दस हजार से अधिक लोगों की ऐतिहासिक भीड़, रात दो बजे तक गूंजता रहा इलाका
रिपोर्ट — शैलेश सिंह
भव्य आयोजन ने बनाया नया रिकॉर्ड
जगन्नाथपुर प्रखंड अंतर्गत जैंतगढ़ में चौथे अजीमुशान दीनी जलसे का भव्य आयोजन किया गया, जिसने भीड़ और व्यवस्था के मामले में नया इतिहास रच दिया। जमीयत अहले हदीस जैंतगढ़ की निगरानी में नव युवक संघ जैंतगढ़ द्वारा आयोजित इस जलसे में दस हजार से अधिक लोगों की उपस्थिति दर्ज की गई। यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि सामाजिक एकता और अनुशासन का भी बेहतरीन उदाहरण बना।

शाम से देर रात तक चला दीनी कार्यक्रम
जलसे की शुरुआत शाम करीब सात बजे हुई, जो देर रात लगभग दो बजे तक लगातार चलता रहा। ठंडी रात और लंबा कार्यक्रम होने के बावजूद लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था। आसपास के गांवों और दूरदराज क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग इस जलसे में शरीक होने पहुंचे।
तिलावत-ए-कुरान से हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम की शुरुआत तिलावत-ए-कुरान से की गई। हाफिज जानिसार सरफराज ने अपनी रूहानी आवाज में कलाम-ए-पाक की तिलावत कर माहौल को पूरी तरह आध्यात्मिक बना दिया। इसके बाद हाफिज मुदस्सर ने नात-ए-पाक पेश कर उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया।

मौलाना असगर अली इमाम मेंहदी सल्फी मदनी की अध्यक्षता
इस ऐतिहासिक जलसे की अध्यक्षता मरकजी जमीयत अहले हदीस के अमीर हजरत मौलाना असगर अली इमाम मेंहदी सल्फी मदनी ने की। वहीं कार्यक्रम का सफल संचालन जामा मस्जिद जैंतगढ़ के इमाम हजरत मौलाना रियाज़ सल्फी ने किया। दोनों ही विद्वानों के मार्गदर्शन में कार्यक्रम अत्यंत अनुशासित और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।
जन्नत की हकीकत पर भावपूर्ण बयान
मुंबई से पधारे मशहूर मुबालिग हजरत मौलाना मुस्तफा अजमल मदनी सल्फी ने “जन्नत बुला रही है” विषय पर विस्तार से संबोधित किया। उन्होंने कहा कि हर इंसान को जन्नत का तलबगार होना चाहिए, क्योंकि जन्नत ही असली और हमेशा की जिंदगी है।
उन्होंने बताया कि जन्नत में न कोई बीमारी होगी और न ही मौत का डर, बल्कि वहां इंसान को हर वह चीज मिलेगी जिसकी वह ख्वाहिश करेगा। उनके इस बयान ने लोगों को दीन की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया।

अकीदा की मजबूती पर जोर
विजयबड़ा से आए मुबालिग हजरत मौलाना अबू हुरैरा मदनी सल्फी ने “इसलाह समाज में अकीदा का किरदार” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि दीन-ए-इस्लाम की नींव तौहीद पर टिकी है और तौहीद का सीधा संबंध अकीदा से है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक इंसान का अकीदा सही नहीं होगा, तब तक वह सच्चा मोमिन नहीं बन सकता और जन्नत हासिल करना भी संभव नहीं है। उनके विचारों ने श्रोताओं को आत्ममंथन करने के लिए मजबूर किया।
गुनाहों से तौबा करने का संदेश
जैंतगढ़ के उभरते हुए युवा आलिम हाफिज हंजला रफी ने अपने संबोधन में कहा कि इंसान अक्सर छोटी-छोटी गलतियां करता रहता है, लेकिन वही गलतियां धीरे-धीरे बड़े गुनाह का रूप ले लेती हैं।
उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने गुनाहों से तौबा करें और नेक रास्ते पर चलें, क्योंकि हर गुनाह इंसान को नुकसान और बुराई की तरफ ले जाता है।

सहाबा के मुकाम पर रोशनी
कर्नाटक से आए मुबालिग मौलाना मोहम्मद याकूब जामई ने “मक़ाम-ए-सहाबा” पर अपने विचार रखे। उन्होंने हदीस का हवाला देते हुए बताया कि इस्लाम में सबसे ऊंचा दर्जा सहाबा का है, उसके बाद ताबईन और फिर तबे-ताबईन का स्थान आता है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि वे सहाबा के जीवन से सीख लें और उसी मार्ग पर चलने का प्रयास करें।
उत्कृष्ट व्यवस्था और अनुशासन का उदाहरण
इस विशाल जलसे में शामिल हजारों लोगों के लिए भोजन, चाय, नाश्ता, शरबत और लस्सी की बेहतरीन व्यवस्था की गई थी। यह व्यवस्था नव युवक संघ जैंतगढ़ के सौजन्य से की गई, जिसकी सभी ने सराहना की।
कार्यक्रम को सफल बनाने में नव युवक संघ के लगभग 500 कार्यकर्ताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई। उनकी मेहनत और समर्पण के कारण इतना बड़ा आयोजन बिना किसी अव्यवस्था के सफलतापूर्वक संपन्न हो सका।
धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ समापन
जलसे का समापन जमीयत अहले हदीस जैंतगढ़ के सदर कमाल अहमद के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने सभी उलेमा, मेहमानों और उपस्थित जनसमूह का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन समाज में धार्मिक जागरूकता और एकता को मजबूत करते हैं।
धार्मिक जागरूकता और एकता का संदेश
जैंतगढ़ का यह अजीमुशान जलसा केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज में नैतिकता, एकता और जागरूकता फैलाने का सशक्त माध्यम साबित हुआ।
इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि यदि समाज संगठित होकर कार्य करे, तो बड़े से बड़ा कार्यक्रम भी सफलतापूर्वक संपन्न किया जा सकता है।














