“विधायक की आवाज, सांसद की पहल, फिर भी अधूरा भवन—कब टूटेगी प्रशासनिक सुस्ती की दीवार?”
“करोड़ों का प्राक्कलन, जांच समिति बेखबर! जगन्नाथपुर की बेटियों के विद्यालय पर कब होगा फैसला?”
“आश्वासन पर आश्वासन, भवन अब भी अधूरा—कस्तूरबा विद्यालय पर प्रशासन की चुप्पी कब टूटेगी?”
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
किरीबुरू। पश्चिमी सिंहभूम जिले के जगन्नाथपुर प्रखंड में कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय के अधूरे भवन की कहानी झारखंड की प्रशासनिक कार्यशैली, सरकारी योजनाओं की निगरानी और बालिका शिक्षा के प्रति व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जिस विद्यालय भवन का सपना वर्ष 2007 में देखा गया था, जिस पर करोड़ों रुपये खर्च करने की योजना बनी, जिस मामले को विधायक ने विधानसभा में उठाया और सांसद ने उपायुक्त तक पहुंचाया, वह भवन वर्षों बाद भी पूरा नहीं हो सका है। हैरानी की बात यह है कि समस्या के समाधान के लिए पत्राचार, जांच, प्राक्कलन और प्रशासनिक स्वीकृति की प्रक्रिया लगातार चल रही है, लेकिन छात्राओं को अब तक अपने विद्यालय के लिए पूर्ण भवन मिलने का इंतजार है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक दशक से अधिक समय से अधूरे पड़े भवन की समस्या प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के संज्ञान में है, तो फिर समाधान की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों खिंच रही है? क्या सरकारी फाइलों में दौड़ती योजनाओं की गति जमीन पर पढ़ने वाली छात्राओं के भविष्य से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है?
सोनाराम सिंकु ने विधानसभा में उठाई आवाज, लेकिन समस्या जस की तस
जगन्नाथपुर के विधायक एवं झारखंड विधानसभा के सदस्य सोनाराम सिंकु लंबे समय से इस अधूरे भवन का मुद्दा उठाते रहे हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, उन्होंने 17 दिसंबर 2021 को तत्कालीन मानव संसाधन विकास विभाग के मंत्री को पत्र लिखकर कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय के अधूरे निर्माण कार्य को पूरा कराने की मांग की थी।

अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनके विधानसभा क्षेत्र में विद्यालय भवन का निर्माण लगभग दस वर्षों से अधूरा और लंबित है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया था कि विधानसभा सत्र में इस विषय को उठाने के बावजूद आश्वासन के अतिरिक्त ठोस परिणाम सामने नहीं आए। उन्होंने सुझाव दिया था कि यदि विभागीय आवंटन उपलब्ध नहीं है, तो जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) में उपलब्ध राशि से अधूरे भवन को पूरा कराया जा सकता है।
वर्ष 2020 में भी इस मामले पर विधानसभा में सवाल उठाया गया था। तत्कालीन विभागीय जवाब में बताया गया कि भवन निर्माण के लिए वर्ष 2007 में स्वीकृति मिली थी और निर्माण कार्य मेसर्स हरिओम ट्रेडर्स, बोकारो को आवंटित किया गया था। कार्य की एकरारित राशि 2,64,00,532 रुपये बताई गई थी।

विभागीय उत्तर के अनुसार, संवेदक ने निर्माण कार्य बीच में ही छोड़ दिया था। बाद में उसके एकरारनामे को दंड सहित विखंडित करते हुए अग्रधन, सुरक्षा राशि और विलंब कटौती सहित कुल 24.57 लाख रुपये जब्त किए जाने की जानकारी दी गई थी। उस समय सरकार ने सितंबर 2020 तक निर्माण कार्य पूरा कर विद्यालय को सुचारू रूप से संचालित करने का लक्ष्य बताया था।
लेकिन सवाल यह है कि वर्ष 2020 तक भवन पूरा करने का सरकारी आश्वासन आखिर कहां गुम हो गया? यदि उस समय नया संवेदक नियुक्त कर निर्माण पूरा करने की बात कही गई थी, तो उसके बाद की प्रगति और वर्तमान स्थिति की जवाबदेही किसकी है?
सांसद जोबा माझी ने भी उपायुक्त को लिखा पत्र
इस मामले में सिंहभूम की सांसद जोबा माझी ने भी हस्तक्षेप करते हुए 27 सितंबर 2026 को पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त को पत्र लिखकर जगन्नाथपुर स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय के अधूरे भवन को शीघ्र पूरा कराने की मांग की।

सांसद ने अपने पत्र में परियोजना की गंभीरता को रेखांकित करते हुए बताया कि झारखंड राज्य शिक्षा परियोजना परिषद, रांची द्वारा परियोजना के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्रदान किया जा चुका है। साथ ही, ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल (NREP) की ओर से अधूरे निर्माण कार्य का प्राक्कलन स्वीकृति के लिए DMFT के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की जानकारी दी गई।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि योजना उच्च प्राथमिकता की श्रेणी में आती है और DMFT की शासी परिषद में इसका प्रस्ताव पूर्व में पारित किया जा चुका है। सांसद ने जनहित और छात्राओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
जब विधायक और सांसद दोनों स्तरों पर मामला उठ चुका है, तब भी निर्माण कार्य पूरा कराने की प्रक्रिया का लंबा खिंचना प्रशासनिक जवाबदेही को कठघरे में खड़ा करता है। जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा और सरकारी पत्राचार तभी सार्थक माने जाएंगे, जब उनका परिणाम जमीन पर दिखाई दे।
वर्ष 2007 की योजना, 2016 में बंद हुआ काम
उपलब्ध विभागीय दस्तावेज इस मामले की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। निर्माण कार्य झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद, रांची के कार्यादेश संख्या JEPC/Civ/03/3406, दिनांक 19 फरवरी 2009 के आलोक में मेसर्स हरिओम ट्रेडर्स, बोकारो द्वारा शुरू किया गया था।

जिला शिक्षा पदाधिकारी-सह-जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, समग्र शिक्षा, पश्चिमी सिंहभूम ने 9 अप्रैल 2026 को निदेशक, NEP को भेजे गए प्रतिवेदन में बताया कि संवेदक ने वर्ष 2016 से कार्य अधूरा छोड़ दिया था। इसके बाद झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद के ज्ञापांक JEPC/CIV/03/153/2009/279, दिनांक 9 फरवरी 2017 के माध्यम से संवेदक के एकरारनामे को दंड सहित विखंडित कर दिया गया।
प्रतिवेदन में स्पष्ट कहा गया कि वर्तमान में विद्यालय भवन निर्माण की पुरानी योजना नियमानुसार बंद कर दी गई है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि जब पुरानी योजना बंद कर दी गई थी, तो अधूरे भवन को पूरा करने की नई व्यवस्था बनाने में इतनी देर क्यों हुई? क्या निर्माण कार्य बंद होने के बाद संबंधित विभागों ने समय रहते भविष्य की कार्ययोजना तैयार की थी? यदि नहीं, तो इस देरी की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
DMFT से लगभग पांच करोड़ रुपये की योजना, फिर भी इंतजार
वर्षों की देरी के बाद अधूरे भवन को पूरा करने के लिए DMFT के माध्यम से पहल की गई। विधानसभा में 24 फरवरी 2026 को पूछे जाने वाले तारांकित प्रश्न संख्या शि.-21 के उत्तर में बताया गया कि उपायुक्त, पश्चिमी सिंहभूम ने 19 अगस्त 2025 को पत्रांक 1615/DMFT के माध्यम से कार्यपालक अभियंता, NREP, चाईबासा को शेष निर्माण कार्य का प्राक्कलन तैयार करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद कार्यपालक अभियंता, NREP ने 17 फरवरी 2026 को पत्रांक 101/NREP के माध्यम से 4,99,30,300 रुपये यानी लगभग पांच करोड़ रुपये का प्राक्कलन उपायुक्त कार्यालय को समर्पित किया।

विधानसभा में दिए गए उत्तर के अनुसार, भवन निर्माण कार्य पूरा करने की दिशा में अग्रेतर कार्रवाई की जा रही थी। सांसद जोबा माझी ने भी अपने 27 सितंबर 2026 के पत्र में प्राक्कलन और DMFT से जुड़ी प्रक्रिया का उल्लेख किया।
अब सवाल यह है कि जब प्राक्कलन तैयार हो चुका है, परियोजना को प्राथमिकता प्राप्त है और संबंधित स्तरों पर प्रस्ताव आगे बढ़ाया जा चुका है, तो अंतिम प्रशासनिक स्वीकृति, धनराशि की उपलब्धता और निर्माण शुरू कराने की समयसीमा सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं है?
यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्राक्कलन तैयार होना और निर्माण कार्य के लिए अंतिम स्वीकृति मिल जाना अलग-अलग चरण हैं। इसलिए प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि परियोजना अभी किस स्तर पर लंबित है और अगला कदम कौन-सा विभाग उठाएगा।

4 अगस्त 2026 को जांच समिति गठित, लेकिन तारीख और समय का उल्लेख नहीं!
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू उपायुक्त-सह-अध्यक्ष, DMFT के कार्यालय से जारी आदेश से सामने आता है।
दस्तावेजों के अनुसार, DMFT की शासी परिषद की 17 फरवरी 2025 को संपन्न बैठक में जगन्नाथपुर प्रखंड के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय के अधूरे कार्य को DMFT मद से पूरा करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित करते हुए अनुमोदित किया गया था। इसके बाद अधूरे कार्य और आवश्यकताओं की जांच के लिए समिति गठित करने का आदेश जारी किया गया, जिसका ज्ञापांक 998/DMFT और दिनांक 4 अगस्त 2026 बताया गया है।
समिति में उप विकास आयुक्त-सह-सदस्य सचिव DMFT, सहायक समाहर्ता-सह-सहायक दंडाधिकारी, जिला शिक्षा पदाधिकारी, जिला योजना पदाधिकारी, जगन्नाथपुर के प्रखंड विकास पदाधिकारी तथा NREP और भवन प्रमंडल के कार्यपालक अभियंताओं को शामिल किया गया।

समिति को निर्देश दिया गया कि वह अधूरे कार्य की जांच कर प्रतिवेदन DMFT कोषांग को उपलब्ध कराए।
लेकिन उपलब्ध आदेश में जांच करने के लिए कोई निश्चित दिन और समय निर्धारित होने का उल्लेख नहीं मिलता। यदि मूल आदेश में भी निरीक्षण की तारीख, समय और प्रतिवेदन जमा करने की समयसीमा तय नहीं की गई है, तो यह प्रशासनिक निगरानी की गंभीर कमजोरी है।
जांच समिति गठित कर देना अपने आप में उपलब्धि नहीं है। समिति कब स्थल पर पहुंचेगी, कौन अधिकारी निरीक्षण करेगा, कितने दिनों में रिपोर्ट देगा और रिपोर्ट के आधार पर निर्णय कब होगा—इन सवालों का उत्तर भी उतना ही आवश्यक है।
आखिर यह कैसी कार्यशैली है, जिसमें वर्षों से लंबित छात्रावास भवन के निरीक्षण के लिए समिति तो बना दी जाती है, लेकिन समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने का स्पष्ट कार्यक्रम सामने नहीं आता? क्या प्रशासनिक आदेश केवल फाइलों की औपचारिकता पूरी करने के लिए जारी किए जा रहे हैं?
हालांकि, केवल आदेश में तारीख और समय नहीं होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि समिति ने निरीक्षण नहीं किया। इसकी वास्तविक स्थिति प्रशासन से स्पष्ट होनी चाहिए। लेकिन यदि समयसीमा तय नहीं की गई, तो यह प्रशासनिक ढिलाई पर गंभीर सवाल जरूर खड़े करता है।

छात्राएं दूसरे भवन में पढ़ने को मजबूर, मूल सवाल अब भी कायम
24 फरवरी 2026 के विधानसभा प्रश्न के उत्तर में बताया गया था कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, जगन्नाथपुर का संचालन, आवासन और पठन-पाठन +2 उच्च विद्यालय, रसेल, जगन्नाथपुर के भवन में किया जा रहा है।
यह व्यवस्था विद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों को जारी रखने में मदद करती है, लेकिन इससे मूल भवन की समस्या समाप्त नहीं हो जाती। आवासीय विद्यालय की आवश्यकताओं के अनुरूप पर्याप्त कक्ष, छात्रावास, शौचालय, स्नानघर और अन्य सुविधाएं उपलब्ध होना छात्राओं के लिए महत्वपूर्ण है।
ऐसे में प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि वर्तमान व्यवस्था में छात्राओं को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है और अधूरे भवन के निर्माण की वास्तविक समयसीमा क्या है।

अब पत्राचार नहीं, समयबद्ध कार्रवाई चाहिए
जगन्नाथपुर कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय का मामला अब केवल एक अधूरे भवन का मामला नहीं रह गया है। यह सरकारी योजनाओं की निरंतरता, संवेदक की जवाबदेही, विभागीय समन्वय, DMFT की प्रक्रिया और प्रशासनिक निगरानी की परीक्षा बन चुका है।
वर्ष 2007 में स्वीकृत योजना, वर्ष 2016 में अधूरा छोड़ा गया निर्माण, वर्ष 2017 में संवेदक का एकरारनामा विखंडित होना, वर्ष 2020 तक भवन पूरा करने का आश्वासन, वर्ष 2021 में विधायक का पत्र, वर्ष 2025 में DMFT की शासी परिषद का निर्णय, वर्ष 2026 में लगभग पांच करोड़ रुपये का प्राक्कलन और जांच समिति गठन—इतनी लंबी प्रक्रिया के बाद भी यदि निर्माण पूरा कराने की स्पष्ट समयसीमा सामने नहीं है, तो प्रशासन को जनता के सामने जवाब देना चाहिए।
उपायुक्त और संबंधित विभागों को चाहिए कि वे तत्काल स्पष्ट करें कि जांच समिति ने स्थल निरीक्षण किया है या नहीं, रिपोर्ट कब तक तैयार होगी, प्रशासनिक स्वीकृति की स्थिति क्या है और निर्माण कार्य शुरू करने तथा पूरा करने का लक्ष्य क्या निर्धारित किया गया है।
बालिका शिक्षा से जुड़ी परियोजना को फाइलों में उलझाए रखना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। प्रशासनिक व्यवस्था की सफलता आदेश जारी करने में नहीं, बल्कि उन आदेशों का परिणाम जमीन पर दिखाने में है।
अब देखना यह है कि विधायक सोनाराम सिंकु और सांसद जोबा माझी की पहल, DMFT की स्वीकृति प्रक्रिया तथा जिला प्रशासन की कार्रवाई मिलकर इस लंबे इंतजार को समाप्त कर पाती है या छात्राओं के हिस्से में एक बार फिर केवल आश्वासन ही आता है।
सवाल सीधा है—जब जनप्रतिनिधि आवाज उठा चुके हैं, प्राक्कलन तैयार है और जांच समिति गठित हो चुकी है, तो जगन्नाथपुर की बेटियों को उनका अपना पूर्ण विद्यालय भवन आखिर कब मिलेगा?










