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गुवा में उबाल: भूख हड़ताल तेज, मधु कोड़ा की चेतावनी—20 अप्रैल से चक्का जाम, उत्पादन-डिस्पैच ठप करने की तैयारी

On: April 16, 2026 2:54 PM
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“500 ग्रामीणों को नौकरी नहीं तो खदान बंद” – आंदोलन हुआ निर्णायक मोड़ पर

रिपोर्ट शैलेश सिंह/संदीप गुप्ता।

पश्चिमी सिंहभूम के गुवा क्षेत्र में सेल प्रबंधन के खिलाफ ग्रामीणों का आंदोलन अब विस्फोटक स्थिति में पहुंच चुका है। 12 गांवों के ग्रामीणों द्वारा चलाए जा रहे 72 घंटे के भूख हड़ताल में पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के शामिल होते ही आंदोलन ने नया मोड़ ले लिया है।
मधु कोड़ा ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर स्थानीय लगभग 500 ग्रामीणों को बहाली में प्राथमिकता नहीं दी गई, तो 20 अप्रैल से अनिश्चितकालीन चक्का जाम किया जाएगा। उन्होंने दो टूक कहा—“अब सिर्फ आश्वासन नहीं, अधिकार चाहिए। नहीं तो खदानों का उत्पादन और डिस्पैच पूरी तरह ठप कर दिया जाएगा।”

सेल पर सीधा हमला: “जमीन हमारी, फायदा बाहरी लोगों को”

पूर्व मुख्यमंत्री ने सेल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कंपनी वर्षों से बड़े-बड़े वादे करती रही है, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीणों की जमीन पर खनन तो हो रहा है, लेकिन न नौकरी, न मुआवजा, न विकास—यह सीधा अन्याय है। “भोले-भाले आदिवासियों को गुमराह कर उनकी जमीन ली गई और अब उन्हें उनके ही अधिकार से वंचित किया जा रहा है,” उन्होंने आरोप लगाया।

लाल पानी से तबाह खेती, कारो नदी भी जहर बन रही

आंदोलन का एक बड़ा मुद्दा खदानों से निकलने वाला लाल प्रदूषित पानी भी है। ग्रामीणों का कहना है कि इस पानी ने उनकी खेती को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। खेत अब उपजाऊ नहीं रहे और सालों की मेहनत मिट्टी में मिल गई।
इतना ही नहीं, कारो नदी का पानी भी धीरे-धीरे दूषित हो रहा है। इससे पीने के पानी और सिंचाई दोनों पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि सेल प्रबंधन इस समस्या पर आंख मूंदे बैठा है और प्रभावित किसानों को कोई मुआवजा तक नहीं दिया गया।

रोजगार में भेदभाव: “स्थानीय बेरोजगार, बाहरी कर रहे नौकरी”

बहाली प्रक्रिया को लेकर भी गुस्सा चरम पर है। ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय युवाओं को दरकिनार कर बाहरी लोगों को नौकरी दी जा रही है।
ठेकेदार भी बाहर से मजदूर लाकर काम करा रहे हैं, जिससे इलाके के शिक्षित युवक-युवतियां बेरोजगारी के कारण पलायन को मजबूर हैं। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियां जारी हैं, लेकिन उसका लाभ स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंच रहा।

48 घंटे पार, न प्रशासन आया न प्रबंधन—बढ़ा आक्रोश

मुंडा-मानकी के नेतृत्व में चल रही इस भूख हड़ताल को 48 घंटे से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन अब तक न तो प्रशासन का कोई अधिकारी और न ही सेल प्रबंधन का कोई प्रतिनिधि मौके पर पहुंचा है।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं की गई, जिससे उनकी स्थिति और बिगड़ती जा रही है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि किसी भी आंदोलनकारी की तबीयत बिगड़ती है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सेल प्रबंधन की होगी।

“झरने सूख गए, पानी के लिए तरस रहे लोग” – पर्यावरण पर गंभीर चोट

कासिया पेचा के मुंडा सिंगा सुरीन ने पर्यावरणीय नुकसान का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पहले जंगलों में कई प्राकृतिक झरने हुआ करते थे।
लेकिन खनन के बाद मोरम और मिट्टी के जमाव से वे झरने पूरी तरह बंद हो गए। अब हालात यह हैं कि ग्रामीणों को पीने के पानी के लिए लंबी दूरी तय कर कारो नदी तक जाना पड़ता है, जहां वे चुंआ बनाकर पानी निकालने को मजबूर हैं।

20 अप्रैल से निर्णायक लड़ाई: “अब आर-पार”

ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि अगर उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो 20 अप्रैल से अनिश्चितकालीन चक्का जाम कर दिया जाएगा।
इस दौरान खदानों का उत्पादन, ट्रांसपोर्ट और डिस्पैच पूरी तरह रोकने की रणनीति तैयार कर ली गई है।

औद्योगिक गतिविधियों पर संकट के बादल

अगर यह आंदोलन उग्र होता है, तो इसका सीधा असर गुवा क्षेत्र की औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ेगा। खदानों के ठप होने से न सिर्फ उत्पादन प्रभावित होगा, बल्कि पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर पड़ सकता है।

स्पष्ट संदेश: “हक नहीं मिला तो खदान बंद”

गुवा के ग्रामीण अब पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। मधु कोड़ा के समर्थन के बाद आंदोलन और मजबूत हो गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ नौकरी या मुआवजे की लड़ाई नहीं, बल्कि अस्तित्व और अधिकार की लड़ाई है—और इसे किसी भी कीमत पर जीता जाएगा।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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