जीवनदायिनी नदी के निर्मल पानी में घुला काला कचरा, स्पंज आयरन उद्योगों पर उठे गंभीर सवाल
रिपोर्ट शैलेश सिंह
सारंडा। झारखंड और ओड़िशा के सीमावर्ती इलाकों में लाखों लोगों की जीवनरेखा मानी जाने वाली कारो नदी अब सवालों के घेरे में है। कभी निर्मल और स्वच्छ नजर आने वाली नदी का पानी काला पड़ने की तस्वीरें और शिकायतें सामने आने के बाद इलाके के लोगों में भारी आक्रोश है। लोगों का सवाल सीधा है—आखिर किसने जीवन देने वाली कारो नदी के पानी में काला कचरा डालकर इसे जहरीला बनाने की कोशिश की?

नदी नहीं, लाखों जिंदगियों की प्यास है कारो
कारो नदी का महत्व सिर्फ एक जलधारा तक सीमित नहीं है। किरीबुरू, गुवा, बोलानी, चिड़िया, बड़ाजामदा, बाराईबुरू, रोआम से लेकर मनोहरपुर और आसपास के दर्जनों ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की जिंदगी इस नदी और इससे जुड़ी जलधाराओं से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ी है।
कहीं यही पानी खेतों की प्यास बुझाता है तो कहीं घरेलू जरूरतों को पूरा करता है। नदी के पानी से खेती होती है, मछलियां पलती हैं और पशु-पक्षियों समेत जंगल के अनेक जीव-जंतुओं का जीवन चलता है।
साफ पानी अचानक काला कैसे हुआ?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि कारो नदी के पानी में आखिर ऐसा कौन-सा पदार्थ पहुंचा, जिससे इसका रंग काला हो गया?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि ओड़िशा क्षेत्र में नदी के किनारे संचालित कुछ स्पंज आयरन एवं अन्य औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला कोयला मिश्रित कचरा और औद्योगिक अवशेष नदी में पहुंचने की आशंका है।
लोगों का कहना है कि यदि यह आरोप सही है तो यह महज नदी प्रदूषण का मामला नहीं, बल्कि हजारों गांवों और लाखों लोगों के जीवन से खिलवाड़ का गंभीर विषय है।

उद्योगों का विकास या नदी की बर्बादी?
स्थानीय लोगों का कहना है कि उद्योग स्थापित होना रोजगार और आर्थिक विकास के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन इसकी कीमत किसी नदी और उसके आसपास रहने वाली आबादी को नहीं चुकानी चाहिए।
यदि किसी औद्योगिक इकाई से निकलने वाला कचरा नदी में जा रहा है तो सवाल उठता है कि प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था कहां है? निगरानी कौन कर रहा है? और जिम्मेदार अधिकारियों की नजर नदी की हालत पर क्यों नहीं पड़ी?
काले पानी से खेतों और मछलियों पर भी संकट
कारो नदी के पानी का उपयोग नदी किनारे रहने वाले लोग खेती और अन्य आजीविका के लिए करते हैं। पानी के प्रदूषित होने से इसका असर कृषि भूमि, फसलों और जलीय जीवों पर पड़ने की आशंका है।
नदी में रहने वाली मछलियां और दूसरे जलीय जीव यदि लगातार प्रदूषित पानी के संपर्क में रहेंगे तो इसका असर पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।
जंगल के जानवरों का भी यही सहारा
सारंडा का विशाल वन क्षेत्र अपने समृद्ध वन्यजीवन के लिए जाना जाता है। जंगल में विचरण करने वाले जंगली जानवरों के लिए प्राकृतिक जलस्रोत बेहद महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे में यदि कारो नदी में औद्योगिक अपशिष्ट का प्रवेश लगातार जारी है तो यह केवल मानव आबादी ही नहीं, बल्कि जंगल और वन्यजीवन के लिए भी गंभीर खतरे की घंटी है।
प्रशासन करे वैज्ञानिक जांच, सामने आए असली गुनहगार
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि कारो नदी के काले हुए पानी का तत्काल नमूना लेकर अधिकृत प्रयोगशाला में जांच कराई जाए। नदी में मिले काले पदार्थ की भी वैज्ञानिक जांच हो तथा यह पता लगाया जाए कि वह पदार्थ आखिर कहां से आया।
नदी के किनारे संचालित औद्योगिक इकाइयों के अपशिष्ट निस्तारण की भी सघन जांच हो। यदि किसी कंपनी की लापरवाही या नियमों के उल्लंघन से नदी प्रदूषित होने की पुष्टि होती है तो उसके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।

कारो नदी को नाला बनने से रोकना होगा
लोगों का कहना है कि आज अगर कारो नदी के पानी का रंग काला हुआ है और इसे नजरअंदाज कर दिया गया तो कल यही प्रदूषण और आगे तक फैल सकता है। फिर सवाल सिर्फ नदी के पानी का नहीं रहेगा, बल्कि खेत, फसल, मछली, पशु, जंगल और इंसानी जीवन—सब इसकी चपेट में आ सकते हैं।
ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि नदी को प्रदूषित करने वालों की पहचान कर कार्रवाई नहीं की गई और प्रदूषण पर तत्काल रोक नहीं लगी तो आम जनता आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होगी।
कारो नदी किसी उद्योग की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि हजारों गांवों और लाखों लोगों की साझा जीवनरेखा है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस काली होती नदी को बचाने के लिए कब जागता है और नदी में जहर घोलने वालों तक जांच का हाथ कब पहुंचता है।









