नासरीगंज से बिक्रमगंज तक सड़क नहीं, ‘भ्रष्टाचार का कॉरिडोर’—एम्बुलेंस में दम तोड़ती उम्मीदें, जनता बेहाल
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी जी, आप राज्य के “न्यू और युवा” चेहरे के रूप में सामने आए हैं। जनता ने आपसे उम्मीदें भी नई ही बांधी हैं—एक ऐसा बिहार जो पुराने ढर्रे से बाहर निकले, जहां सिस्टम जनता के लिए काम करे, न कि जनता सिस्टम की शिकार बने।
लेकिन 4 मई की शाम, झारखंड से बिहार में प्रवेश करते ही जो तस्वीर सामने आई, उसने इन उम्मीदों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। यह सिर्फ एक सड़क जाम की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सड़े हुए सिस्टम की झलक है जिसमें भ्रष्टाचार “हीमोग्लोबिन” की तरह प्रशासन की नसों में दौड़ रहा है।

“सोन नदी पुल के बाद शुरू होता है ‘भ्रष्टाचार का खेल’”
4 मई की शाम करीब 7:40 बजे जैसे ही दाउदनगर-नासरीगंज के बीच सोन नदी पुल पार कर मुख्य सड़क पर पहुंचा, पहला झटका वहीं मिल गया। नासरीगंज मोड़ पर एक पुलिस वाहन खड़ी थी—लेकिन सवाल यह है कि वह वहां व्यवस्था संभालने के लिए थी या बालू लदे ट्रकों के “इंतजार” में?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक “रूटीन सिस्टम” है। पुलिस की मौजूदगी यहां कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहीं, बल्कि “मैनेजमेंट” के लिए ज्यादा दिखती है।
“सड़क नहीं, ट्रकों का अखाड़ा: 2-3 लेन में दौड़ते मौत के पहिए”
नासरीगंज से बिक्रमगंज की ओर बढ़ते ही जो दृश्य सामने आया, वह किसी अराजक राज्य की तस्वीर से कम नहीं था। सैकड़ों बालू लदे ट्रक सड़क पर इस तरह फैले हुए थे मानो कोई रेस चल रही हो।
एक कतार में चलने के बजाय ये ट्रक 2-3 लेन बनाकर एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे थे। नतीजा—सामने से आने वाले वाहनों के लिए रास्ता पूरी तरह बंद।
यहां सड़क पर नियम नहीं, बल्कि “जिसकी ताकत, उसकी सड़क” का कानून चलता दिखा।
“एम्बुलेंस में तड़पते मरीज: सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी”
इस जाम में सबसे दर्दनाक दृश्य था—एम्बुलेंस में फंसे मरीज।
सोचिए, एक तरफ ट्रकों की अंतहीन कतार और दूसरी तरफ एम्बुलेंस में जिंदगी और मौत से जूझता इंसान… लेकिन रास्ता नहीं।
वृद्ध, महिलाएं, छोटे बच्चे—सभी इस जाम में घंटों फंसे रहे। किसी को अस्पताल पहुंचना था, किसी को घर, लेकिन सबके रास्ते बंद।
क्या यही है वह “सिस्टम” जिस पर बिहार की जनता भरोसा करे?
“नो एंट्री का मज़ाक: नियम सिर्फ कागज पर”
स्थानीय दुकानदारों और आम लोगों से बात करने पर जो जानकारी मिली, वह और भी चौंकाने वाली थी।
बताया गया कि बालू लदे ट्रकों को इस मार्ग पर चलने की अनुमति रात 9 बजे के बाद है, क्योंकि बिक्रमगंज में नो एंट्री उसी समय खुलती है।
लेकिन हकीकत यह है कि ट्रक शाम 8 बजे से ही सड़क पर उतर आते हैं और पूरे रास्ते को जाम कर देते हैं।
यानी नियम सिर्फ दिखावे के लिए हैं, असल में सब कुछ “सेटिंग” से चलता है।
“बिक्रमगंज बना जाम का ‘हॉटस्पॉट’”
बिक्रमगंज पहुंचते-पहुंचते स्थिति और भी भयावह हो जाती है। मुख्य चौक रात के 12 बजे तक जाम में जकड़ा रहता है।
हालत इतनी खराब कि मोटरसाइकिल निकालना भी मुश्किल हो जाता है।
बिक्रमगंज थाना चौक—जहां से कानून व्यवस्था की निगरानी होनी चाहिए—वहीं सबसे ज्यादा अराजकता देखने को मिलती है।
“पुलिस की भूमिका पर सवाल: ‘वसूली’ का खुला खेल?”
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल पुलिस और प्रशासन की भूमिका को लेकर उठता है।
स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि बालू लदे ट्रकों से रातभर “वसूली” होती है। यही कारण है कि नियमों की धज्जियां उड़ती हैं और कोई कार्रवाई नहीं होती।
लोग यहां तक कहते हैं कि यह वसूली सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका हिस्सा ऊपर तक जाता है।
अगर यह सच है, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि “सिस्टम की मिलीभगत” है।
“जनता पूछ रही—समाधान कौन करेगा?”
सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर पुलिस ही इस खेल में शामिल है, अगर प्रशासन ही आंखें मूंदे बैठा है, तो फिर इस समस्या का समाधान कौन करेगा?
आम जनता खुद को पूरी तरह असहाय महसूस कर रही है।
हर दिन वही जाम, वही परेशानी, वही डर—और कोई सुनने वाला नहीं।

“सम्राट चौधरी जी, अब फैसला आपका”
मुख्यमंत्री जी, आपसे उम्मीदें इसलिए ज्यादा हैं क्योंकि आपको “नया चेहरा” कहा गया।
लेकिन अगर हालात ऐसे ही रहे, अगर सिस्टम में वही पुरानी बीमारी बनी रही, तो फिर फर्क क्या रह जाएगा आप और पहले के मुख्यमंत्रियों में?
यह सिर्फ एक सड़क या एक जिले की समस्या नहीं है—यह पूरे सिस्टम की सच्चाई है।
“भ्रष्टाचार का ‘हीमोग्लोबिन’ निकालना होगा”
आज जरूरत है सख्त फैसलों की।
* बालू माफियाओं पर कड़ी कार्रवाई
* पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही तय
* नो एंट्री नियमों का सख्ती से पालन
* जाम की समस्या का स्थायी समाधान
जब तक सिस्टम से भ्रष्टाचार का “हीमोग्लोबिन” नहीं निकलेगा, तब तक हालात नहीं बदलेंगे।
“जाम में फंसी सिर्फ सड़क नहीं, बिहार की साख भी”
यह जाम सिर्फ ट्रैफिक जाम नहीं है—यह बिहार की छवि पर लगा धब्बा है।
जब एम्बुलेंस में मरीज तड़पता है, जब बच्चे और महिलाएं घंटों सड़क पर फंसे रहते हैं, तब सवाल सिर्फ प्रशासन पर नहीं, पूरी सरकार पर उठता है।
“अब भी वक्त है—वरना जनता जवाब देगी”
सम्राट चौधरी जी, यह आपके लिए चेतावनी भी है और अवसर भी।
अगर आपने इस सिस्टम को ठीक कर दिया, तो आप सच में “नए बिहार” के निर्माता बन सकते हैं।
लेकिन अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा, तो जनता यह कहने में देर नहीं लगाएगी—
“चेहरा बदला है, सिस्टम नहीं।”













