184 परिवारों को मिला ठिकाना, 500 अब भी अनिश्चितता में—प्रशासन से न्याय की गुहार
रिपोर्ट शैलेश/संदीप
गुवा क्षेत्र में खदान विस्तार की रफ्तार तेज है, लेकिन इसके साथ ही विस्थापन की चिंता भी गहराती जा रही है। विकास के नाम पर गांवों को उजाड़ने की तैयारी हो रही है, पर सवाल यह है कि क्या उन लोगों के लिए कोई ठोस योजना है जिनकी जमीन, घर और जीवन इससे प्रभावित हो रहे हैं?
इन्हीं सवालों और समस्याओं को लेकर गुवा क्षेत्र के विस्थापितों ने उपायुक्त मनीष कुमार से मुलाकात कर अपनी पीड़ा सामने रखी। मुलाकात के दौरान विस्थापितों ने साफ कहा कि बिना समुचित पुनर्वास के किसी भी तरह का विस्थापन उनके लिए “जीवन संकट” बन जाएगा।

“उपायुक्त से गुहार: ‘पहले पुनर्वास, फिर विस्थापन’”
विस्थापितों ने उपायुक्त मनीष कुमार के समक्ष अपनी समस्याएं विस्तार से रखीं। उनकी बातों को सुनने के बाद उपायुक्त ने एडीसी प्रवीण केरकेट्टा को निर्देश दिया कि वे सभी मांगों पर गंभीरता से विचार कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करें।
इसके बाद विस्थापितों ने एडीसी को लिखित मांग पत्र सौंपा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक सभी प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक विस्थापन की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए।
“खदान विस्तार की मार: कई गांवों पर संकट”
जानकारी के अनुसार, सेल (SAIL) गुवा द्वारा नोवामुंडी प्रखंड अंतर्गत खदान के विस्तार की योजना पर काम किया जा रहा है। इसके तहत ग्राम रामनगर, डीपासाई, नानक नगर, पुट साइडिंग और जाटा हाटिंग (गुवा पूर्वी-पश्चिमी) के निवासियों को अन्यत्र स्थानांतरित करने का प्रस्ताव है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन गांवों के सभी लोगों को न्याय मिल रहा है?
“184 को पुनर्वास, 500 अब भी ‘सूची से बाहर’”
विस्थापितों का आरोप है कि अब तक केवल 184 परिवारों के लिए ही पुनर्वास की व्यवस्था की गई है, जबकि लगभग 500 परिवार अब भी इस प्रक्रिया से बाहर हैं।
यह आंकड़ा अपने आप में गंभीर सवाल खड़ा करता है—क्या विकास की कीमत पर सैकड़ों परिवारों को अनदेखा किया जा रहा है?
विस्थापितों ने प्रशासन को छूटे हुए परिवारों की सूची भी सौंपी है और मांग की है कि सभी प्रभावित परिवारों का पुनः सर्वे कर उन्हें भी सरकारी नियमों के तहत पुनर्वास का लाभ दिया जाए।
“बिना सुविधा के नया ठिकाना, कैसे जिएंगे लोग?”
विस्थापित परिवारों ने साफ कहा कि सिर्फ जमीन देकर या मकान बनाकर जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। नई जगह पर मूलभूत सुविधाएं नहीं होंगी, तो जीवन यापन असंभव हो जाएगा।
इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कई जरूरी मांगें प्रशासन के सामने रखीं—
* रहने के लिए एक कमरा, हॉल, किचन, शौचालय और बाथरूम युक्त पक्का आवास
* सामुदायिक भवन की व्यवस्था
* नियमित साफ-सफाई के लिए कर्मियों की नियुक्ति
* बिजली और पानी की सुविधा (जिसका वे शुल्क देने को तैयार हैं)
* बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल बस सेवा
* पूजा-पाठ के लिए मंदिर की व्यवस्था
छूटे हुए परिवारों के लिए पुनः सर्वे और आवास उपलब्ध कराना
इन मांगों से साफ है कि विस्थापित केवल “छत” नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन की मांग कर रहे हैं।
“विकास या विस्थापन का दर्द?”
गुवा में खदान विस्तार को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या विकास का मतलब केवल संसाधनों का दोहन है, या फिर उसमें इंसानों के जीवन की भी कोई कीमत है?
विस्थापितों का कहना है कि वे विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन बिना पुनर्वास के उन्हें उजाड़ना अन्याय है। उनका दर्द यह है कि जिन जमीनों ने उन्हें पीढ़ियों तक जीवन दिया, आज वही जमीन उनके हाथ से छिन रही है।
“प्रशासन की परीक्षा: क्या मिलेगा न्याय?”
अब पूरा मामला प्रशासन के पाले में है। उपायुक्त द्वारा दिए गए निर्देश के बाद यह देखना अहम होगा कि एडीसी और संबंधित विभाग इस पर कितनी तेजी और गंभीरता से कार्रवाई करते हैं।
अगर समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो यह मामला बड़ा आंदोलन का रूप ले सकता है।
“नामों के साथ उठी आवाज”
मांग पत्र सौंपने वालों में विनय कुमार प्रसाद, राजा बिहारी, धर्मेंद्र रजक और रोहित कुमार सिंह शामिल थे। इन प्रतिनिधियों ने प्रशासन से स्पष्ट कहा कि यह केवल कुछ लोगों की नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की लड़ाई है।
‘पहले बसाओ, फिर उजाड़ो’
गुवा के विस्थापितों की मांग बिल्कुल स्पष्ट है—
“पहले हमें बसाओ, फिर हमारी जमीन लो।”
यह मांग सिर्फ अधिकार की नहीं, बल्कि इंसानियत की भी है। अब यह प्रशासन और सेल प्रबंधन पर निर्भर करता है कि वे इस मुद्दे को संवेदनशीलता से लेते हैं या फिर इसे एक और फाइल बनाकर छोड़ देते हैं।
“क्या विकास की दौड़ में छूट जाएंगे ये 500 परिवार?”
यह सवाल अब गुवा ही नहीं, पूरे क्षेत्र में गूंज रहा है।
अगर जवाब नहीं मिला, तो यह आवाज जल्द ही आंदोलन में बदल सकती है।













