एक-एक बस में 80-80 बच्चों का सफर, क्षमता पूरी होने पर दर्जनों छात्र रोज लौट रहे घर; अतिरिक्त बस और स्कूलों के उत्क्रमण की मांग को लेकर सांसद, विधायक व सेल प्रबंधन से तत्काल हस्तक्षेप की अपील।
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
नक्सल प्रभावित सारंडा के करमपदा, थोलकोबाद समेत आसपास के गांवों के स्कूली बच्चों की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सड़क पर उतर आई। लंबे समय से चली आ रही स्कूल बस की समस्या का समाधान नहीं होने से गुरुवार (30 जुलाई) को ग्रामीणों और स्कूली बच्चों ने दूसरी बार करमपदा में सेल (SAIL) किरीबुरू प्रबंधन की स्कूल बस को रोककर विरोध-प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जब तक बच्चों के लिए पर्याप्त परिवहन और स्थानीय स्तर पर उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
ग्रामीणों ने कहा कि बार-बार मांग उठाने के बावजूद अब तक न तो सेल प्रबंधन और न ही प्रशासन ने कोई ठोस कदम उठाया है। इसका खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है, जो रोजाना स्कूल जाने से वंचित हो रहे हैं।

एक बस में 80-80 बच्चे, कैसे होगी सुरक्षित यात्रा?
ग्रामीण देवधारी कुमार ने बताया कि वर्तमान में सेल प्रबंधन की ओर से केवल दो स्कूल बसें संचालित की जा रही हैं, जबकि इन बसों से करमपदा, थोलकोबाद समेत लगभग 15 गांवों के बच्चे किरीबुरू के विभिन्न स्कूलों में पढ़ने जाते हैं।
उन्होंने कहा कि एक-एक बस में लगभग 80-80 बच्चे सफर कर रहे हैं। बसों की क्षमता पूरी हो जाने के बाद चालक सुरक्षा कारणों से अतिरिक्त बच्चों को बस में नहीं बैठाता। ऐसे में प्रतिदिन कई छात्र-छात्राएं स्कूल नहीं पहुंच पाते और उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
बच्चों का भविष्य अधर में
ग्रामीणों का कहना है कि सारंडा के अधिकांश गांवों में उच्च विद्यालय की सुविधा नहीं है। मजबूरी में बच्चों को 25 से 40 किलोमीटर दूर किरीबुरू जाकर पढ़ाई करनी पड़ती है। रोजाना लंबी दूरी तय करने में बच्चों का काफी समय और ऊर्जा खर्च होती है। बस में जगह नहीं मिलने पर कई बच्चों को घर लौटना पड़ता है, जिससे उनकी शिक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
तीन प्रमुख मांगें रखीं
प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों और अभिभावकों ने सरकार एवं सेल प्रबंधन के समक्ष तीन प्रमुख मांगें रखीं—
* सेल, किरीबुरू प्रबंधन सीएसआर योजना के तहत तत्काल एक अतिरिक्त स्कूल बस उपलब्ध कराए।
* करमपदा स्कूल को 10वीं कक्षा तक उत्क्रमित किया जाए।
* थोलकोबाद स्कूल को 8वीं कक्षा तक उत्क्रमित किया जाए, ताकि बच्चों को उच्च कक्षाओं की पढ़ाई के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़े।

सांसद और विधायक से भी लगाई गुहार
ग्रामीणों ने क्षेत्र के सांसद और विधायक से भी इस गंभीर समस्या में हस्तक्षेप करने की अपील की। उनका कहना है कि शिक्षा बच्चों का मौलिक अधिकार है और केवल बस की कमी या स्कूलों के उत्क्रमण में देरी के कारण उनका भविष्य अंधकारमय नहीं होना चाहिए।
ग्रामीणों ने कहा कि यदि समय रहते समस्या का समाधान नहीं किया गया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। उनका कहना है कि सारंडा जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र के विकास की सबसे मजबूत नींव शिक्षा है, इसलिए सरकार, जनप्रतिनिधियों और सेल प्रबंधन को इस मुद्दे को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर जल्द स्थायी समाधान निकालना चाहिए।











