सीजीएम पी.एम. शिरपुरकर व स्वाति शिरपुरकर ने फीता काटकर किया शुभारंभ, युवाओं को संस्कृति से जुड़े रहने का दिया संदेश
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
सेल किरीबुरू प्रबंधन की सीएसआर योजना के तहत तथा आदिवासी कल्याण केन्द्र किरीबुरू-मेघाहातुबुरु-प्रोस्पेक्टिंग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय आदिवासी जनजातीय पारंपरिक खेल सह प्रदर्शनी “उनुरूम 3.0” का रविवार को सामुदायिक भवन में भव्य शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि सेल किरीबुरू के सीजीएम पी.एम. शिरपुरकर एवं महिला समिति की अध्यक्ष स्वाति शिरपुरकर ने फीता काटकर किया।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में सीएमओ डॉ. नंदी जेराई, उप महाप्रबंधक रथीन विश्वास, सहायक महाप्रबंधक सी.के. बिस्वाल, सहायक प्रबंधक बी. बासा सहित कई अधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम 18 एवं 19 मई तक चलेगा, जिसमें जनजातीय संस्कृति, पारंपरिक खेल, लोक कला, व्यंजन एवं हस्तशिल्प की अनूठी झलक देखने को मिल रही है।

आदिवासी परंपरा के साथ हुई कार्यक्रम की शुरुआत
कार्यक्रम की शुरुआत सुबह 8 बजे आदिवासी रीति-रिवाज एवं पूजा-पाठ के साथ हुई। इसके बाद दोपहर में मुख्य एवं विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर एवं फीता काटकर कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन किया। उद्घाटन के साथ ही पूरा परिसर मांदर, नगाड़ा और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन से गूंज उठा।

“अपनी जड़ों से जुड़े रहें युवा” — पी.एम. शिरपुरकर
मुख्य अतिथि सीजीएम पी.एम. शिरपुरकर ने अपने संबोधन में कहा कि आदिवासी समाज की कला, संस्कृति, परंपरा और लोक खेल हमारी अमूल्य धरोहर हैं। इन्हें बचाना और आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में युवा अपनी जड़ों और परंपराओं को न भूलें, बल्कि गर्व के साथ अपनी संस्कृति से जुड़े रहें।
उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की पहचान और विरासत को जीवित रखने का अभियान हैं। सेल प्रबंधन भविष्य में भी आदिवासी संस्कृति और प्रतिभाओं को मंच देने के लिए लगातार प्रयास करता रहेगा।

पारंपरिक खेलों ने खींचा लोगों का ध्यान
कार्यक्रम में महिला एवं पुरुष वर्ग के लिए अलग-अलग पारंपरिक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। इनमें मुर्गा पकड़ प्रतियोगिता लोगों के आकर्षण का केंद्र रही। इसके अलावा महिलाओं के लिए किता गलंग (चटाई बनाना), चिटकी-पू-बई (पत्ते से पत्तल बनाना), चाटु दुपिल (मिट्टी की हांडी में पानी डालकर चलना) जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं।

पुरुष वर्ग के लिए बडचोम उईज (घास से रस्सी बुनना), सेंगेल गुरतुई (लकड़ी रगड़कर आग जलाना), तीरंदाजी जैसी पारंपरिक प्रतियोगिताएं रखी गईं। ग्रामीण क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों ने उत्साह के साथ इन खेलों में हिस्सा लिया।

नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने की पहल
आयोजकों ने बताया कि “उनुरूम 3.0” का मुख्य उद्देश्य जनजातीय पारंपरिक खेलों, लोक संस्कृति और कला को संरक्षित करना तथा नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ना है। तेजी से बदलते समय में पारंपरिक खेल और रीति-रिवाज विलुप्त होते जा रहे हैं, ऐसे में इस प्रकार के आयोजन सामाजिक जागरूकता का कार्य कर रहे हैं।

19 मई को लोक नृत्य, प्रदर्शनी और व्यंजन स्टॉल
आयोजन के दूसरे दिन 19 मई को आदिवासी लोक नृत्य, पारंपरिक वस्तुओं की प्रदर्शनी, हस्तशिल्प सामग्री और पारंपरिक व्यंजन स्टॉल का आयोजन किया जाएगा। इसमें क्षेत्र की लोक प्रतिभाएं अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुति देंगी।
आयोजन समिति की रही सक्रिय भागीदारी
इस दौरान सलाहकार समिति के रोया राम चांपिया, संदीप तियु, महेंद्र आल्डा, जूनास केराई, हीरालाल सुण्डी, रमेश लागुरी, दशरथ लागुरी, महेश्वर नाथ लागुरी एवं शुभनाथ हेम्ब्रम उपस्थित रहे।
वहीं अध्यक्ष विवेकानन्द सुण्डी, उपाध्यक्ष सुदाम चरण नायक, सचिव जॉन पूर्ति, नीलम सुण्डी पूर्ति, संयोजक प्रदीप चातर, गोपी लागुरी, अनीता लागुरी तथा सह संयोजक बीरबल गुड़िया, सेरगेया अंगरिया, बलभद्र बिरुली, राजेश मुण्डा एवं माधव चन्द्र कोड़ा कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटे रहे।
खेल एवं सांस्कृतिक प्रबंधन टीम में नीलिमा पूरती, गीता लागुरी, बिलाची सुण्डी, ढेजी रानी नायक, अंजली बिरुवा, पदमिनी लागुरी, श्याम सुन्दर बिरुवा, लालतेंदु हेम्ब्रम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मीडिया एवं सोशल मीडिया प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी विश्वनाथ सुण्डी, आजाद सिंकू एवं अजय बनरा ने संभाली।














