कोल्हान से रांची तक एक ही नाम की चर्चा
रिपोर्ट शैलेश सिंह
झारखंड के पथ निर्माण विभाग में इन दिनों एक अधीक्षण अभियंता को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। कोल्हान प्रमंडल के चाईबासा अंचल में पदस्थापित अधीक्षण अभियंता विजय बहादुर के खिलाफ भ्रष्टाचार, आर्थिक अनियमितता, योजनाओं को जानबूझकर लटकाने और अवैध संपत्ति अर्जित करने जैसे गंभीर आरोपों की चर्चा विभागीय गलियारों से लेकर रांची तक पहुंच चुकी है। विभाग के अभियंताओं, कर्मचारियों और संवेदकों के बीच यह मामला सबसे बड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है।

हालांकि इन आरोपों की अब तक किसी सक्षम जांच एजेंसी या न्यायालय द्वारा पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारी का पक्ष भी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। लेकिन विभागीय सूत्रों का दावा है कि शिकायतों का पूरा दस्तावेज मंत्रिमंडल निगरानी विभाग तक पहुंचाया गया है।
फाइलें रोकना बना कमाई का जरिया?
सूत्रों के अनुसार संबंधित अधीक्षण अभियंता पर आरोप है कि वे योजनाओं के डीपीआर, प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति, रिवाइज्ड एस्टीमेट और कार्य विचलन से संबंधित फाइलों को महीनों तक लंबित रखते हैं।
संवेदकों का आरोप है कि फाइलों में अनावश्यक आपत्तियां लगाकर उन्हें रोका जाता है। कई मामलों में तकनीकी स्वीकृति समय पर नहीं दी जाती, जिससे योजनाएं महीनों तक आगे नहीं बढ़ पातीं। विभागीय सूत्रों का दावा है कि इस देरी के पीछे आर्थिक लाभ लेने का उद्देश्य बताया जा रहा है।
यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी विकास योजनाओं को प्रभावित करने वाला गंभीर मामला माना जाएगा।
निगरानी विभाग तक पहुंची शिकायत?
सूत्रों के अनुसार संबंधित अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े कई बिंदुओं वाली शिकायत मंत्रिमंडल निगरानी विभाग को सौंपी गई है। विभागीय हलकों में यह चर्चा तेज है कि शिकायत में उनके कार्यकाल के दौरान हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं, फाइलों में देरी, संवेदकों से कथित आर्थिक दोहन और संपत्ति अर्जन का पूरा ब्यौरा शामिल है।
हालांकि इस संबंध में अभी तक मंत्रिमंडल निगरानी विभाग की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
आय से अधिक संपत्ति की भी शिकायत
विभागीय सूत्रों और कुछ संवेदकों का दावा है कि संबंधित अधिकारी ने अपने लगभग दस वर्षों के कार्यकाल में भारी मात्रा में चल और अचल संपत्ति अर्जित की है।
शिकायत में कथित रूप से यह भी मांग की गई है कि उनकी संपत्तियों की जांच कराई जाए और यदि आय से अधिक संपत्ति पाई जाती है तो भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई की जाए।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है।
स्टिंग ऑपरेशन की भी चर्चा
विभाग के एक कर्मचारी ने गोपनीयता की शर्त पर दावा किया कि संबंधित अधिकारी का कथित स्टिंग ऑपरेशन भी किया गया है।
सूत्रों का कहना है कि यदि ऐसा कोई स्टिंग मौजूद है तो उसे जांच एजेंसियों को उपलब्ध कराया जा सकता है। हालांकि इस कथित स्टिंग की सत्यता की पुष्टि नहीं हुई है और न ही कोई आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक किया गया है।
क्या निलंबन की तैयारी?
विभागीय चर्चाओं के अनुसार संबंधित अधिकारी के खिलाफ जल्द विभागीय कार्रवाई होने की संभावना जताई जा रही है।
कुछ सूत्रों का दावा है कि जांच आगे बढ़ने पर निलंबन और भ्रष्टाचार के मामलों में प्राथमिकी दर्ज होने जैसी कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन फिलहाल यह केवल विभागीय चर्चाओं और सूत्रों पर आधारित जानकारी है।
हाईकोर्ट में पीआईएल की तैयारी का दावा
एक संवेदक ने दावा किया है कि यदि विभागीय स्तर पर कार्रवाई नहीं होती है तो मामले को झारखंड उच्च न्यायालय तक ले जाया जाएगा।
सूत्रों के अनुसार कथित अवैध संपत्ति और विभागीय भ्रष्टाचार की जांच की मांग को लेकर जनहित याचिका दाखिल करने की तैयारी चल रही है। हालांकि अभी तक ऐसी किसी याचिका के दायर होने की आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
सड़कों की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल
केवल भ्रष्टाचार ही नहीं बल्कि सड़क निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर भी संबंधित अधिकारी के कार्यकाल पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

स्थानीय लोगों और विभागीय सूत्रों का आरोप है कि कई सड़कों पर निर्माण पूरा होने के कुछ ही समय बाद दरारें दिखाई देने लगीं। इसमें हाल ही में बनाए गई मनोहरपुर – बड़ाजामदा मुख्य सड़क में सैडल, झाड़बेड़ा के समीप सड़क के बीच बड़ी दरार आना है। कई स्थानों पर सड़क की ऊपरी परत उखड़ने और निर्माण मानकों का पालन नहीं होने की शिकायतें सामने आई हैं।
यदि इन शिकायतों की पुष्टि होती है तो यह सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला हो सकता है।
रांची में बैठकर हो रही मॉनिटरिंग?
सूत्रों का कहना है कि संबंधित अधीक्षण अभियंता अधिकांश समय रांची में रहकर अपने क्षेत्र की मॉनिटरिंग करते हैं।
आरोप है कि वे निर्माण स्थलों का नियमित निरीक्षण नहीं करते, जिसके कारण कार्यों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। साइट वेरिफिकेशन नहीं होने से संवेदकों पर प्रभावी निगरानी भी नहीं हो पा रही है।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
योजनाएं अधर में, विकास प्रभावित
विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि कई सड़क परियोजनाएं महीनों से अधूरी पड़ी हैं। अनेक योजनाओं की प्रगति बेहद धीमी है जबकि कुछ परियोजनाएं तकनीकी स्वीकृति और प्रशासनिक प्रक्रिया में फंसी हुई हैं।
इसका सीधा असर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के विकास पर पड़ रहा है। लोगों को बेहतर सड़क सुविधा मिलने में लगातार देरी हो रही है।
विभाग की साख पर सवाल
यदि विभागीय सूत्रों द्वारा लगाए जा रहे आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल एक अधिकारी का मामला नहीं होगा बल्कि पूरे पथ निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा।
सरकारी योजनाओं का उद्देश्य जनता को बेहतर सड़क सुविधा उपलब्ध कराना है। यदि तकनीकी स्वीकृति, निरीक्षण और गुणवत्ता नियंत्रण में ही कथित भ्रष्टाचार हावी हो जाए तो विकास कार्यों का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
अब सबकी निगाह जांच पर
फिलहाल पूरा मामला विभागीय चर्चाओं और सूत्रों के दावों के केंद्र में है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या मंत्रिमंडल निगरानी विभाग इन शिकायतों पर कोई औपचारिक जांच शुरू करता है या नहीं।
यदि जांच होती है तो आरोप सही पाए जाने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई हो सकती है। वहीं यदि आरोप निराधार साबित होते हैं तो इससे उनकी स्थिति भी स्पष्ट होगी।














