भारत आदिवासी पार्टी ने उठाए गंभीर सवाल, उच्च न्यायालय की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच की मांग
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
मनोहरपुर (पश्चिमी सिंहभूम)। पश्चिमी सिंहभूम जिले के मनोहरपुर स्थित चिरिया लौह अयस्क खदान से खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए DMFT (जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट) मद में तीन वित्तीय वर्षों के दौरान ₹30,60,97,071 यानी लगभग 30.61 करोड़ रुपये जमा किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसके बावजूद खनन प्रभावित गांवों में बुनियादी सुविधाओं की बदहाली को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आखिर खनिज संपदा से करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त होने के बाद भी प्रभावित ग्रामीणों को विकास की बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं मिल पा रही हैं?
भारत आदिवासी पार्टी, पश्चिमी सिंहभूम के जिलाध्यक्ष सुशील बारला ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इस मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चिरिया लौह अयस्क खनन से संबंधित DMFT मद में जमा राशि और उसके उपयोग की उच्च न्यायालय, रांची की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। साथ ही उन्होंने जिला प्रशासन और संबंधित विभागों से राशि के आवंटन, योजनाओं की स्वीकृति तथा खर्च का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग उठाई है।

तीन वित्तीय वर्षों में जमा हुए 30.61 करोड़ रुपये
सुशील बारला के अनुसार, सेल निगमित कार्यालय, नई दिल्ली से प्राप्त जानकारी, पत्रांक HR/RTI/CO/26/060 के मुताबिक चिरिया लौह अयस्क खनन से संबंधित DMFT मद में वित्तीय वर्ष 2023-24, 2024-25 और 2025-26 के दौरान कुल ₹30,60,97,071 जमा किए गए।
इतनी बड़ी राशि जमा होने के बावजूद खनन प्रभावित गांवों की जमीनी स्थिति को लेकर उन्होंने चिंता जताई है। उनका सवाल है कि जब खनन से प्रभावित लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये DMFT मद में जमा किए जा रहे हैं, तो फिर उन गांवों में विकास की रफ्तार अपेक्षित स्तर तक क्यों नहीं पहुंच रही है?
दुबिल, अंकुवा, मरंगपोंगा और दिकूपोंगा में विकास पर सवाल
भारत आदिवासी पार्टी के जिलाध्यक्ष ने दुबिल, अंकुवा, मरंगपोंगा और दिकूपोंगा जैसे खनन प्रभावित क्षेत्रों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है। उनके मुताबिक इन क्षेत्रों में पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सिंचाई और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास की आवश्यकता बनी हुई है।
खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र होने के बावजूद यदि स्थानीय ग्रामीणों को जरूरी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तो यह विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और उनकी प्राथमिकताओं की समीक्षा का विषय है। पार्टी का कहना है कि खनन से प्राप्त राजस्व का वास्तविक लाभ सबसे पहले उन ग्रामीणों तक पहुंचना चाहिए, जिनका जीवन और पर्यावरण खनन गतिविधियों से प्रभावित होता है।
DMFT का पैसा आखिर कहां और कैसे खर्च हुआ?
सुशील बारला ने सवाल उठाया कि DMFT मद में जमा करोड़ों रुपये का उपयोग किन योजनाओं में किया गया है और इन योजनाओं से खनन प्रभावित ग्रामीणों को कितना लाभ मिला है। उन्होंने मांग की कि संबंधित विभाग निम्नलिखित जानकारियां सार्वजनिक करें—
- DMFT मद में जमा कुल राशि का वर्षवार विवरण।
- स्वीकृत योजनाओं और उन पर खर्च की गई राशि का पूरा ब्योरा।
- अधूरी, लंबित और पूरी हो चुकी योजनाओं की सूची।
- योजनाओं के कार्यान्वयन की स्थिति तथा उनसे लाभान्वित ग्रामीणों का विवरण।
- खनन प्रभावित गांवों के विकास के लिए निर्धारित राशि और उसके वास्तविक उपयोग का हिसाब।
उनका कहना है कि सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता अनिवार्य है। जब राशि खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के उद्देश्य से जमा की जाती है, तो उसके खर्च का स्पष्ट विवरण भी जनता के सामने आना चाहिए।
उच्च न्यायालय की निगरानी में जांच की मांग
भारत आदिवासी पार्टी के जिलाध्यक्ष ने सरकार और जिला प्रशासन के समक्ष प्रमुख मांग रखते हुए कहा है कि चिरिया लौह अयस्क खनन से संबंधित DMFT मद में जमा राशि तथा उसके उपयोग की उच्च न्यायालय, रांची की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
उन्होंने यह भी मांग की कि जांच के दौरान राशि के आवंटन, योजनाओं की स्वीकृति, वास्तविक खर्च और कार्यों की जमीनी स्थिति की पड़ताल की जाए। यदि जांच में वित्तीय अनियमितता, सरकारी धन के दुरुपयोग अथवा जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है, तो संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
विकास योजनाओं में ग्रामीणों की जरूरतों को मिले प्राथमिकता
सुशील बारला ने कहा कि DMFT मद की राशि का उपयोग खनन प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप होना चाहिए। पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सिंचाई और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता देते हुए योजनाएं तैयार की जानी चाहिए, ताकि ग्रामीणों को सीधे इसका लाभ मिल सके।
उन्होंने जोर दिया कि विकास का आकलन केवल कागजों पर स्वीकृत योजनाओं या खर्च की गई राशि से नहीं, बल्कि गांवों में हुए वास्तविक बदलाव से होना चाहिए। यदि करोड़ों रुपये जमा होने के बाद भी प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना रहता है, तो योजनाओं की प्राथमिकताओं और क्रियान्वयन की समीक्षा आवश्यक है।
खनिज संपदा का लाभ प्रभावित ग्रामीणों तक पहुंचाना प्रशासन की जिम्मेदारी
सुशील बारला ने कहा कि खनिज संपदा से प्राप्त राजस्व का लाभ खनन प्रभावित ग्रामीणों तक पहुंचाना जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि DMFT मद में जमा राशि और उसके वास्तविक उपयोग के संबंध में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए तथा चिरिया खनन प्रभावित क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास के लिए ठोस कार्ययोजना बनाई जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि खनन प्रभावित ग्रामीणों को विकास की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए योजनाओं की नियमित समीक्षा, खर्च का सार्वजनिक विवरण और जवाबदेही तय करना जरूरी है।
अब देखना यह है कि करोड़ों रुपये की DMFT राशि के उपयोग को लेकर उठाए गए इन सवालों पर जिला प्रशासन और संबंधित विभाग क्या कदम उठाते हैं तथा चिरिया के खनन प्रभावित गांवों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए क्या ठोस पहल की जाती है।











