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ACB में चार्जशीट, फिर भी प्रोन्नति! भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अभियंता को मलाईदार प्रभार देने पर मचा बवाल

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झारखंड आंदोलनकारी सुनील सिरका ने मुख्य सचिव से मांगी उच्चस्तरीय जांच; विजिलेंस क्लीयरेंस से लेकर प्रोन्नति तक की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

चाईबासा। झारखंड में सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के मामले में चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद एक अभियंता को प्रोन्नति और महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंपे जाने का मामला गरमा गया है। ग्रामीण विकास विशेष अंचल, रांची में अतिरिक्त प्रभार पर तैनात अधीक्षण अभियंता एवं चाईबासा के तत्कालीन कार्यपालक अभियंता जितेंद्र पासवान को लेकर झारखंड आंदोलनकारी सुनील सिरका ने राज्य सरकार के समक्ष गंभीर सवाल उठाए हैं।

सिरका ने इस मामले में झारखंड सरकार के मुख्य सचिव को शिकायत पत्र भेजकर पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराने, कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय करने तथा अभियंता को दी गई प्रोन्नति और महत्वपूर्ण प्रभार की समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई करने की मांग की है।

मामले को और गंभीर बनाते हुए उन्होंने ग्रामीण कार्य विभाग के राज्य जन सूचना अधिकारी के समक्ष सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(1) के तहत आवेदन देकर संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां भी मांगी हैं। अब सवाल यह है कि यदि अभियंता के विरुद्ध गंभीर मामला लंबित था और अदालत में आरोपपत्र दाखिल हो चुका था, तो उन्हें विजिलेंस क्लीयरेंस किस आधार पर दिया गया और प्रोन्नति की प्रक्रिया में इन तथ्यों पर किस स्तर पर विचार किया गया?

ACB कांड संख्या 58/16: आरोपों की जांच से लेकर चार्जशीट तक का मामला

सुनील सिरका की शिकायत के अनुसार, अभियंता जितेंद्र पासवान, पहचान संख्या ID-4421, के विरुद्ध भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, रांची में थाना कांड संख्या 58/16 दर्ज है। शिकायत में उल्लेख किया गया है कि मामले के अनुसंधान के बाद न्यायालय में अंतिम प्रतिवेदन संख्या 02/20, दिनांक 16 जनवरी 2020 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी।

यह मामला सामने आने के बाद प्रोन्नति प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि ऐसे मामले की जानकारी रहते हुए संबंधित अधिकारी को स्वच्छता प्रमाणपत्र जारी करने और इसके आधार पर प्रोन्नति देने की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

हालांकि, चार्जशीट दाखिल होना अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है। मामले में अभियंता की कानूनी स्थिति, विभागीय कार्रवाई और संबंधित आदेशों की वास्तविक स्थिति का निर्धारण आधिकारिक अभिलेखों तथा न्यायालय की कार्यवाही के आधार पर ही किया जा सकता है।

लोहरदगा सदर अस्पताल के 100 बेड वाले भवन निर्माण में वित्तीय अनियमितता का आरोप

शिकायत में लोहरदगा सदर अस्पताल के 100 बेड वाले वार्ड भवन के निर्माण कार्य में कथित वित्तीय अनियमितता का मामला भी उठाया गया है। सुनील सिरका के अनुसार, इस प्रकरण में मंत्रिमंडल सचिवालय एवं निगरानी विभाग के निगरानी प्रभाग की ओर से 4 जून 2019 को जारी प्रतिवेदन के आधार पर आवश्यक कार्रवाई के लिए मामला भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को भेजा गया था।

यदि इस प्रकरण से संबंधित आरोप और विभागीय अभिलेख शिकायत में बताए गए तथ्यों की पुष्टि करते हैं, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय होगा कि निर्माण कार्य में कथित वित्तीय गड़बड़ी के संबंध में क्या कार्रवाई हुई, किन अधिकारियों की भूमिका की जांच की गई और मामले की वर्तमान स्थिति क्या है।

एक ओर कथित वित्तीय अनियमितता का मामला, दूसरी ओर प्रोन्नति और महत्वपूर्ण पदों का प्रभार—इन दोनों पहलुओं की कड़ी को स्पष्ट करना अब जांच का अहम मुद्दा बन गया है।

29 जुलाई 2024 को विजिलेंस क्लीयरेंस कैसे मिला?

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कथित तौर पर जारी किया गया विजिलेंस क्लीयरेंस यानी स्वच्छता प्रमाणपत्र है।

सुनील सिरका की शिकायत के अनुसार, ACB मामले और अन्य गंभीर आरोपों के बावजूद अभियंता जितेंद्र पासवान को 29 जुलाई 2024 को विजिलेंस क्लीयरेंस जारी किया गया। शिकायतकर्ता ने इस प्रमाणपत्र को जारी किए जाने की प्रक्रिया और उसमें उपलब्ध कराई गई जानकारियों की जांच की मांग की है।

यहीं से कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आते हैं—

  • क्या विजिलेंस क्लीयरेंस जारी करने से पहले ACB कांड संख्या 58/16 की पूरी जानकारी संबंधित विभाग से प्राप्त की गई थी?
  • क्या चार्जशीट दाखिल होने से संबंधित तथ्यों को प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों के संज्ञान में लाया गया था?
  • क्या संबंधित अधिकारी के विरुद्ध लंबित मामलों की जांच और समीक्षा नियमानुसार की गई थी?
  • यदि सभी तथ्य उपलब्ध थे, तो क्लीयरेंस जारी करने का आधार क्या था?
  • और यदि महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी उपलब्ध नहीं थी, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

इन सवालों का जवाब संबंधित विभागीय नोटशीट, निगरानी विभाग की रिपोर्ट, पत्राचार और विजिलेंस क्लीयरेंस जारी करने संबंधी आदेशों से ही सामने आ सकता है। इसलिए इस मामले में दस्तावेजों के आधार पर जांच और जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी माना जा रहा है।

फरवरी 2025 में अधीक्षण अभियंता पद पर प्रोन्नति, फिर महत्वपूर्ण प्रभार

शिकायत के अनुसार, 29 जुलाई 2024 को जारी कथित विजिलेंस क्लीयरेंस के आधार पर फरवरी 2025 में जितेंद्र पासवान को अधीक्षण अभियंता के पद पर प्रोन्नति दी गई। इसके बाद उन्हें मुख्य अभियंता का प्रभार और न्यायिक एवं विधिक मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य भी सौंपे जाने का उल्लेख किया गया है।

इसी बिंदु पर सुनील सिरका ने राज्य सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि संबंधित अधिकारी के विरुद्ध गंभीर मामले लंबित थे, तो प्रोन्नति और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपने से पहले लागू नियमों के अनुसार उनकी स्थिति की समीक्षा की जानी चाहिए थी।

अब जांच का विषय केवल प्रोन्नति नहीं, बल्कि प्रोन्नति के लिए अपनाई गई प्रक्रिया, विजिलेंस क्लीयरेंस की वैधता और महत्वपूर्ण प्रभार सौंपने के प्रशासनिक आधार भी हैं।

यदि प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो यह भी तय करना होगा कि इसके लिए किस स्तर पर जिम्मेदारी बनती है और संबंधित नियमों के तहत क्या कार्रवाई की जा सकती है।

मुख्य सचिव से तीन प्रमुख मांगें

झारखंड आंदोलनकारी सुनील सिरका ने मुख्य सचिव को भेजे गए शिकायत पत्र में मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें उठाई हैं—

1. उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच: अभियंता के विरुद्ध दर्ज ACB मामले, लोहरदगा सदर अस्पताल निर्माण से संबंधित कथित वित्तीय अनियमितताओं और विजिलेंस क्लीयरेंस जारी करने की प्रक्रिया की जांच कराई जाए।

2. जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय हो: यदि जांच में तथ्यों को छिपाने, गलत जानकारी देने या नियमों की अनदेखी करने की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय कर नियमानुसार विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जाए।

3. प्रोन्नति और महत्वपूर्ण प्रभार की समीक्षा हो: अधीक्षण अभियंता के पद पर प्रोन्नति तथा मुख्य अभियंता एवं न्यायिक-विधिक कार्यों से जुड़े प्रभार सौंपने के निर्णयों की नियमसम्मत समीक्षा की जाए। अनियमितता प्रमाणित होने पर नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की जाए।

सुनील सिरका

RTI के जरिए दस्तावेजी सबूत जुटाने की पहल

सुनील सिरका ने केवल शिकायत भेजकर मामला नहीं छोड़ा है, बल्कि पूरे प्रकरण की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(1) के तहत ग्रामीण कार्य विभाग के राज्य जन सूचना अधिकारी को आवेदन भी दिया है।

आवेदन के साथ 10 रुपये का भारतीय पोस्टल ऑर्डर संख्या 65F 542743 संलग्न किए जाने का उल्लेख है। इसके माध्यम से उन्होंने तीन महत्वपूर्ण श्रेणियों के दस्तावेज मांगे हैं।

पहली मांग: विजिलेंस क्लीयरेंस की प्रमाणित प्रति

अधीक्षण अभियंता पद पर प्रोन्नति से पहले विभाग को प्राप्त हुए स्वच्छता प्रमाणपत्र की प्रमाणित छायाप्रति मांगी गई है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि प्रमाणपत्र कब जारी हुआ, किस आधार पर जारी हुआ और उसमें किन तथ्यों का उल्लेख था।

दूसरी मांग: विभागीय नोटशीट और निर्णयों का विवरण

ACB कांड संख्या 58/16 और लोहरदगा अस्पताल से संबंधित मामले के बावजूद अभियंता को महत्वपूर्ण पदों का प्रभार देने के संबंध में लागू नियमों, विभागीय नोटशीट तथा समीक्षा बैठकों में लिए गए निर्णयों की प्रमाणित प्रतियां मांगी गई हैं।

तीसरी मांग: विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की स्थिति

न्यायालय में चार्जशीट दाखिल होने के बाद अभियंता के विरुद्ध कोई विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई या नहीं, इसकी जानकारी मांगी गई है। यदि कार्रवाई शुरू हुई है, तो संबंधित आदेशों और वर्तमान स्थिति के अभिलेख उपलब्ध कराने की मांग की गई है। यदि कार्रवाई शुरू नहीं हुई है, तो इस संबंध में उपलब्ध विभागीय अभिलेखों और निर्णयों की प्रति मांगी गई है।

इन दस्तावेजों से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि प्रोन्नति और प्रभार सौंपने की प्रक्रिया में किन तथ्यों पर विचार किया गया तथा संबंधित विभाग ने क्या कदम उठाए।

अब सरकार की जवाबदेही पर टिकी निगाहें

इस पूरे प्रकरण ने सरकारी विभागों में पारदर्शिता, विजिलेंस क्लीयरेंस की प्रक्रिया और गंभीर मामलों का सामना कर रहे अधिकारियों को प्रोन्नति देने के नियमों को लेकर बहस तेज कर दी है।

सुनील सिरका की शिकायत पर अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मुख्य सचिव का कार्यालय मामले की जांच के लिए क्या कदम उठाता है, ग्रामीण कार्य विभाग RTI आवेदन पर कौन-कौन से अभिलेख उपलब्ध कराता है और संबंधित अधिकारी के विरुद्ध दर्ज मामले की वर्तमान कानूनी एवं विभागीय स्थिति क्या है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि शिकायत में बताए गए तथ्य आधिकारिक दस्तावेजों से पुष्ट होते हैं, तो विजिलेंस क्लीयरेंस जारी करने से लेकर प्रोन्नति और महत्वपूर्ण प्रभार सौंपने तक की पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी किसकी बनती है?

इसका जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, प्रमाणित दस्तावेजों और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही से ही सामने आएगा। फिलहाल, शिकायतकर्ता की मांग पर राज्य सरकार और संबंधित विभाग की प्रतिक्रिया का इंतजार है।

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