि ड्राइवर, खलासी, झंडा दिखाने वाले कर्मी और अन्य मजदूरों की बहाली में बाहरी लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि स्थानीय युवा बेरोजगार घूम रहे हैं।

दीपक बिरुवा के सामने हुआ था ऐतिहासिक समझौता
75 प्रतिशत स्थानीय रोजगार पर बनी थी सहमति
ग्रामीणों ने याद दिलाया कि पूर्व के आंदोलन के दौरान मंत्री दीपक बिरुवा खुद आंदोलन स्थल पहुंचे थे। उनकी मौजूदगी में सेल के मुख्य महाप्रबंधक, प्रशासनिक अधिकारियों और ग्रामीणों के बीच वार्ता हुई थी।
उस समय यह तय हुआ था कि—
* खदान प्रभावित गांवों के युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार मिलेगा
* प्रत्येक गांव से 100-100 बेरोजगारों को काम देने की दिशा में पहल होगी
* स्थानीय समिति को जल छिड़काव जैसे कार्य दिए जाएंगे
* रैक लोडिंग और ट्रांसपोर्टिंग में स्थानीय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी
* प्रदूषण और कारो नदी की सुरक्षा को लेकर कार्ययोजना बनेगी
ग्रामीणों का आरोप है कि समझौते को अब ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

“अब सिर्फ आश्वासन नहीं, सीधा कार्रवाई होगी”
मुखिया राजू शांडिल ने दी खुली चेतावनी
मुखिया राजू शांडिल ने कहा कि क्षेत्र के लोग वर्षों से रोजगार की मांग कर रहे हैं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन देकर आंदोलन खत्म कराने की कोशिश की जाती है।
उन्होंने कहा—
“इस बार गांव के लोग आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। अगर 20 मई की वार्ता में ठोस निर्णय नहीं हुआ और पूर्व समझौता लागू नहीं किया गया, तो खदान, डिस्पैच और ट्रांसपोर्टिंग सबकुछ बंद कर दिया जाएगा। इसकी पूरी जिम्मेदारी सेल प्रबंधन और ठेकेदारों की होगी।”
स्थानीय अधिकार की लड़ाई बना रांजाबुरु आंदोलन
“धूल-प्रदूषण हम झेलें और नौकरी बाहरी करें?”
ग्रामीणों का कहना है कि खदानों का धूल, प्रदूषण और पर्यावरणीय नुकसान स्थानीय लोग झेल रहे हैं, लेकिन रोजगार के अवसर बाहरी लोगों को दिए जा रहे हैं। इससे क्षेत्र में भारी असंतोष फैल गया है।
आंदोलनकारियों ने कहा कि यह सिर्फ नौकरी का सवाल नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकार, सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई है।

20 मई की वार्ता पर टिकी सबकी नजर
शांत होगा आंदोलन या फिर होगा बड़ा विस्फोट?
प्रशासनिक अधिकारियों और मंत्री के पीए द्वारा आंदोलनकारियों को वार्ता का आश्वासन दिए जाने के बाद फिलहाल आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित किया गया है।
लेकिन ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि अब पीछे हटने का सवाल नहीं है। पूरे सारंडा क्षेत्र की नजर अब 20 मई की वार्ता पर टिकी हुई है। यदि इस बार भी समझौता लागू नहीं हुआ, तो रांजाबुरु आंदोलन पहले से कहीं अधिक उग्र रूप ले सकता है।














