“हे प्रभु आनंदमय…” से उठती वह चीख, जो लोकतंत्र के खून से सने रास्तों को देख रही है
रिपोर्ट शैलेश सिंह
व्यंग्य का छोटा कॉलम : सत्ता और खून की राजनीति पर कटाक्ष
“हे प्रभु आनंदमय, मुझको यही उपहार दो,
मैं सिर्फ जीवित रहूं, तुम और सबको मार दो।
भक्त हूं मैं आपका, अर्जी प्रभु ये मेरे लीजिए,
और जितनी भी अर्जियां है सबकी, फाड़ करके फेंकिए।
एक झण्डा, चार गुंडा,
और हत्या कर भागने के लिए एक मोटर कार दो…
हे प्रभु आनंदमय, मुझको यही उपहार दो…!”
यह कविता नहीं, सत्ता की उस भयावह मानसिकता पर व्यंग्य है जहां विरोधियों को खत्म करना ही राजनीति का हथियार बना दिया जाता है।
यह सिर्फ कविता की पंक्तियां नहीं हैं, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता पर करारा व्यंग्य हैं, जहां सत्ता की कुर्सी बचाने के लिए लोकतंत्र, विरोध और इंसानी जान तक को कुचल दिया जाता है। पश्चिम बंगाल की राजनीति पर वर्षों से लगते रहे “हिंसा के दाग” एक बार फिर गहरे हो गए हैं। 6 मई 2026 की रात भाजपा नेता Suvendu Adhikari के करीबी सहयोगी चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या ने पूरे बंगाल को झकझोर दिया।
यह घटना ऐसे समय हुई, जब बंगाल चुनाव के बाद राजनीतिक तनाव चरम पर है। भाजपा ने इसे “सुनियोजित राजनीतिक हत्या” बताया, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने आरोपों से इनकार करते हुए जांच की मांग की है।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर बंगाल कब तक राजनीतिक हिंसा की प्रयोगशाला बना रहेगा?

लोकतंत्र या डर का साम्राज्य?
चंद्रनाथ रथ कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं थे। वे पूर्व वायुसेना अधिकारी थे और लंबे समय से शुभेंदु अधिकारी के साथ काम कर रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक बाइक सवार हमलावरों ने उनकी गाड़ी को घेरकर बेहद करीब से गोलियां चलाईं।
घटना का तरीका यह बताने के लिए काफी है कि हमलावर सिर्फ हत्या नहीं करना चाहते थे, बल्कि एक संदेश देना चाहते थे—“जो विरोध करेगा, उसका यही अंजाम होगा।”
यही वह मानसिकता है, जिस पर कविता का व्यंग्य सीधा वार करता है—
“एक झण्डा, चार गुंडा, और हत्या कर भागने के लिए एक मोटर कार दो…”
राजनीति जब विचारों की जगह भय पैदा करने लगे, तब लोकतंत्र केवल चुनावी आंकड़ों का खेल बनकर रह जाता है।
बंगाल में हिंसा का पुराना इतिहास
पश्चिम बंगाल लंबे समय से राजनीतिक हिंसा का गवाह रहा है। चाहे वामपंथी दौर हो, नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन हो या चुनाव बाद की हिंसा—हर दौर में राजनीतिक विरोधियों की हत्या, आगजनी और हमलों के आरोप लगते रहे हैं।
2021 के चुनाव बाद भी भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमलों और हत्याओं के आरोप लगे थे। अब 2026 में फिर वही तस्वीर सामने आने लगी है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक सवाल उठ रहे हैं कि क्या बंगाल में सत्ता परिवर्तन का मतलब हमेशा खून-खराबा ही रहेगा?

महिलाओं तक नहीं रुकी हिंसा की छाया
बंगाल की राजनीति में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जहां महिलाओं तक को नहीं बख्शा गया। पंचायत चुनावों से लेकर स्थानीय राजनीतिक संघर्षों तक, महिला कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के साथ हिंसा, हत्या, धमकी और उत्पीड़न की खबरें लगातार सामने आती रही हैं।
विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि राज्य में कानून व्यवस्था राजनीतिक रंग देखकर काम करती है। हालांकि सत्तारूढ़ पक्ष इन आरोपों को राजनीतिक प्रचार बताता रहा है।
लेकिन जब लगातार हत्याएं, गोलीबारी और राजनीतिक हमले सामने आते हैं, तब आम जनता का भरोसा कमजोर होने लगता है।
“प्री-प्लांड मर्डर” का आरोप
Suvendu Adhikari ने अपने सहयोगी की हत्या को “प्री-प्लांड मर्डर” बताया है। उनका दावा है कि हमलावरों ने कई दिनों तक रेकी की थी।
अगर यह सच है, तो यह सिर्फ हत्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र को खुली चुनौती है।
राजनीति में विचारों की लड़ाई हो सकती है, आरोप-प्रत्यारोप हो सकते हैं, लेकिन बंदूक से जवाब देना लोकतांत्रिक व्यवस्था की हत्या है।

जनता पूछ रही है – आखिर कब रुकेगा यह खून?
बंगाल की जनता अब थक चुकी है।
* हर चुनाव के बाद लाशें…
* हर विरोध के बाद हमला…
* हर राजनीतिक रैली के बाद तनाव…
क्या जनता ने सरकारें इसलिए चुनी हैं?
किसी भी लोकतांत्रिक राज्य की सबसे बड़ी ताकत होती है—कानून का निष्पक्ष राज। लेकिन जब लोगों को लगने लगे कि राजनीतिक पहचान उनकी सुरक्षा तय करेगी, तब लोकतंत्र कमजोर हो जाता है।
व्यंग्य की असली चोट
इस कविता की सबसे बड़ी ताकत इसका व्यंग्य है। यह किसी ईश्वर से प्रार्थना नहीं, बल्कि सत्ता की उस भूख पर कटाक्ष है, जहां विरोधियों को खत्म करना ही राजनीति मान लिया जाता है।
“भक्त हूं मैं आपका, अर्जी प्रभु ये मेरे लीजिए,
और जितनी भी अर्जियां है सबकी, फाड़ करके फेंकिए…”
यानी सत्ता सिर्फ अपनी सुनना चाहती है। बाकी सबकी आवाज दबा दी जाए।
आज बंगाल की राजनीति पर यही आरोप लग रहे हैं।
लोकतंत्र को बचाने की जरूरत
लेकिन यहां सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता।
कानून हाथ में लेने की मानसिकता लोकतंत्र को और कमजोर करती है।
जरूरत है कि—
* दोषियों की निष्पक्ष जांच हो
* राजनीतिक संरक्षण खत्म हो
* सभी दल हिंसा के खिलाफ एकजुट हों
* जनता भय के खिलाफ लोकतांत्रिक आवाज उठाए
क्रांति का मतलब अराजकता नहीं होता। असली क्रांति वह है, जहां जनता संविधान और कानून के जरिए अन्याय को चुनौती दे।
बंगाल को बंदूक नहीं, बदलाव चाहिए
West Bengal कभी विचार, साहित्य और क्रांति की धरती माना जाता था।
Rabindranath Tagore, Subhas Chandra Bose और Syama Prasad Mukherjee की धरती आज अगर राजनीतिक हिंसा की खबरों से पहचानी जाए, तो यह पूरे देश के लिए चिंता की बात है।
आज जरूरत है कि बंगाल फिर से बहस, विचार और लोकतांत्रिक संघर्ष की संस्कृति की ओर लौटे।

अंतिम सवाल
चंद्रनाथ रथ की हत्या की जांच होगी। आरोप लगेंगे। राजनीति भी होगी।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा—
क्या बंगाल में लोकतंत्र बंदूक की नली से चलेगा?
या जनता भय की राजनीति को हमेशा के लिए नकार देगी?
क्योंकि लोकतंत्र में विरोधी को हराया जाता है, मिटाया नहीं जाता।













