निविदा से पहले संवेदकों का पूरा हिसाब खंगाल रहा जिला प्रशासन, एक-दूसरे विभागों से मांगी जा रही लंबित कार्यों की सूची
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
पश्चिमी सिंहभूम। सरकारी योजनाओं को वर्षों तक लटकाकर रखने वाले संवेदकों पर अब कार्रवाई की तलवार लटकने लगी है। निविदा निष्पादन से पहले लंबित कार्यों का पूरा ब्योरा जुटाने की कवायद ने बड़े संवेदकों के बीच खलबली मचा दी है। सूत्रों के अनुसार जिला प्रशासन ने विभिन्न कार्य एजेंसियों को लंबित योजनाओं वाले संवेदकों की सूची एक-दूसरे से प्राप्त कर जांच करने और निविदा शर्तों का कड़ाई से पालन करने की हिदायत दी है।

पहले लंबित काम, फिर नई निविदा—अब नहीं चलेगा खेल!
पूर्व में उपायुक्त स्तर से हुई कार्रवाई के आलोक में ऐसी व्यवस्था रही है कि कार्य लंबित रखने वाले संवेदकों को नई योजनाओं का आवंटन नहीं किया जाना है। निविदा प्रक्रिया में संवेदकों से इस संबंध में शपथ पत्र भी लिया जाता है।
अब जिला प्रशासन के कड़े रुख के बाद इस प्रावधान को सिर्फ कागजी खानापूर्ति के बजाय जमीन पर लागू करने की तैयारी बताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि निविदा निष्पादन में निर्धारित शर्तों से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाए।

राजनीतिक संरक्षण का असर भी खत्म करने की तैयारी?
सरकारी योजनाओं को समय पर पूरा नहीं करने वाले संवेदकों पर कार्रवाई की कवायद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक संरक्षण प्राप्त माने जाने वाले संवेदकों पर भी नियम समान रूप से लागू होंगे?
सूत्रों का दावा है कि जिला प्रशासन के सख्त रुख के बाद एजेंसियों पर भी दबाव है कि किसी प्रभावशाली अथवा राजनीतिक पहुंच वाले संवेदक को नियमों से बाहर जाकर राहत नहीं दी जाए।
ग्रामीण विकास विशेष में बड़े संवेदकों पर कार्रवाई की सुगबुगाहट
सूत्रों के अनुसार ग्रामीण विकास विशेष के मुख्य अभियंता अवधेश कुमार ने जिले में लंबे समय से कार्य लंबित रखने वाले बड़े संवेदकों के विरुद्ध डिबार की कार्रवाई के लिए कार्यपालक अभियंता को निर्देश दिए हैं।
सूत्रों के मुताबिक सत्यम बिल्डर, राजीव कंस्ट्रक्शन, शास्त्पति राजेश सिंह तथा राज यादव के नाम भी लंबित कार्यों के मामले में कार्रवाई के दायरे में आने की चर्चा है। हालांकि, इन संवेदकों के विरुद्ध अंतिम कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग से होना अभी बाकी है।

एक-दो साल बीते, फिर भी योजना अधूरी!
सरकारी योजनाओं को समय सीमा के भीतर पूरा करना संवेदकों की जिम्मेदारी होती है। लेकिन सूत्रों के अनुसार जिले में कई ऐसी योजनाएं हैं, जिन्हें एक से दो वर्ष या उससे अधिक समय बीतने के बाद भी पूरा नहीं किया गया है।
कार्य की धीमी गति, निर्धारित समय सीमा में काम पूरा नहीं करना और योजनाओं को लंबे समय तक लंबित रखना अब प्रशासन की निगरानी के केंद्र में है।
DMFT योजनाओं पर भी कसने लगी शिकंजा
सूत्रों के अनुसार DMFT फंड से संचालित योजनाओं को लंबित रखने वाले संवेदकों को नई निविदाओं में कार्य आवंटित नहीं करने की तैयारी है।
जिले में खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए DMFT फंड से बड़ी संख्या में योजनाएं संचालित होती हैं। ऐसे में इन योजनाओं को लंबित रखने वाले संवेदकों पर कार्रवाई का असर काफी व्यापक हो सकता है।
मनोहरपुर में सबसे अधिक योजनाएं लंबित होने की चर्चा
सूत्रों के अनुसार जिले के मनोहरपुर विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में योजनाएं लंबित होने की बात सामने आ रही है। इनमें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त बताए जाने वाले एक बड़े संवेदक के पास कई योजनाओं के लंबित होने की चर्चा है।
हालांकि, संबंधित संवेदक और विभागीय अधिकारियों की ओर से इस संबंध में आधिकारिक स्थिति स्पष्ट किया जाना बाकी है।
MGSY-PMGSY सड़कें लटकाने वालों पर भी नजर
ग्रामीण कार्य विभाग में भी लंबित योजनाओं को लेकर शिकंजा कसने की तैयारी है। सूत्रों के अनुसार MGSY और PMGSY के तहत सड़क निर्माण कार्यों को लंबे समय तक लंबित रखने वाले संवेदकों को नई निविदाओं में कार्य आवंटित नहीं करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
सड़क निर्माण में देरी का सीधा असर ग्रामीण क्षेत्रों की आवाजाही, परिवहन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में विभाग अब लंबित सड़कों का रिकॉर्ड भी खंगाल रहा है।
संवेदक अनिल यादव पर भी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू?
सूत्रों के अनुसार ग्रामीण कार्य विभाग में संवेदक अनिल यादव के विरुद्ध भी दंडात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होने की बात सामने आ रही है। हालांकि, इस संबंध में विभागीय स्तर से आधिकारिक पुष्टि अभी प्रतीक्षित है।

एक विभाग नहीं, पूरा जिला खंगाल रहा संवेदकों का रिकॉर्ड
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कार्रवाई की तैयारी केवल किसी एक विभाग तक सीमित नहीं बताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार जिले की विभिन्न कार्य एजेंसियां एक-दूसरे से लंबित कार्यों वाले संवेदकों की सूची मांग रही हैं, ताकि किसी विभाग में काम लंबित रखने वाला संवेदक दूसरे विभाग की नई निविदा में लाभ न उठा सके।
यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो वर्षों से सरकारी योजनाओं को लटकाकर रखने वाले संवेदकों के लिए नई निविदाएं हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
चिट्ठी में कार्रवाई या जमीन पर गिरेगी गाज?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि लंबित योजनाओं को लेकर शुरू हुई यह कार्रवाई वास्तव में धरातल तक पहुंचेगी या फिर सरकारी फाइलों और पत्राचार तक सीमित रह जाएगी?
जिला प्रशासन के सख्त रुख के बाद एजेंसियों में हलचल जरूर तेज हुई है। लेकिन असली परीक्षा कार्रवाई के अमल की होगी। यदि प्रभावशाली और राजनीतिक पहुंच वाले संवेदकों पर भी समान नियम लागू होते हैं, तो यह सरकारी योजनाओं में जवाबदेही तय करने की दिशा में बड़ा कदम माना जाएगा।
‘काम नहीं तो नई योजना नहीं’—बदल सकता है ठेकेदारी का खेल
लंबित योजनाओं पर सख्ती का सीधा संदेश यही है कि पुराने काम पूरे किए बिना नई सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने की व्यवस्था पर लगाम लगाने की तैयारी है।
अब देखना होगा कि राज्य और जिला स्तर से जारी सख्त निर्देशों के बाद कितने संवेदकों पर वास्तव में डिबार या दंडात्मक कार्रवाई होती है और कितनों को राजनीतिक अथवा प्रभावशाली पहुंच के बावजूद राहत मिलती है।
नोट: उपरोक्त रिपोर्ट में जिन संवेदकों के नाम कार्रवाई के संभावित दायरे में बताए गए हैं, उन्हें सूत्रों के हवाले से रखा गया है। संबंधित विभाग से आधिकारिक पुष्टि होने पर स्थिति और स्पष्ट होगी।










