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खान जी का कमाल: सीमा बदली, रसूख नहीं बदला!

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झारखंड में पहचान, ओड़िशा में पहुंच और दोनों तरफ ‘सलाम’—खान जी के प्रभाव की कहानी कुछ ऐसी ही है!

रिपोर्ट शैलेश सिंह

कहते हैं कि आम आदमी की पहचान उसके काम से होती है और बड़े आदमी की पहचान उसके काम से पहले उसके संपर्कों से। लेकिन हमारे सीमावर्ती इलाके में एक ऐसे ‘खान जी’ की चर्चा है, जिनके बारे में स्थानीय गलियारों में तरह-तरह के किस्से तैरते रहते हैं।

खान जी कौन हैं?
यह सवाल पूछने की जरूरत शायद किसी को नहीं।

क्योंकि जहां खान जी पहुंच जाएं, वहां परिचय-पत्र की जरूरत नहीं पड़ती—पहचान पहले पहुंच जाती है!

सीमा झारखंड की हो या ओड़िशा की, खान जी बेफिक्र!

सीमा पर आम आदमी को पता रहता है कि वह झारखंड में खड़ा है या ओड़िशा में।

लेकिन खान जी के लिए शायद सीमा सिर्फ नक्शे पर बनी एक रेखा है।

इधर खड़े हों तो भी पहचान, उधर जाएं तो भी पहचान।
इधर फोन उठे तो आवाज पहचान ली जाए, उधर फोन जाए तो शायद नाम पूछने की जरूरत ही न पड़े।

यही तो खान जी की असली खासियत बताई जाती है—उनकी पहुंच की कोई सीमा नहीं!

खान जी का ‘नेटवर्क’ देखकर मोबाइल कंपनी भी शरमा जाए!

आज के जमाने में मोबाइल नेटवर्क कमजोर हो जाए तो आदमी छत पर चढ़ जाता है।

लेकिन खान जी के संपर्कों के बारे में स्थानीय चर्चाएं कुछ ऐसी हैं कि नेटवर्क खोजने के लिए उन्हें छत पर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।

कहा जाता है कि नीचे से ऊपर तक और इधर से उधर तक—कनेक्शन ऐसा कि मोबाइल टावर भी पूछे, आखिर नेटवर्क किसका है?

हालांकि ये बातें स्थानीय चर्चाओं और दावों तक सीमित हैं। इनकी वास्तविकता की पुष्टि संबंधित रिकॉर्ड और आधिकारिक जांच से ही हो सकती है।

‘खान जी को कौन छू सकता है?’—यही सबसे बड़ा सवाल

इलाके में कभी-कभी ऐसी फुसफुसाहट सुनाई देती है कि खान जी के खिलाफ कार्रवाई करना आसान काम नहीं।

कारण?

बस वही पुराना जवाब—
“ऊपर तक पहुंच है!”

अब ऊपर कितना ऊपर, यह बताने वाला कोई नहीं।

लेकिन सवाल जरूर है कि अगर कोई व्यक्ति इतना प्रभावशाली है कि उसके नाम से ही कार्रवाई करने वाले दस बार सोचें, तो फिर कानून की ताकत आखिर कहां खड़ी है?

खान जी मुस्कुराते हैं, सिस्टम गंभीर हो जाता है!

आम आदमी के मामले में कागज मांगा जाता है।

फिर दूसरा कागज।

फिर तीसरा प्रमाण।

फिर जांच।

फिर रिपोर्ट।

फिर आदेश।

फिर कार्रवाई।

और कभी-कभी कार्रवाई से पहले ही मामला पुराना हो जाता है।

लेकिन खान जी?

उनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें देखकर सिस्टम ही गंभीर हो जाता है।

अब यह महज संयोग है, प्रभाव है या सिर्फ इलाके की अफवाह—यह तो जिम्मेदार अधिकारी ही स्पष्ट कर सकते हैं।

दो राज्यों की सरकारें, लेकिन खान जी का आत्मविश्वास एक जैसा!

झारखंड हो या ओड़िशा—सरकारें बदलती हैं, अधिकारी बदलते हैं, कुर्सियां बदलती हैं।

लेकिन खान जी का आत्मविश्वास बदलता दिखाई नहीं देता—ऐसा स्थानीय चर्चाओं में कहा जाता है।

यही कारण है कि लोग मजाक में कहते हैं—

“सरकारें आती-जाती रहती हैं, खान जी स्थायी व्यवस्था हैं!”

बेशक यह व्यंग्य है, कोई आधिकारिक तथ्य नहीं।

लेकिन लोकतंत्र में कभी-कभी व्यंग्य वही सवाल पूछ देता है जिसे सीधे पूछने में लोग हिचकते हैं।

आखिर खान जी इतने निश्चिंत क्यों हैं?

यही असली सवाल है।

क्या खान जी के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है?

क्या सब कुछ नियमों के अनुसार है?

क्या संबंधित विभागों ने कभी स्वतंत्र रूप से उनके प्रभाव, कारोबार और प्रशासनिक संपर्कों की समीक्षा की?

अगर सब कुछ साफ है तो फिर जांच से डर कैसा?

और अगर कहीं कोई गड़बड़ी है तो कार्रवाई में देरी क्यों?

खान जी से बड़ा सवाल ‘खान जी का सिस्टम’ है

मामला सिर्फ खान जी का नहीं है।

मामला उस व्यवस्था का है, जहां प्रभावशाली व्यक्ति के बारे में यह धारणा बन जाए कि “इनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।”

लोकतंत्र में इससे खतरनाक स्थिति और क्या होगी?

कानून की किताब में लिखा होना पर्याप्त नहीं है। जनता को जमीन पर भी यह दिखना चाहिए कि कानून की नजर में कोई छोटा-बड़ा नहीं।

वरना कल कोई दूसरा खान जी पैदा होगा और लोग फिर कहेंगे—

“भाई साहब, इनके ऊपर तक हाथ हैं!”

और तब सवाल यह नहीं होगा कि खान जी कितने बड़े हैं।

सवाल यह होगा कि आखिर वह ‘ऊपर’ कितना ऊपर है, जहां पहुंचते-पहुंचते कानून की आवाज धीमी पड़ जाती है?

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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